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चिंता का सामना करने के लिए टिप्स

उम्मीद चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर में मेंटल हेल्थ सर्विस की हेड जेहनज़ेब बलदीवाला बता रही हैं कि चिंता का सामना कैसे करें…

कोई एक ऐसा किस्सा, जिसके बारे में आप हमें बताना चाहती हो? 

जेहनज़ेब : एक बच्चा जो जब 8 साल का था। अब वह बड़ा हो गया है। उसे परफॉर्मेंस करने से डर लगता था। ऐसा नहीं था कि उसे सिर्फ परीक्षा में परफॉर्म करने में डर लगता था। वह कराटे का चैंपियन था और शतरंज खेलता था। परफॉर्मेंस के पहले घबराहट की वजह से उसे चक्कर आने लगते थे या कभी-कभी उल्टियां और चक्कर दोनों ही आने लगते थे और ऐसा सिर्फ परीक्षा में नहीं होता था। उसके पेरेंट्स काफी सपोर्टिव थे। वह अपने पेरेंट्स का इकलौता बच्चा था और वे उससे बेहद प्यार करते थे। 

आपने परफॉर्मेंस के डर से बाहर आने में उसकी कैसे मदद की? 

जेहनज़ेब : हमारी बातचीत इसे समझने पर फोकस थी कि, चिंता का उसकी ज़िंदगी पर क्या असर हो रहा था। हमने एक्सटरनलाइजेशन तकनीक का प्रयोग किया, जिसमें हम इस आइडिया पर फोकस करते हैँ कि व्यक्ति चिंतित व्यक्ति नहीं है या व्यक्ति समस्या नहीं है। समस्याएं ख़ास परिस्थिति में ही सामने आती हैं। हम अपने सवालों में ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैँ, जो व्यक्ति को समस्या सुलझाने में मदद कर सके और ख़ुद को समस्या से अलग करके देख सके। 

हमने इस बात को समझने का प्रयास किया, कि वह व्यक्ति क्या हासिल करना चाहता है और ऐसी कौन सी चीजें हैं, जो उसकी कामयाबी के रास्ते में आ रही हैं। वह कामयाबी हासिल करना चाहता था। तब हमने उन तकनीक पर काम करना शुरु किया, इसमें जो वह चाहता था, उसे हासिल करने में उसकी मदद करें। इसमें उस व्यक्ति ने अपनी स्किल्स और इमेजिनेशन का ही अधिक उपयोग किया। 

लोगों के पास स्किल्स और नॉलेज दोनों है। हमेशा ही व्यक्ति किसी न किसी ढंग से अपनी परेशानियों का जवाब भी दे रहे हैं हैं। कभी-कभी परेशानी इतनी ज्यादा जगह घेर लेती हैं कि, व्यक्ति को उसके अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं देता है। वे अपनी मदद करने के लिए अपना बेस्ट देने की कुछ कोशिश कर रहें हैं। लोग ख़ुद में बदलाव ला सकते हैं, यदि वे अपने स्किल्स को देखना शुरु कर दें।  

जो लोग चिंता का सामना कर रहे हैं, उनके लिए आप क्या कुछ टिप्स दे सकती हैं? इसका सामना कैसे कर सकें? 

जेहनज़ेब : यहां कुछ टिप्स दे रही हूं, जो इस तरह के केस निपटाने में मैँ उपयोग करती हू: 

  1. मेडिटेशन एंड माइंडफुलनेस : आपकी बॉडी में जहां सेंसेशन होती है, उसके प्रति जागरूक रहें। स्थिति के नियंत्रण से बाहर होने से पहले यह उसे पहचाने में आपकी मदद करता है। उस प्वाइंट को पकड़कर वहीं रोक लें। आप किसी भी परेशानी को कम या ज्यादा सहज बनाने में सक्षम हैं।  

