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एकेडमिक रिज़ल्ट से आप अपनी क़ीमत नहीं पहचान सकते

वोवी भगवागर, साइकोथैरेपिस्ट से बातचीत विशेष तौर पर ट्रॉमा वर्क के बारे में…

-टीनएजर्स के संग साइकोलॉजिकल केसेस डील करने के आपके अनुभव में, एकेडमिक परफ़ॉर्मेंस और खु़द के मूल्यांकन के बीच क्या सम्बंध है?
-मेरा क्लीनिक आईआईटी बॉम्बे कैम्पस के क़रीब ही है। मुझसे टीनएजर्स ऐसे कई सारे सवाल पूछते हैं, जिसमें स्टूडेंट्स को पढ़ाई के दबाव का सामना करना मुश्किल होता है। वे अपना मूल्यांकन इस आधार पर करते हैं कि उन्हें परीक्षा में कितने नम्बर मिले हैं।

-आपको इस तरह के केस सबसे अधिक कब मिलते हैं?
-दिसम्बर से मार्च तक का समय इस प्रकार के मामलों से भरा होता है क्योंकि बोर्ड परीक्षाएं चल रही होती हैं। यह वह समय होता है, जब स्टूडेंट्स पर सबसे ज़्यादा दबाव होता है और यही पैटर्न जून में दोहराता है, जब नतीजे आते हैं और स्टूडेंट्स को ऐसा महसूस होता है कि उन्हें पर्याप्त नम्बर नहीं मिले हैं। उन्हें शिक्षकों की तरफ़ से भी निराशा का सामना करना पड़ता है। उन्हें यह बताया जाता है कि अगर अच्छा स्कोर नहीं मिला तो वे इसी क्लास में दोबारा पढ़ेंगे। पैरेंट्स भी इसी तरह की ही बातें कहते हैं।

-यहां कुछ टिप्स साझा करें कि कैसे नम्बरों के आधार पर अपनी क़ीमत नहीं आंकी जाए।

1. तर्कसंगत विचार प्रक्रिया को बनाए रखें। परीक्षा में 96 प्रतिशत स्कोर करना ज़रूरी है, लेकिन 94 या 95 प्रतिशत आते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप बेकार हैं। इस तरह की तर्कसंगत बातों पर खु़द विचार करके देखें। 
2. खु़द से कहें कि "अच्छे अंक पाना ज़रूरी है, लेकिन नहीं मिले तो यह दुनिया का अंत नहीं है।" ऐसी बातें भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मददगार होती हैं। 
3. सफल लोगों के बारे में पढ़ें। मार्क ज़करबर्ग जैसी कई पर्सनैलिटी हैं, जिन्होंने कॉलेज ड्रॉपआउट होने के बावजूद अपने चुने हुए क्षेत्र में सफलता हासिल की।  
4. अच्छा इंसान बनने की ख्वाहिश रखें, जो समाज में सार्थक तरीके़ से योगदान दे, फिर भले ही उसे बोर्ड या प्रतियोगी परीक्षाओं में कम नम्बर मिले हों।
5. सफलता खु़शी में है। खु़शी दिमाग़ की एक स्थिति है, जो हमें सर्वश्रेष्ठ करने के लिए प्रेरित करती है। आपके पास जो भी है, उसमें ख़ुश रहने की कोशिश करें तो सफलता अवश्य मिलेगी।  

-ऐसे कौन-से कारण हैं, जिनकी वजह से टीनएजर्स पढ़ाई के दबाव को सहन नहीं कर पाते हैं? 

