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सेक्स के बारे में वे 10 सवाल जो आप पैरेंट्स से नहीं पूछ पाते हैं

राजन भोसले, एमडी, सेक्शोलॉजिस्ट, सेक्शुअलिटी से संबंधित कई मिथक


सेक्स के बारे में बात करने में पैरेंट्स अनकंफर्टेबल क्यों होते हैं?

उन्हें भी अपने बच्चों की तरह कोई सेक्स एजुकेशन नहीं मिला था।  
उन्होंने यही सीखा है कि सेक्स इतना गंदा शब्द है कि इसके बारे में मुंह से बोला भी नहीं जा सकता है। 
उन्हें इस बात से डर लगता है कि इस बारे में बात करने के लिए उनके पास न सही जवाब हैं और न ही शब्द। 
उनके लिए ये स्वीकार करना कठिन होता है कि उनके बच्चे सेक्शुअल हैं। 
कुछ लोग अपने और अपने बच्चे के बीच सेक्शुअल फीलिंग्स की आशंका से डरते हैं। 

क्या सेक्स या सेक्शुअलिटी के बारे में बात करने की कोई सही उम्र होना चाहिए? 

सेक्स के बारे में बच्चों के सवालों का जवाब देना उन जिम्मेदारियों में से एक है, जिनसे कई पैरेंट्स सबसे ज़्यादा डरते हैं। बचपन मासूमियत का दौर है, लेकिन एडल्ट्स के लिए सेक्स इतना मासूम विषय नहीं है। यहां कुछ प्वाइंट्स को ध्यान में रखना ज़रूरी है :

• बचपन से ही बच्चों में अपनी बॉडी को लेकर क्यूरियोसिटी होती है, जो बिल्कुल नॉर्मल और हेल्दी है।
• जितना जल्दी हो सके बच्चों को सेक्शुअल मैसेज देना शुरू करना सबसे अच्छा है। बच्चे के जन्म के बाद से ही जितनी जल्दी हो सके उसे इस बारे में जानकारी देनी चाहिए। 
• सबसे ज़रूरी बात यह है कि जब भी कोई बच्चा बात करना चाहता है, तो उसके लिए ओपन और अवेलेबल रहें। 
• जब बच्चा तीन साल का होता है, तब पैरेंट्स को जेनाइटल्स समेत बॉडी के सभी पार्ट्स के बारे में सही शारीरिक शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए। पेनिस और वजाइना जैसे शब्दों को भी तथ्यात्मक रूप से साझा किया जाना चाहिए।
• तीन से छह साल की उम्र के बच्चों को अपने पैरेंट्स पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है। 5 साल की उम्र में, आप एक्टिवली उन किताबों को इंट्रोड्यूस करना शुरू कर सकते हैं, जो सेक्शुअलिटी डेवलपमेंट के हर लेवल का सामना करना सिखाए। 

क्या छोटी उम्र में बच्चों से सेक्स के बारे में बात करना बच्चों को कम उम्र में सेक्शुअली एक्टिव होने के लिए उकसाता है?

अगर बच्चों पर किसी तरह का कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं होता है कि वे क्या पूछ सकते हैं और घर में किस बारे में खुलकर बात कर सकते हैं और उन्हें जब जिस जानकारी की ज़रूरत हो, वह उन्हें मिल जाती है, तो ऐसी स्थिति में वे सेक्स को लेकर सही फैसेले ले सकते हैं। इससे वे किसी भी तरह के सेक्शुअल एब्यूज और हैरेसमेंट से बच सकते हैं और वे इसे रोकने में भी सशक्त होते हैं, इस बारे में खुलकर बात करते हैं और तुरंत रिपोर्ट करते हैं।

सेक्स के बारे में ऐसी कौन सी वैल्यूज़ हैं, जो टीनएजर्स को पता होनी चाहिए? 

ज़िंदगी को आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी इस प्राकृतिक प्रवृत्ति को वैज्ञानिक समझ के आधार पर जानना चाहिए। युवा पीढ़ी को सेक्स के प्रति हेल्दी एटीट्यूड अपनाने पर ज़ोर दिया जाता है। यहां कुछ प्वाइंट्स हैं, जिन्हें दिमाग में रखना ज़रूरी है : 
 
सेक्शुअलिटी इंसान की ज़िंदंगी का एक नेचरल और नॉर्मल हिस्सा है। 
युवा अपनी सेक्शुअलिटी को सेक्शुअल मैच्योरिटी प्राप्त करने की एक नेचरल प्रोसेस के रूप में देखते हैं।
सेक्शुअलिटी से जुड़े हर फैसले के प्रभाव और परिणाम होते हैं। 
सेक्स के बारे में जब बच्चे अपने पैरेंट्स, फैमिली डॉक्टर्स, टीचर्स और अन्य विश्वसनीय एडल्ट्स से बिना झिझक के चर्चा करेंगे तो उसका फायदा हर बच्चे और पूरे समाज को होगा। 
समय से पहले सेक्शुअल बिहेवियर खतरा पैदा करता है। 

लड़कियों को पीरियड्स के कॉन्सेप्ट के बारे में कब बताना चाहिए? 