  2. सेल्फ हिप्नोसिस : एक सुरक्षित जगह के बारे में सोचिए। वहां अपने मन को लेकर जाएं या ख़ुद से बात करें और सुरक्षित महसूस करें। एक सुरक्षित जगह जहां आप सुरक्षित महसूस करें। वह कोई मीठी याद, किसी दोस्त से मुलाकात या फिर टीवी पर देखा हुआ शो भी हो सकता है।  

  3. ह्यूमर : कुछ मज़ेदार बात सोचें या ऐसा कुछ जिसमें आप आगे के बारे में सोचें।  

  4. फिजिकल एक्टिविटी के लिए ख़ुद को प्रोत्साहित करें : फिजिकल एक्टिवटी से ध्यान केन्द्रित होता है और एंड्रोफिन्स रिलीज होने से चिंता कम होती है। 

  5. ऐसे व्यक्ति की तलाश करें जो आपको समझ सके : अगर आपको अचानक आधी रात को किसी वजह से चिंता होने लगे, तो अपने किसी कजिन, पेरेंट्स जो इस समय आपकी मदद कर सके। ऐसे किसी व्यक्ति को तलाशिए जो स्थिति के गंभीर होने से पहले समझ सके और आपको शांत कर सके। 

  6. इस एप का उपयोग करें : हेल्थस्पेस एप का उपयोग करना टीनएजर्स के लिए काफी मददगार होगा।  

अपने साथ कुछ गलत हो रहा है और इससे बाहर आना जरूरी है, इसे समझने के क्या लक्षण हैं?  

जहनज़ेब : ऐसा तब महसूस होता है, जब आप क्या करना चाहते हो इसमें किसी तरह का दखल हो। जब स्कूल जाना उबाऊ हो जाए, बिस्तर से उठना, आपके परिवार, दोस्तों, जॉब या स्कूल पर इसका असर होने लगे, ऐसी स्थिति में खुद को आने से रोकें। अगर आपको इन वजहों से हमेशा दुख होता है, तो चिंता की बात है।

टीनटॉक इंडिया टीनएजर्स को सशक्त बनाने में मदद कर सकता है, इस बारे में आप क्या सोचती हैं? 

जहनजेब : टीनटॉक इंडिया के बारे में सबसे उत्साह की बात यह है कि, यह लोगों को खुला मंच देता है। मेरे अनुभव से मुझे जो समझ में आया है, वह यह है कि मेरी जो पहचान है, वह सामाजिक रूप से निर्मित है। मैं वही हूं, जो मैँ अन्य लोगों के संग अपने रिश्तों के कारण हूं। मैँ टीचर हूं, क्योंकि मेरे पास स्टूडेंट्स हैं। मैँ एक मां हूं, क्योंकि मेरे पास बच्चा है। लोगों से जुड़ने से सच में मदद मिलती है। टीनटॉक इंडिया उन लोगों के कनेक्शन को मजबूत करने पर फोकस है, जो सपोर्टिव हैं। एक टीनएजर जैसा महसूस कर रहा है, वैसा ही महसूस कर चुके टीनएजर से जुड़ने से मदद मिलती है।   

उम्मीद है आपको इससे मदद मिलेगी, अगर कोई सवाल है, तो  expert@teentalkindia.com. पर ईमेल करें। आप एक्सपर्ट स्पीक टेब में एक्सपर्ट के वीडियो देख सकते हैं। 

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संस्कारी सेक्स, ईडी और सेक्शुअलिटी पर डॉ. भक्ति मुर्के से पांच सवाल

कंसल्टिंग सायकायट्रिस्ट डॉ. भक्ति मुर्के आपके लिए पेश कर रही हैं एक अल्टीमेट सेक्शुअलिटी मैन्युअल...
Ritika SrivastavaTeentalkindia Counsellor

हमारे देश में सेक्स एजुकेशन का एक संस्कारी ब्रांड है, जो सोशल आइडियाज़ और कंस्ट्रक्ट्स, बहुत सारी हो सकने वाली चीज़ों और सेक्स से लगने वाले डर के बारे में बात करता है, एक्चुअल सेक्स और सेक्शुअलिटी के बारे में नहीं।