1. कॉम्पीटिशन की भावना न होना : कुछ टीनएजर्स आईआईटी करने को लेकर तैयार नहीं होते हैं। उन्हें 4-5 प्रयास के बाद सफलता मिलती है। अगर उनमें कॉम्पीटिशन की भावना नहीं होगी तो वे बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। 
2. पैरेंट्स और दोस्तों का दबाव : 40 से 50 फ़ीसदी बच्चे पैरेंट्स और दोस्तों के दबाव के कारण पढ़ाई करते हैं। ऐसे में जब नम्बर कम आते हैं तो डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी डिसॉर्डर और आत्महत्या के प्रयास के मामले बढ़ते हैं। 
3. अपनी पहचान और अपना मूल्यांकन : अच्छे एकेडमिक इंस्टिट्यूशन्स में पढ़ना और अच्छी पढ़ाई करना खु़द के मूल्यांकन के लिए मुहर की तरह हो गया है। टीनएजर्स को खु़द से पूछना चाहिए कि क्या यह वही है, जिसे वह करना चाहते हैं? बदक़िस्मती से वे खु़द से यह सवाल तब पूछते हैं जब एक साल बीत जाता है।
4. अकेलापन : छोटे शहरों के टीनएजर्स को बड़े शहरों के बच्चों से जुड़ने में कठिनाई होती है। उनके पास बात करने के लिए कोई नहीं होता है। दोस्तों में भी कॉम्पीटिशन शुरू हो जाता है, वे कई बार नुक़सान भी पहुंचाने लगते हैं।  
5. कोई प्रोफ़ेशनल मदद नहीं : ऐसी परिस्थितियों में प्रोफ़ेशनल से सम्पर्क करके मदद लेना कारगर होता है। बदक़िस्मती से कई के पास प्रोफे़शनल हेल्प नहीं पहुंचती है।

देशभर के टीनएजर्स के लिए आपका संदेश? 
-पढ़ाई आपके लिए खु़द के मूल्यांकन की मुहर नहीं होनी चाहिए। टीनएजर्स सोचते हैं कि यदि मैं 90 प्रतिशत नम्बर लाता हूं, तभी मेरा होना सार्थक है। मुझे सभी टीनएजर्स से कहना है कि आप जो अंदर से हैं, वही आपका मूल्य है। परीक्षा के मार्क्स सिर्फ़ नम्बर्स हैं, जो आएंगे और जाएंगे। अगर वे खु़द को इस नज़रिये के साथ अलग होकर देखेंगे तो, वे खु़श रहेंगे।
    
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टीन एब्यूज़ को समझिए डॉ. सीमा हिंगोरानी के साथ : 2 -क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एवं ट्रॉमा एक्सपर्ट

टीन एब्यूज़ को समझिए डॉ. सीमा हिंगोरानी के साथ : 2 -क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एवं ट्रॉमा एक्सपर्ट
Ritika SrivastavaTeentalkindia Counsellor

खु़द के प्रति जागरुक रहने वाले टीन्स सशक्त होते हैं। जो युवा अपनी इमोशनल हेल्थ की समस्याओं को पहचानते हैं और उनसे खु़द निपटने में सक्षम होते हैं, उनके साथ कोई ग़लत व्यवहार नहीं कर सकता। अगर आप भी अपनी इमोशनल हेल्थ पर नियंत्रण रखना चाहते हैं तो डॉ. सीमा हिंगोरानी यहां कुछ सलाह दे रही हैं। आइए, उनके बारे में पढ़ते हैं :

-क्या निग्लेक्ट को एब्यूज़ माना जा सकता है? अगर किसी टीनएजर को उसके पैरेंट्स या किसी और के द्वारा ज़िंदगी के शुरुआती दौर में निग्लेक्ट किया जाता है, तो क्या यह उस टीनएजर के व्यवहार में दिखाई देगा?
-हां, इमोशनल निग्लेक्ट भी एब्यूज़ की श्रेणी में ही आता है। ज़्यादातर उपेक्षा के केस जो मैंने देखे हैं, उनमें कुछ ड्रग्स के शिकार होते हैं, कुछ स्मोकिंग या ड्रिंक करने लगते हैं। ये बच्चे या तो लोगों को धमकाने लगते हैं या फिर इन्हें आसपास के लोगों द्वारा धमकाने की आशंका अधिक होती है। इन निग्लेक्टेड बच्चों पर किसी का फ़ोकस नहीं होता है। ये या तो लोगों से बहुत अधिक जुड़ाव रखते हैं या खु़द में ही डूबे रहने वाले नार्सिसिस्ट पर्सनैलिटी डिसॉर्डर अपने अंदर डेवलप कर लेते हैं। ये सभी कॉम्प्लेक्स केस पीटीएसडी (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) के हैं। ये सभी बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर शुरुआती समय में होने वाली उपेक्षा की वजह से होते हैं। ये मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं भावनात्मक संतुष्टि की कमी और पैरेंट्स से सही केयर न मिलने की वजह से भी हो सकती हैं। 