आठ से बारह साल की उम्र प्रीटीन्स होती है और यह सेक्शुअली अवेयर होने की उम्र है। लड़कियों को पहली बार पीरियड्स आने से पहले इसके लिए तैयार करना ज़रूरी है, ताकि पहली बार पीरियड्स आने पर वो घबराएं नहीं, और ऐसे में किसी की मदद न मिलने पर फिजिकली और इमोशनली तैयार रहें।

अपनी वर्जिनिटी खोने के बारे में फैसला करने से पहले आपको कौन सी चीजें पता होनी चाहिए? 

यह रिप्रोडक्टिव सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि बॉडी अभी भी परिपक्व होने की प्रोसेस में हो सकती है। सेक्शुअल एक्सपेरिमेंट की वजह से सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिसीज होने का खतरा सबसे ज़्यादा होता है। साथ ही, सेक्शुअल रिलेशनशिप के कारण कभी भी किसी को फिजिकली या साइकोलॉजिकली नुकसान नहीं पहुंचाएं। न इस वजह से किसी को मजबूर करें, न ही शोषण करें या इसमें शामिल हों।
• एचआईवी समेत एसटीडी पेनिट्रेटिव इंटरकोर्स, ओरल सेक्स और डीप किसिंग आदि के माध्यम से बॉडी फ्लूड से एक व्यक्ति से दूसरे में पहुंच सकता है। 
• कंडोम या कोई फीमेल कॉन्ट्रिसेप्टिव 100 फीसदी सुरक्षित नहीं है।  
• यदि आप प्रैग्नेंट हो जाती हैं, तो प्रैग्नेंसी को कंटीन्यू करेंगी या फिर टर्मिनेंट करेंगी, इस बारे में भी विचार करना चाहिए। 

स्वप्नदोष क्या है?
लड़कों / पुरुषों को कभी-कभी नींद के दौरान सीमन निकलता है। इसे स्वप्नदोष, वेट ड्रीम या नाइट फॉल कहते हैं। यह सेक्शुअल तनाव की वजह से होने वाला सामान्य, नेचरल और अनकंट्रोल्ड रिएक्शन है।
12-13 साल की उम्र में, लड़कों में स्पर्म बनने लगते हैं। इस उम्र में लड़के सेक्शुअल अट्रैक्शन डेवलप करना शुरू कर देते हैं और नींद के दौरान सीमन डिस्चार्ज होने लगता है। स्वप्नदोष या वेट ड्रीम के बारे में चिंतित, डरा हुआ या दोषी महसूस करने का कोई कारण नहीं है। यह सभी लड़कों / पुरुषों के साथ होता है और यह कोई बीमारी नहीं है।

स्पर्म का रिलीज़ होना
जब आप युवावस्था में पहुंचते हैं, तो आप यह नोटिस करना शुरू कर सकते हैं कि यदि आप सेक्शुअली एक्साइटेड हो गए हैं, तो एक अलग फ्लूड इरेक्ट पेनिस से बाहर निकलता है। इसका रंग मिल्की और यह चिपचिपा होता है। यह सीमन है। इसे सेक्शुअल प्लेजर, जिसे ऑर्गेज्म या क्लाइमेक्स भी कहते हैं, में अनुभव करते हैं। सीमन के बाहर आने को इजेक्युलेशन भी कहते हैं। चिपचिपा ट्रांसपैरेंट फ्लूड जो स्खलन से पहले पेनिस से बाहर निकलता है, उसे प्री-इजैक्युलेट या प्री-कम भी कहते हैं। प्री-कम में स्पर्म हो सकते हैं और प्रैग्नेंसी का कारण बन सकते हैं।