बहुत सारे स्कूल्स तो सेक्स को लेकर एक बायोलॉजिकल एप्रोच अपनाते हैं, और जो बातें आपको सच में जानना चाहिए, उसे आराम से काट देते हैं। केवल इसलिए कि वे उस पर बात करने में अनकम्फ़र्टेबल फ़ील करते हैं।

लेकिन आपकी बॉडी और सेक्शुअलिटी के बारे में मेडिकली एक्यूरेट इन्फ़ॉर्मेशन हासिल करना आपका बुनियादी हक़ है। इसीलिए टीनटॉक ने आपके लिए इस विषय पर प्रोफ़ेशनल गाइडेंस जुटाने की कोशिश की है।

तो पढ़ते हैं कंसल्टिंग सायकायट्रिस्ट डॉ. भक्ति मुर्के से एक बातचीत में टीन सेक्स और सेक्शुअलिटी के बारे में...

टीनटॉक : क्या आप हमें टीन सेक्स के बारे में कुछ बता सकती हैं और क्या यह सेफ़ है?

डॉ. भक्ति मुर्के : सेक्स ह्यूमन बॉडी और माइंड का एक एक्सप्रेशन है। जैसे भूख और प्यास होती है, वैसे ही सेक्स मनुष्य की बायोलॉजिकल नीड है, जिसे पूरा करना होता है। सेक्शुअल एनकाउंटर्स इसी ज़रूरत की पूर्ति करते हैं। वो हमारी फ़ीलिंग्स और डिज़ायर्स का एक एक्सप्रेशन होते हैं। उनके ज़रिये हम प्लेज़र की तलाश करते हैं, रिलेशनशिप में कम्युनिकेशन का स्पेस खोजते हैं और इस तरह के एनकाउंटर्स के बाद होने वाले फ़िज़ियोलॉजिकल बदलावों को भी हम समझ पाते हैं।

सेक्स कोई बुरी या गंदी चीज़ नहीं है, जिस पर आपको शर्मिंदा होना पड़े।

सेक्स कोई अचीवमेंट भी नहीं है, ना ही यह ऐसी चीज़ है, जिसके लिए किसी को जज किया जाए।

यह एक पर्सनल चीज़ है। यह एक च्वॉइस है। यह दो लोगों के बीच एक ऐसा एग्रीमेंट है, जिसे सबको जानने की ज़रूरत नहीं है।

पॉवर के साथ रिस्पॉन्सिबिलिटी आती है। इसी तरह, सेक्शुअल बिहेवियर को एक्सप्लोर करने का मौक़ा मिलने पर अपनी हेल्थ की सुरक्षा का ध्यान रखरने की ज़िम्मेदारी भी आती है।

मास्टरबेट करना या अपनी सेक्शुअलिटी को एक्सप्लोर करना एकदम नॉर्मल है, जब तक कि इसे सुरक्षित रूप से किया जाए, या ऐसा करने से कोई अनकम्फ़र्टेबल नहीं होता हो।

सेक्स में ना कहना एक कम्प्लीट स्टेटमेंट है। इसके लिए सहमति सबसे ज़रूरी है। इसलिए अपने पार्टनर से कम्युनिकेट करना ज़रूरी है।

अगर आप ख़ुद को किसी मेल, फ़ीमेल, क्रॉसजेंडर बॉक्स में फ़िट नहीं पाते हैं तो भी कोई हर्ज नहीं। क्वीर होने में भी कुछ बुराई नहीं है। सेक्शुअलिटी एक डायनैमिक प्रोसेस है और ये आपको एबनॉर्मल नहीं बनाती।

अगर आपको लगता है कि आप सेक्स के बारे में बात नहीं कर पा रहे हैं, आपके सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, अगर आप किसी चीज़ को लेकर गिल्टी या परेशानी अनुभव करते हैं, अगर आपको लगता है कि आपको सेक्शुअल थॉट्स घेरे रहती हैं, अगर आप दोस्तों या समाज के भेदभाव से डरते हैं तो इस बारे में प्लीज़ किसी ऐसे व्यक्ति से बात कीजिए, जो चीज़ों को समझता हो। 

आप अकेले नहीं हैं।

टीनटॉक : सेक्शुअल आइडेंटिटी और सेक्शुअल ओरिएंटेशन में क्या फ़र्क़ है?