-उन टीनएजर्स के लिए आपका क्या संदेश है, जो हॉस्टल्स में रह रहे हैं और साइकोलॉजिकल एब्यूज़ से ग्रसित हैं? 
-बोलिए। फिर से कहती हूं, बात करना ज़रूरी है। अपने पैरेंट्स से, किसी भरोसेमंद रिश्तेदार से या फिर किसी साइकोलॉजिस्ट से बात करें। आप जिससे भी बात करने में सहज हों, बस उससे बात करें। यह भी थैरेपी से ही सम्बंधित है। जब आप अपने थैरेपिस्ट से इलाज कराना शुरू करते हैं, तो इससे मदद मिलती है।

-लड़कों के लिए अपने दुख या फिर कड़वे अनुभवों के बारे में बात करना कितना आसान या कठिन होता है? 
-पुरुष बात नहीं करते। ज़्यादातर पुरुषों को कहा जाता है कि वे बात न करें और ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें बताया गया है कि मर्द रोते नहीं हैं। टीनएजर लड़के जब यहां आकर बैठते हैं तो ऊपर और नीचे की ओर देखते रहते हैं मगर मेरी तरफ़ नहीं देखते। खुलकर बातें नहीं करते। हालांकि आज के टीनएजर लड़के कुछ साल पहले के लड़कों की तुलना में बेहतर हैं। लेकिन उनमें यह फिर भी है कि आप लड़के हैं, आप कमज़ोर नहीं हो सकते। क्योंकि आप कमज़ोर पड़ेंगे तो परिवार की देखभाल कौन करेगा? लड़कियों की तरह कमज़ोर और ओवरथिंकिंग करने वाले मत बनो, ये उनको कहा जाता है। यह अब इमोशनल एब्यूज़ ही है। यह वह दबाव है, जो पैट्रिआर्की लड़कों पर डालती है। जब कोई टीनएजर मेरे सामने आख़िर में टूट जाता है तो वो कहता है कि यह पहली बार है, जब उसने हक़ीक़त में अपनी भावनाओं को स्वीकार किया है और वे किसी महिला के सामने रोए हैं। यानी कि लड़के एक महिला के सामने रोने को लेकर शर्मिंदगी महसूस करते हैं। लड़कों को भी अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त करने का पूरा अधिकार होना चाहिए।

-टीनएजर्स को किसी भी तरह के ट्रॉमा के बाद के प्रभावों का सामना कैसे करना चाहिए और साथ ही साथ उन बदलाव से किस तरह निपटना चाहिए, जिनका सामना वो अक्सर करते हैं?  
-अगर एक बार का दर्दनाक अनुभव है तो परिवार का सहयोग और समय उसे ठीक कर सकता है, लेकिन अधिकांश गम्भीर एब्यूज़ के मामलों में मदद की आवश्यकता होती है, क्योंकि किसी भी प्रकार का एब्यूज़ साइकोलॉजिकल डिसॉर्डर के रूप में सामने आ सकता है। दूसरी बात, मैं यह सजेशन देती हूं कि ऐसे टीनएजर प्यूबिक और हार्मोनल चेंजेस के बारे में पढ़ते और जानकारी रखते हैं। इसलिए उन्हें पता होता है कि उनके साथ क्या हो रहा है। यह बात काफ़ी हद तक पैरेंट्स और उनकी एजुकेशन और एटिट्यूड पर निर्भर करती है। 

-देश के टीनएजर्स और पैरेंट्स के लिए मेंटल हेल्थ को लेकर आपका क्या संदेश है? 
-मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रही हूं क्योंकि मैं एक साइकोलॉजिस्ट हूं, मगर मेरा संदेश टीन्स और पैरेंट्स के लिए यही है कि मानसिक तौर पर स्वस्थ और अच्छा रहना बेहद ज़रूरी है। यदि आपके पास स्वस्थ दिमाग़ है, तो सब कुछ आपके क़दमों में आ गिरेगा। पैरेंट‌्स के लिए मेरा मैसेज है कि बच्चों पर अपनी इनसिक्योरिटीज़ और डर को प्रोजेक्ट न करें। मैं बहुत-से पैरेंट्स से कहती हूं कि आपको ख़ुद मदद की ज़रूरत है, तभी आप अपने बच्चे को बेहतर तरीके़ से समझ सकते हैं। 