क्या मास्टरबेशन अच्छा है? 
यह फिजियोलॉजिकली नुकसानदायक एक्टिविटी नहीं है। आम मान्यताओं के विपरीत, यह पुरुषों के लिए या महिलाओं के लिए खतरनाक, बुरी एक्टिविटी नहीं है और न ही ऐसा करना कोई पाप है। यह नेचरल और नॉर्मल है। फैक्ट की यदि बात करें तो यह सेक्शुअल टेंशन से राहत पाने का एक सुरक्षित और सरल तरीका है। हालांकि, मास्टरबेशन से जुड़ी शर्म, चिंता, गिल्ट, मतभेद की भावना किसी के इमोशनल हेल्थ और आत्म-सम्मान के लिए नुकसानदायक हो सकती है। एक व्यक्ति को एक दिन में कितनी बार मास्टरबेशन करना चाहिए, इसकी कोई निश्चित सुरक्षित संख्या नहीं है। जब इसके कारण उसकी ज़िंदगी की दूसरी चीजें प्रभावित होने लगें तो यह नुकसानदायक हो सकता है। कुछ लोग मास्टरबेशन धार्मिक, सांस्कृतिक या पर्सनल कारणों से नहीं करना चाहते हैं। यह भी ठीक है। यदि कोई मास्टरबेशन के साथ कंफर्टेबल नहीं है, तो भी उसकी सेक्स लाइफ नॉर्मल, हेल्दी और अच्छी होगी। 

पोर्न देखने का क्या असर होता है? 
रिसर्च से पता चला है कि पोर्नोग्राफी और उसके मैसेज उस तरह के एटीट्यूड को विकसित करने और उस तरह के व्यवहार को करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जो व्यक्ति और उनके परिवारों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पोर्नोग्राफी अक्सर गुप्त रूप से देखी जाती है, जो शादी में धोखा पैदा करती है जिससे कुछ मामलों में तलाक भी हो सकता है। पोर्नोग्राफी सामान्य तौर पर एब्यूज और रेप मिथ को सपोर्ट करती है (जैसे महिलाएं फोर्सफुल सेक्स को एंजॉय करती हैं) और सेक्स क्राइम को बढ़ाती है। पोर्न देखना एक एडिक्शन हो सकता है। यह निम्नलिखित चार स्टेज में आगे बढ़ता है : 

1. एडिक्शन : पोर्नोग्राफी एक पावरफुल सेक्शुअल स्टिम्युलेट है या एप्रोडिसियक इफेक्ट देती है। इसकी वजह से सेक्शुअल रिलीज होता है, ज्यादातर मास्टरबेशन के रूप में। 
2. एडिक्शन बढ़ना : समय के साथ, एडिक्ट व्यक्ति को अपनी सेक्शुअल जरूरतों को पूरा करने के लिए राह भटकाने वाली चीजें अधिक चाहिए होती हैं। 
3.असंवेदनशीलता : पहले जिसे भद्दा, शॉकिंग और परेशान करने वाला माना जाता था, समय के साथ कॉमन और स्वीकार्य हो जाता है। व्यक्ति में असंवेदनशीलता आ जाती है। 
4. सेक्शुअल एक्टिंग : पोर्नोग्राफी में देखे जाने वाले बिहेवियर को देखकर रियल लाइफ में करने की टेंडेंसी पिछले कुछ समय में लगातार बढ़ रही है। 

इंटरव्यू के कुछ अंश डॉ. राजन भोसले की पुस्तक द कम्प्लीट बुक ऑफ़ सेक्स एजुकेशन से लिए गए हैं।

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Ritika SrivastavaTeentalkindia Counsellor

डियर टीनटॉकर्स, 

मैंने इस बात को ज़िंदगी में बहुत जल्दी समझ लिया था कि, मैं लोगों के नार्मल कहलाने वाले विचार में फिट नहीं होता हूं। मेरी उम्र के दूसरे लड़कों से जैसे एक्सपेक्ट किया जाता था, मैं वैसे बिहेव नहीं करता था। मुझे अहसास हुआ कि लड़कों से अपेक्षा की जाती है कि वे नीले रंग को पसंद करें, कार और जी आई जो जैसे खिलौनों से खेलें। उन्हें मैदानी खेल खेलना चाहिए और रोना नहीं चाहिए। लड़कों को हमेशा बताया जाता था कि अपनी भावनाओं को लोगों को दिखाना कमजोरी है यानी लड़की की तरह होना है। 

लेकिन फिर मैंने इन लोगों की तरह से देखना शुरू किया। वैसे भी वे लोग कौन थे जिन्होंने यह तय किया कि किसी को कैसे बात करना चाहिए, कैसे कपड़े पहनना चाहिए और एक बच्चे को कौन से खिलौनों से खेलना चाहिए? कौन तय करता है कि गर्लिश और बॉयिश क्वालिटी क्या हैं? कौन तय करता है कि महिला और पुरुष को कैसे महसूस करना चाहिए और ज़िंदगी में आने वाली किन परिस्थितियों का हमें कैसे सामना करना चाहिए? 