डॉ. भक्ति मुर्के :

सेक्शुअल ओरिएंटेशन सेक्शुअल आइडेंटिटी से अलग होता है। सेक्शुअल आइडेंटिटी हमें बताती है कि हम कैटेगरी से रिलेट करते हैं- मेल, फ़ीमेल, ट्रांसजेंडर या क्वीर। सेक्शुअल ओरिएंटेशन का मतलब है कि आप सेक्शुअली, रोमैंटिकली और इमोशनली किसकी ओर अट्रैक्ट होते हैं। ओरिएंटेशन हेट्रोसेक्शुअल हो सकता है, होमोसेक्शुअल हो सकता है, बायसेक्शुअल या एसेक्शुअल भी हो सकता है।

जहां ये महज़ चंद लेबल्स हैं, जिनसे हम ख़ुद को जोड़ सकते हैं, वहीं कुछ लोगों के लिए ऐसी कोई क्लीयर बाउंड्रीज़ नहीं होतीं। ओरिएंटेशन के इन लेबल्स के बहुत इमोशनल मीनिंग होते हैं और वो हमारे सोशल एग्ज़िस्टेंस पर असर डाल सकते हैं।

हममें से अधिकतर उस जेंडर के साथ आइडेंटिफ़ाई करते हैं, जिसमें हम जन्मे थे। इससे सोशल नॉर्म्स का कन्फ़र्मेशन आसानी से हो जाता है। लेकिन जो अपने जेंडर से आगे बढ़कर ख़ुद को आइडेंटिफ़ाई करना चाहते हैं, उनके लिए फ़ैमिली, रोल मॉडल्स, सोशियो-कल्चरल ट्रेडिशंस आदि बहुत मायने रखते हैं।

टीनटॉक : मैं अपनी सेक्शुअल प्रिफ़रेंस को कैसे आइडेंटिफ़ाई कर सकता हूं? मैं कैसे जान सकता हूं कि मैं गे हूं?

डॉ. भक्ति मुर्के : सेक्शुअल ओरिएंटेशन कई चीज़ों का परिणाम होता है- जेनेटिक, हॉर्मोनल और सोशल फ़ैक्टर्स। ये कोई एब्नॉर्मलिटी या चॉइस नहीं है, जिसे हम जब चाहें, तब कर लें। 

रिसर्च से पता चला है कि किसी व्यक्ति में अनेक वर्षों बाद सेक्शुअल ओरिएंटेशन बदल सकती है। यह बायोलॉजिकल फ़ैक्टर्स से भी तय होती है। लेकिन अगर हम किसी लड़के को लड़कियों के खेलने वाले खिलौने, जैसे डॉल्स, दे दें तो वो इससे गे नहीं बन जाएगा।

जेंडर रोल्स स्टीरियोटाइप्स के बावजूद मैस्क्युलिन या फ़ेमिनिन रुझानों से सेक्शुअल ओरिएंटेशन के बारे में पता नहीं चलता। लुक्स या स्टाइल पर आधारित सेक्शुअल केवल एक जजमेंट है, जो हम किसी को जाने बग़ैर उसके लिए दे देते हैं।

हमें समझना चाहिए कि सेम सेक्शुअल आइडेंटिटी वालों के साथ सेक्शुअल एनकाउंटर होना एक बाता है, लेकिन उनके लिए सेक्शुअल ओरिएंटेशन होना दूसरी बात है। अगर हमें नहीं पता कि हमारा ओरिएंटेशन क्या है, तो इसमें भी कुछ ग़लत नहीं है। कभी-कभी लोग अपने ओरिएंटेशंस के साथ एक्सपेरिमेंट करते हैं ताकि यह तय कर सकें कि उन्हें क्या सूट करेगा।