मेरे पास एक पैरेंट्स के मानसिक तौर पर टूटने से जुड़ी एक घटना है, जब उन्हें अहसास होता है कि वे क्या कर रहे हैं। मेरे पास एक क्लाइंट आया था, जो तब टूट गया जब उसने महसूस किया कि वह उसकी बेटी के साथ एब्यूज़ कर रहा है। वह अपनी बेटी को डस्टबिन में फेंका गया फ़ूड लाने और उसे खाने के लिए सिर्फ़ इसलिए कहता था क्योंकि वह उसे हम्बल बनाना चाहता था। यह सब इसलिए क्योंकि उसके साथ उसके पैरेंट्स ने भी ऐसा ही व्यवहार किया था। मुझे उन्हें यह अहसास दिलाना था कि ऐसा एक सामान्य व्यक्ति को नहीं करना चाहिए, इसलिए आपको ख़ुद थैरेपी की ज़रूरत है। लेकिन कुछ पैरेंट्स इन बातों की परवाह नहीं करते हैं क्योंकि हमारे देश में लोग नम्बर्स और आईआईटी और इंजीनियरिंग और मेडिकल पर इतना फ़ोकस करते हैं कि वे किसी और चीज़ पर ध्यान ही नहीं दे पाते हैं। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने ताकि वे पड़ोसियों और रिश्तेदारों को दिखा सकें। 

इसलिए मेरा सजेशन है कि पैरेंट्स अपने बच्चों की ज़रूरतों को अधिक गम्भीरता से लें। 

-क्या एब्यूज़ आत्महत्या की वजह बन सकता है? 
-एब्यूज़ के कारण आत्महत्या होने की आशंका सबसे अधिक होती है क्योंकि कोई भी वास्तव में ख़ुद को मारना नहीं चाहता है। आत्महत्या हमेशा मदद न मिलने पर ही की जाती है, जब किसी व्यक्ति को लगता है कि कोई उसे प्यार नहीं करता है, और कोई भी उसकी मदद नहीं करेगा, तब वह अपनी जान ले लेता है। आत्महत्या की कोशिश करने वाले अधिकांश लोगों ने मुझे बताया है कि वे सिर्फ़ लोगों को बताना चाहते थे कि मैं यहां हूं और क्या आप मुझे सुन सकते हैं? तो प्लीज़ ध्यान दें कि ट्रॉमा और एब्यूज़ दोनों हमारे जीवन में मौजूद हैं और टीन्स और पैरेंट्स दोनों के लिए मेरा संदेश यह है कि आप असहाय महसूस नहीं करें। हम आपकी मदद के लिए मौजूद हैं।
 
-हमारे देश में एब्यूज़ को लेकर क्या नज़रिया है? उसमें कहां भूल होती है?
-यह बेहद दु:ख की बात है कि हमने अपने टीन्स को अपनी भावनाओं को व्यक्त करना ही नहीं सिखाया है। यहां तक कि यदि कोई बच्चा अपने पैरेंट्स को बताए कि किसी व्यक्ति ने उसे सेक्शुअली एब्यूज़ किया है तो पैरेंट्स उसे ही चुप रहने के लिए कहेंगे, क्योकि उन्हें विरोध करने से डर लगता है। उन्हें इस बात का भी डर होता है कि अगर उनकी संतान कोई लड़की है तो कोई भी उससे शादी नहीं करेगा। यह नहीं होना चाहिए। 

मैं पैरेंट्स को कहती हूं कि यदि आप पुलिस से शिक़ायत नहीं करना चाहते हैं तो कम से कम उस रिश्तेदार के पास जाएं और उसका सामना तो करें। हमारे देश में टीन्स को ऐसे ट्रीट किया जाता है कि जैसे कि सब चीज़ें शादी होने का ही इंतज़ार कर रही हों। पैरेंट्स बच्चों से जुड़े एब्यूज़ के मामलों में कुछ करने को तैयार ही नहीं हैं। वे हमें कहते हैं कि आपके इस कमरे में ही कोई समाधान हो सकता है तो बता दीजिए। 

कभी-कभी मैंने पाया है कि कोई वन-टाइम असॉल्ट होता है, कभी किसी कुक या ड्राइवर के द्वारा और ये छोटे बच्चे होते हैं, इसलिए इस बारे में किसी से बात नहीं करते।

इसलिए एब्यूज़ से निपटने का एकमात्र तरीक़ा यह है कि आप इसे समझें कि आपको इसकी रिपोर्ट करनी ही है और इसके बारे में बात करनी है। आप जिस पर भरोसा करते हैं, उस तक पहुंचें, और इसके बारे में बात करें। यह जान लें कि गु़स्सा होना ठीक है और दु:खी होना भी ठीक है, लेकिन भावनाओं में एक बैंडविड्थ होती है और आपको उन्हें ओवरड्राइव में नहीं जाना चाहिए।
 

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