परिवार ही आधार है : मेरी ज़िंदगी में एक अच्छी बात यह रही कि, मुझे एक ऐसे परिवार में रहने का सौभाग्य मिला है जिसने मुझपर कभी कोई दबाव नहीं बनाया। मुझे अपने ढंग से बड़े होने दिया। मैंने हीमेन की जगह बार्बी को चुना और मैँ जो भी रंग चाहता था, उस रंग के कपड़े पहन सकता था। एक इंट्रेस्टिंग बात यह है कि, मेरे एक बड़े भाई हैं, उन्हें भी पेरेंट्स ने मेरी ही तरह यह आज़ादी दी कि वे जो चाहे कर सकते थे, जो ख़ेल चाहे खेल सकते थे। मेरे पेरेंट्स ने हम दोनों भाईयों को वो सब करने दिया जो हम करना चाहते थे। हां। मैं लकी हूं कि मुझे ण्क ऐसा परिवार मिला, जिसने इस बात को कभी नहीं सोचा कि जेंडर स्टीरियोस्टाइप के हिसाब से लोगों ने जो नियम बनाए हैं, उनके हिसाब से मैं एक अबनॉर्मल मेल चाइल्ड हूं।

एक बच्चा तब तक नफ़रत या भेदभाव नहीं करता जब तक उसे सिखाया न जाए : जब मैं स्कूल में था, मैंने देखा कि मेरी क्लास के ज्यादातर लड़के जिस तरीके से बात कर रहे थे, व्यवहार कर रहे थे मैं उस तरह से ख़ुद को उनसे रिलेट नहीं कर पा रहा था। मैंने महूसस किया कि उनमें से ज्यादातर लोगों ने मुझे भी अलग ढंग से देखा। ऐसा नहीं है कि यह बात मेरे लिए ज्यादा मायने रखती है क्योंकि उनमें से कई मेरे अच्छे फ्रेंड्स थे, जो मेरे हमेशा साथ थे और मैं जब भी अपने लिए कोई सही दूल्हा खोजता तो वे मेरी शादी में फूल सजाने वाले थे। वे फ्रेंड्स तब से लेकर अब तक मेरे साथ खड़े हैं और मैंने जो कुछ भी किया उसमें उन्होंने मेरा हमेशा साथ दिया। 

पितृसत्ता को दोष : इनमें से कुछ लड़के ऐसे थे, जो कभी मेरे करीब नहीं आए, क्या इसमें उनका दोष था? या जिस सामाजिक ढांचे ने उन्हें ऐसा बना दिया उसका? मुझे लगता है कि यह उनके आसपास मौजूद जेंडर स्टीरियोटाइप का ही नतीजा था।

हर किसी की राय में, मैं एक बेबकूफ हूं : मेरा नाम कई बार पुकारा जाता था मगर ज्यादा फिजिकल फाइट के कारण नहीं। यह एक ऑल बॉयज स्कूल था और मैं एक स्पोर्ट्सपर्सन था (लोग सरप्राइज थे कि कोई गे होकर कैसे स्पोर्ट्स खेल सकता है)। मैं एक अच्छा स्विमर और स्कूल की स्पोर्ट्स टीम का कैप्टन था। मैंने पढ़ाई में भी अच्छा परफॉर्मेंस किया, मैंने लेंग्वेज और हिस्ट्री में टॉप किया। तो आप देखें, गे होने का आपकी ज़िंदगी में कामयाबी और नाकामयाबी पर कोई असर नहीं होता है। 

मेरे पास कुछ बहुत अच्छे फ्रेंड्स थे और मेरे परिवार में भी कुछ ऐसे लोग थे। उन्होंने नींव रखी और मुझे ज्यादा आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना सिखाया। मैँने कॉलेज लाइफ बहुत आराम से बितायी। मेरी त्वचा की वजह से ज़रूर कुछ बच्चे मेरे लिए बुरे थे, मगर उनमें से किसी ने भी मुझे डराया नहीं और मेरी बेबकूफी पर दोबारा विचार किया। 

