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एक्सपर्ट स्पीक : सुसाइडल थॉट्स से निपटने के टिप्स

वोवी भगवागर, ट्रॉमा वर्क पर स्पेशल फ़ोकस करने वाले सायकोथैरेपिस्ट

क्या आप किसी ऐसे टीनएजर का एक्सपीरियंस हमसे शेयर कर सकते हैं, जिसे सुसाइडल थॉट्स आए हों?

मैंने ऐसे बहुत-से केस देखे हैं, जहां टीन्स ने कॉलेज से ड्रॉप ले लिया या विदेशों में पढ़ाई के दौरान एकेडमिक प्रेशर और कॉम्पीटिशन के कारण भारत लौट आए।

-वे एकेडमिक स्ट्रेस से जूझ नहीं पाते हैं।
-वे बहुत ज़्यादा पीयर प्रेशर भी फ़ेस करते हैं; किसी चीज़ में फ़िट न हो पाने की समस्या का भी।
-उन्हें लगता है कि उनके द्वारा चुनी गई एकेडमिक फ़ील्ड उनके लिए नहीं है।

टीन्स के कॉलेज छोड़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। लेकिन जब वे एक बार ऐसा कर लेते हैं तो उन्हें फिर से कॉलेज जाने में शर्म महसूस होती है। इससे उनमें एंग्ज़ायटी और डिप्रेशन हो सकता है। कुछ लक्षणों पर ध्यान दीजिए :

-उन्हें दिनभर आलस बना रहता है। बिस्तर से निकलने में मुश्किल पेश आती है।
-दोस्तों के साथ बाहर जाने जैसी नॉर्मल एक्टीविटीज़ के लिए थोड़ा-सा या बिल्कुल भी मन नहीं होता।
-अनियमित खान-पान।
-डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी के कारण टीन्स सुसाइडल फ़ील कर सकते हैं।

डिप्रेशन के लक्षण क्या हैं?

1. इसकी शुरुआत धीरे-धीरे होती है। एक नेगेटिव थॉट-पैटर्न दिमाग़ में अपनी जड़ें जमा लेता है, जहां डिप्रेसिंग थॉट्स मौजूद रहते हैं। एक टीन अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को लेकर नेगेटिव हो सकता है।
2. बेचैनी और व्याकुलता।
3. बहुत कम या बहुत ज़्यादा सोना।
4. भूख न लगना या ओवर-ईटिंग। चिड़चिड़ा हो जाना।
5. ये लक्षण अपने आप कम नहीं होते; बल्कि समय के साथ और बदतर होते जाते हैं।

एंग्ज़ायटी के क्या लक्षण होते हैं?

1. मन का डर कई तरीक़ों से सामने आ सकता है। एक यह हो सकता है उन्हें परीक्षा न देने जाना हो या वो किसी दोस्त से मिलने न जाना चाहते हों।
2. पैनिक अटैक, चिपचिपे/पसीने भरे हाथ। उदाहरण के लिए, वो सिचुएशन्स को अप्रोच नहीं करना चाहते और नई सिचुएशन को अवॉइड करना शुरू कर देते हैं।
3. नींद में परेशानी।
4. मितली आना या बार-बार सिरदर्द करना।

ये लक्षण लम्बे समय तक बने रहते हैं।

टीनएजर्स को सुसाइडल थॉट्स को बचाने के उपाय :

1. उनकी परेशानी समझें : टीनएजर से बात करें और उनके डिप्रेशन या एंग्ज़ायटी की गहराई जानने की कोशिश करें।
2. टेस्ट करवाएं : कई टेस्ट करवाएं, जिसमें ब्लड टेस्ट भी शामिल है।
3. सायकियाट्रिस्ट की मदद : यदि टीन ने कुछ दिनों से कुछ नहीं खाया है, बहुत सारा वज़न घट गया है और वे लगातार रोने लगे हैं तो उन्हें सायकियाट्रिस्ट के पास रैफर करना।
4. थैरेपी- इसमें अपनी लाइफ़स्टाइल बदलने के लिए एक्टीविटीज़ को शेड्यूल करना शामिल है।
5. थिंकिंग पैटर्न- नेगेटिव थॉट्स पर काम करना ज़रूरी है। आप नेगेटिव थॉट्स को दूर कर सकते हैं। हमारा दिमाग़ नेगेटिव और पॉज़िटिव डाटा को बैलेंस कर सकता है। हालांकि, एक डिप्रेस्ड व्यक्ति का दिमाग़ नकारात्मक विचारों की ओर ही जाता है और पॉज़िटिव चीज़ों को नकार देता है।