अगर आप गे हैं तो यह केवल आप ही जान सकते हैं। कोई और आपको आपके ओरिएंटेशन के बारे में नहीं बता सकता। लेकिन कुछ इंडिकेटर्स हैं, जिनकी मदद से आप अपना ओरिएंटेशन जान सकते हैं। जैसे :

मैं किसकी ओर सेक्शुअल अट्रैक्ट होता हूं? मेरी किसके साथ सेक्शुअल रिलेशनशिप है? मैं किसके बारे में सेक्शुअल फ़ैंटेसीज़ करता हूं? मेरा इमोशनल कनेक्ट किससे है? मैं किसके साथ घूमता-फिरता हूं? मैं किसके साथ समय बिताना पसंद करता हूं?

टीनटॉक : क्या आप बता सकती हैं कि इंडिया में एलजीबीटी कम्युनिटी और गे राइट्स गुमशुदा क्यों हैं? 

डॉ. भक्ति मुर्के : तर्क और मानवीय सिद्धांत तो यही कहते हैं कि डिफ्रेंटली ओरिएंटेड लोगों के लिए भी समान अधिकार होने चाहिए। अपनी चॉइसेस को एक्सप्रेस करने का अधिकार, रिलेशनशिप बनाने का अधिकार, सामान्य लोगों की तरह स्वीकार किए जाना, क़ानूनी वैधता, सोशल एक्सेप्टेंस- ये सब होना चाहिए।

हमें नया माइंडसेट समझना होगा। यह कहता है कि अगर किसी व्यक्ति की नेचरल नीड डिफ्रेंट है तो उसे इसके लिए तक़लीफ़ झेलने की ज़रूरत नहीं है।

चाहे जितनी थैरेपी, ट्रीटमेंट कर लो, समझा-बुझा लो, किसी व्यक्ति का ओरिएंटेशन इससे नहीं बदल जाएगा। एलजीबीटी के लिए जो थैरेपी होती है, वो मुख्यतया अपने को जानने और स्वीकार करने के लिए होती है। यह थैरेपी डर और भेदभाव का सामना करना सिखाती है और यह ग़ैरपरम्परागत समझे जाने की इमोशनल प्रोसेस को जानने में मदद करती है।

टीनटॉक : कन्सेंट क्या होती है? यह ज़रूरी क्यों है?

डॉ. भक्ति मुर्के : कन्सेंट किसी भी सेक्शुअल इंटिमेसी के लिए ज़रूरी है। इसका मतलब है कि सेक्शुअल एक्ट में जाने के लिए पार्टनर की सहमति ली गई है। इसका सम्बंध कम्युनिकेशन से है और यह साफ़ और कंसिस्टेंट होनी चाहिए।

कन्सेंट तब लागू नहीं होती, जब कोई चुप है, या जब आप ना सुनने को राज़ी ही नहीं होते। यह तब भी लागू नहीं होती, जब कोई व्यक्ति एक ख़ास तरह के कपड़े पहनता है, या फ़्लर्ट करता है, या किसी प्रकार के नशे में है। शादी करने का मतलब भी कन्सेंट हासिल करना नहीं है।

जैसे-जैसे हम अपनी सेक्शुअल आइडेंटिटी के बारे में और अवेयर और श्योर होते जाते हैं, इसके ज़रिये हम दूसरों से ख़ुद को जोड़ने में भी सफल होते हैं। हम दूसरों की भावनाओं, सीमाओं और निर्णयों को समझने लगते हैं। दूसरे शब्दों में, जब हम अपनी सेक्शुअलिटी को लेकर कॉन्फ़िडेंट होते हैं, तो हम दूसरे की जर्नी को भी समझते हैं और उसकी रिस्पेक्ट करते हैं, और उनकी सहमति के साथ ही उनके साथ किसी तरह के सेक्शुअल एक्ट में इंगेज होते हैं।

अगर आपके पास सेक्शुअलिटी से जुड़ी कोई और क्वेरीज़ या सवाल हैं तो आप expert@teentalkindia.com पर हमारे एक्सपर्ट्स को ईमेल लिख सकते हैं।

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