टीनटॉक काउंसलर क्षितिजा सावंत इस मामले में कहती हैं कि, हमसफर सेंटर में एक काउंसलर ने एक स्टडी की है। उनके रिसर्च का उद्देश्य भारतीय समाज के संदर्भ में होमोसेक्शुयलिटी को लेकर होमोसेक्शुअल लोगों को किस तरह की समस्याओं का सामना करना होता है। इसका अध्ययन करना है। उनके रिसर्च में सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह सामने आई कि सेक्शुअलिटी को लेकर व्यक्ति के अपने परिवार के सदस्य भी स्वीकार करने की स्थिति में नहीं होते हैं। सभी 16 जवाब देने वालों ने बताया कि, अपनी सेक्शुयलिटी या ओरिएंटेशन के बारे में अपने पेरेंट्स के सामने जाहिर करने में उन्हें सबसे ज्यादा पीड़ा हुई। कुछ पेरेंट्स दूसरे लोगों में होमोसेक्शुअलिटी को तो स्वीकार कर लेते हैं लेकिन वे अपने ख़ुद के परिवार में इसे स्वीकार नहीं करते हैं। कुछ पेरेंट्स होमोसेक्शुयलिटी को सेक्शुयल ओरिएंटेशन नहीं बल्कि सेक्शुयल एक्सपेरिमेंट मानते हैं।

कर्म ही चाबी है : आखिर में मैं ऐसे लोगों की मदद करना चाहूंगा, जिनके भाग्य में सपोर्टिव फैमली और फ्रेंड्स नहीं हैं। मैं अपने कॉलेज के साइकोलॉजी डिपार्टमेंट के साथ वॉलेंटियर के रूप में कॉलेज के उन स्टूडेंट्स के लिए काम करूंगा, जो जेंडर और सेक्शुयल ओरिएंटेशन के कारण दोस्तों के द्वारा किए जा रहे भेदभाव का सामना करते हैं और बुलिंग का भी शिकार होते हैं। मैंने ख़ुद को ओपरा का मेल वर्जन महसूस किया, हर किसी की मदद करने की कोशिश की। 

लोग अपनी समस्याओं के बारे में सोशल मीडिया पर मुझे लिखेंगे (हां हमारे पास सोशल मीडिया था, जब मैं कॉलेज में था लेकिन तब मैं उस पर नहीं था) मुझे अहसास हुआ कि मेरे बड़े होने का सफर जितना अच्छा रहा, अधिकांश गे लोगों को उतना अच्छा माहौल और परवरिश नहीं मिलती है। मुझे अहसास हुआ कि, ज्यादातर समय उन्हें अपने करीबी लोगों के एक्शन और रिएक्शन की वजह से तकलीफ हुई। वे बाहर से आए थे, गे, लेस्बियन या बाइसेक्शुअल थे, इसलिए उन्हें उनके दोस्तों ने छोड़ दिया था, इसलिए वे टूट गए थे।

जब मैंने अपनी उम्र के लोगों को इस तरह की कशमकश से उलझते हुए देखा तो मैंने अपनी ज़िंदगी के सितारों को धन्यवाद दिया। मुझे बहुत दुख हुआ क्योंकि इन लोगों को उनके करीबी लोगों ने यूनिक मान लिया था। मुझे समझ में नहीं आता है कि लोग दूसरों के लिए रंग, नस्ल और सेक्शुयल ओरिएंटेशन कैसे चुनते हैं। मैंने गे होने का विकल्प ख़ुद से नहीं चुना, जैसे लोग स्ट्रेट होने का विकल्प ख़ुद नहीं चुनते हैं, वे बस होते हैं। 

मैं इसे पढ़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति को केवल यह बताना चाहता हूं कि यदि आप अब भी कोशिश कर रहे हैं और कुछ बनने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप यूनिक हैं। यदि अब भी आप ऐसे व्यक्ति बन रहे हैं, जो ख़ुद को सिर्फ इसलिए पीछे धकेल देता है ताकि लोग उससे सवाल न पूछें। तो यह सही नहीं है। आपको ऐसा कभी नहीं करना चाहिए और लोग आपको भले इन बॉक्स में फिट करने की कोशिश करें लेकिन नहीं होना चाहिए। अगर आपको चमकता हुआ सितारा बनने के लिए बनाया गया था तो किसी भी व्यक्ति को अपने मनोबल और आत्मसम्मान को नहीं तोड़ने देना चाहिए। वास्तव में आपको वह सब करना चाहिए जिससे आप ख़ुद को खुश  रखें और अपना ही बेस्ट वर्जन बनें। 

यह ख़त उन सभी के लिए है, जो अपने कठिन समय में ख़ुद पर सबसे अच्छा करने का भरोसा कर सकते हैं, उन सभी के लिए मेरी तरफ से एक बड़ा सा वर्चुअल हग है। आप जब भी स्पेशल महसूस करना चाहें, आपको बस एक मिरर की ज़रूरत है। ख़ुद को बताएं कि आप इसके लायक हैं। ख़ुद को मोटीवेट करें, ख़ुद को समझने के लिए वक्त दें। आपके पास सबसे अच्छी कंपनी अपनी ख़ुद की है। 

ढेर सारा प्यार, 

सुशांत 

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