मैंने नेगेटिव थिंकिंग को रैशनल बनाने की कोशिश की है। जैसे : मैंने 95 प्रतिशत स्कोर नहीं किया है और मैं अपनी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी हूं, लेकिन मैंने 80 प्रतिशत स्कोर किया है और अंग्रेज़ी में टॉप किया है। इस तरह मैं उन्हें पॉज़िटिव डाटा देखने में मदद करती हूं।

एंटी-डिप्रेसैंट्स के क्या कोई साइड-इफ़ेक्टस हैं?
इसके साइड इफ़ेक्ट से अधिक बेनेफ़िट्स हैं। दवाइयां कभी भी एडिक्टिव नहीं बन सकतीं। ऐसा नहीं होगा कि आपने अभी गोली ली और आपको तत्काल आराम मिल जाएगा। एंटी-डिप्रेसैंट्स को सिस्टम में सेटल होने में 4-6 हफ़्तों का समय लगता है। एडिक्टिव चीज़ें आपको तत्काल रिज़ल्ट देती हैं। एंटी डिप्रेसैंट्स ब्लड स्ट्रीम तक पहुंचती है और समय लेती हैं। साथ ही कोई भी बिना प्रिस्क्रिप्शन के यह दवाई नहीं देता है।

अपने डिप्रेस्ड बच्चों की मदद के लिए पैरेंट्स क्या कर सकते हैं?
बहुत पढ़े-लिखे पैरेंट्स भी कभी-कभी यह समझ नहीं पाते हैं कि उनके बच्चे किस चीज़ से गुज़र रहे हैं। पैरेंट्स की ओर से कॉमन रिस्पॉन्स रहते हैं कि, ‘पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे हो, इसलिए यह हो रहा है।' वो अधिक सहानुभूति रखकर अपने बच्चों की मदद कर सकते हैं। उन्हें इस बात को स्वीकारना चाहिए कि डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी असल समस्याएं हैं, जिनके लिए प्रोफ़ेशनल मदद की ज़रूरत होती है।

हम सभी मेंटल हेल्थ के स्टिग्मा से मुक़ाबला कैसे कर सकते हैं?
जागरूकता और शिक्षा इस मेंटल हेल्थ के स्टिग्मा से मुक़ाबला करने के तरीक़े हैं। टीनएजर्स इंटरनेट पर बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं, जिनमें से बहुत-सी चीज़ों का कोई अर्थ नहीं होता है। टीनटॉकइंडिया एक ऐसी वेबसाइट है, जो सारे इशूज़ कवर करती है और वेल-रिसर्च्ड कंटेंट उपलब्ध करवाती है।

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एकेडमिक रिज़ल्ट से आप अपनी क़ीमत नहीं पहचान सकते

वोवी भगवागर, साइकोथैरेपिस्ट से बातचीत विशेष तौर पर ट्रॉमा वर्क के बारे में…
Ritika SrivastavaTeentalkindia Counsellor

-टीनएजर्स के संग साइकोलॉजिकल केसेस डील करने के आपके अनुभव में, एकेडमिक परफ़ॉर्मेंस और खु़द के मूल्यांकन के बीच क्या सम्बंध है?
-मेरा क्लीनिक आईआईटी बॉम्बे कैम्पस के क़रीब ही है। मुझसे टीनएजर्स ऐसे कई सारे सवाल पूछते हैं, जिसमें स्टूडेंट्स को पढ़ाई के दबाव का सामना करना मुश्किल होता है। वे अपना मूल्यांकन इस आधार पर करते हैं कि उन्हें परीक्षा में कितने नम्बर मिले हैं।

-आपको इस तरह के केस सबसे अधिक कब मिलते हैं?
-दिसम्बर से मार्च तक का समय इस प्रकार के मामलों से भरा होता है क्योंकि बोर्ड परीक्षाएं चल रही होती हैं। यह वह समय होता है, जब स्टूडेंट्स पर सबसे ज़्यादा दबाव होता है और यही पैटर्न जून में दोहराता है, जब नतीजे आते हैं और स्टूडेंट्स को ऐसा महसूस होता है कि उन्हें पर्याप्त नम्बर नहीं मिले हैं। उन्हें शिक्षकों की तरफ़ से भी निराशा का सामना करना पड़ता है। उन्हें यह बताया जाता है कि अगर अच्छा स्कोर नहीं मिला तो वे इसी क्लास में दोबारा पढ़ेंगे। पैरेंट्स भी इसी तरह की ही बातें कहते हैं।

-यहां कुछ टिप्स साझा करें कि कैसे नम्बरों के आधार पर अपनी क़ीमत नहीं आंकी जाए।

1. तर्कसंगत विचार प्रक्रिया को बनाए रखें। परीक्षा में 96 प्रतिशत स्कोर करना ज़रूरी है, लेकिन 94 या 95 प्रतिशत आते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप बेकार हैं। इस तरह की तर्कसंगत बातों पर खु़द विचार करके देखें। 
2. खु़द से कहें कि "अच्छे अंक पाना ज़रूरी है, लेकिन नहीं मिले तो यह दुनिया का अंत नहीं है।" ऐसी बातें भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मददगार होती हैं। 
3. सफल लोगों के बारे में पढ़ें। मार्क ज़करबर्ग जैसी कई पर्सनैलिटी हैं, जिन्होंने कॉलेज ड्रॉपआउट होने के बावजूद अपने चुने हुए क्षेत्र में सफलता हासिल की।  
4. अच्छा इंसान बनने की ख्वाहिश रखें, जो समाज में सार्थक तरीके़ से योगदान दे, फिर भले ही उसे बोर्ड या प्रतियोगी परीक्षाओं में कम नम्बर मिले हों।
5. सफलता खु़शी में है। खु़शी दिमाग़ की एक स्थिति है, जो हमें सर्वश्रेष्ठ करने के लिए प्रेरित करती है। आपके पास जो भी है, उसमें ख़ुश रहने की कोशिश करें तो सफलता अवश्य मिलेगी।  

-ऐसे कौन-से कारण हैं, जिनकी वजह से टीनएजर्स पढ़ाई के दबाव को सहन नहीं कर पाते हैं? 

1. कॉम्पीटिशन की भावना न होना : कुछ टीनएजर्स आईआईटी करने को लेकर तैयार नहीं होते हैं। उन्हें 4-5 प्रयास के बाद सफलता मिलती है। अगर उनमें कॉम्पीटिशन की भावना नहीं होगी तो वे बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। 
2. पैरेंट्स और दोस्तों का दबाव : 40 से 50 फ़ीसदी बच्चे पैरेंट्स और दोस्तों के दबाव के कारण पढ़ाई करते हैं। ऐसे में जब नम्बर कम आते हैं तो डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी डिसॉर्डर और आत्महत्या के प्रयास के मामले बढ़ते हैं। 
3. अपनी पहचान और अपना मूल्यांकन : अच्छे एकेडमिक इंस्टिट्यूशन्स में पढ़ना और अच्छी पढ़ाई करना खु़द के मूल्यांकन के लिए मुहर की तरह हो गया है। टीनएजर्स को खु़द से पूछना चाहिए कि क्या यह वही है, जिसे वह करना चाहते हैं? बदक़िस्मती से वे खु़द से यह सवाल तब पूछते हैं जब एक साल बीत जाता है।
4. अकेलापन : छोटे शहरों के टीनएजर्स को बड़े शहरों के बच्चों से जुड़ने में कठिनाई होती है। उनके पास बात करने के लिए कोई नहीं होता है। दोस्तों में भी कॉम्पीटिशन शुरू हो जाता है, वे कई बार नुक़सान भी पहुंचाने लगते हैं।  
5. कोई प्रोफ़ेशनल मदद नहीं : ऐसी परिस्थितियों में प्रोफ़ेशनल से सम्पर्क करके मदद लेना कारगर होता है। बदक़िस्मती से कई के पास प्रोफे़शनल हेल्प नहीं पहुंचती है।

देशभर के टीनएजर्स के लिए आपका संदेश? 
-पढ़ाई आपके लिए खु़द के मूल्यांकन की मुहर नहीं होनी चाहिए। टीनएजर्स सोचते हैं कि यदि मैं 90 प्रतिशत नम्बर लाता हूं, तभी मेरा होना सार्थक है। मुझे सभी टीनएजर्स से कहना है कि आप जो अंदर से हैं, वही आपका मूल्य है। परीक्षा के मार्क्स सिर्फ़ नम्बर्स हैं, जो आएंगे और जाएंगे। अगर वे खु़द को इस नज़रिये के साथ अलग होकर देखेंगे तो, वे खु़श रहेंगे।
    
हम यहां आपकी मदद के लिए हैं। यदि आपको लगता है कि आप एकेडमिक प्रेशर का सामना नहीं कर सकते हैं और किसी से बात करना चाहते हैं, तो आप हमें expert@teentalkindia.com पर लिख सकते हैं या हमें अपनी कोई जिज्ञासा भेज ईमेल कर सकते हैं।

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