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दो बेस्ट फ्रेंड्स की कहानी, जिनमें से एक ने अपनी कलाई काट ली थी...

क्या डिप्रेशन की वजह से ज़िंदगी के ठहर जाने की समस्या का कोई समाधान है? केशव की मानसिक बीमारी को हराने की कहानी पढ़िए?

राहुल और केशव बेस्ट फ्रेंड्स थे। वे मैथ्स की ट्यूशन पढ़ने साथ-साथ जाते थे, बीटल्स को घंटों साथ सुनते, नडाल और फे़डरर को लेकर एक-दूसरे से लंबी बहसें करते, स्कूल ट्रिप्स पर साथ जाते और इंस्टाग्राम पर एक-दूसरे के एम्बैरेसिंग वीडियोज़ पोस्ट करके मज़ाक भी उड़ाते थे।

इस दोस्ती को चट्‌टान जैसा मजबूत बनने में दस साल का समय लगा था, लेकिन सिर्फ एक दिन में यह दस लाख टुकड़ों में टूटकर बिखर गई। यह वह दिन था, जब केशव अंदर से इतना टूट गया कि उसने अपनी कलाई की नस काट ली। परिवार के लोग इसका कारण खोजने में लग गए कि क्यों उसने आत्महत्या करने की कोशिश की, मगर वे नहीं समझ सके। इस हादसे के बाद धीरे-धीरे केशव का ध्यान मैथ्स पर भी लगना कम होता गया, उसे म्यूज़िक सुनने से भी चिड़चिड़ाहट होने लगी, यहां तक कि उसका पसंदीदा बीटल्स सॉन्ग हे ज्यूड भी अब उसे खु़श नहीं कर पा रहा था, टेनिस में भी उसकी रुचि कम होने लगी। वह ज्यादातर वक्त ख़ुद को कमरे में कैद रखने लगा और सोशल मीडिया से भी दूरी बना ली। 

दोस्तों ने मान लिया कि वह एक अलग दौर से गुजर रहा है। राहुल इस घटना से अनजान था, मगर वह अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ रहा था। राहुल के पास समय नहीं था। वह स्कूल की टेनिस टीम का कप्तान बन गया था और केशव को अपने बेस्ट फ्रेंड से जलन होने लगी थी। केशव की मां ने जब दीपिका पादुकोण के डिप्रेशन के सफ़र के बारे में पढ़ा, तब उन्हें समझ में आया कि उनके बेटे के साथ क्या ग़लत हो रहा था। वो एक साइकोलॉजिस्ट के संपर्क में आईं और उन्होंने उसके साथ एक मीटिंग तय की। जल्द ही उन्हें पता चल गया कि उनका बेटा केशव भी डिप्रेशन से पीड़ित था।

 

आपको डिप्रेशन को लेकर कन्फ्यूज़ नहीं होना चाहिए। सभी की ज़िंदगी में अलग-अलग दौर होते हैं- उदासी के बादल, अकेलेपन का दौर, यहां तक कि एक महीने तक छाई रहने वाली मायूसी, मगर वह आती है और चली जाती है। डिप्रेशन एक मानसिक बीमारी है, जिसका इलाज डॉक्टर को करना होता है। कल्पना करके देखिए कि आप 400 मीटर की दौड़ में तेज़ रफ़्तार से भाग रहे हैं, जिसमें हवा आपके चेहरे से टकराती है और आपके एड्रेनेलिन हार्मोन को एक अकल्पनीय स्तर तक लेकर जाती है। तभी अचानक आपके शू-लेस खुल जाते हैं, जूतों के बीच फंस जाते हैं और आप ज़मीन पर गिर जाते हैं। अगले ही पल आपकी कमीज़ खू़न से लथपथ हो जाती है। ऐसे में चोट का इलाज कराने के लिए तुरंत हॉस्पिटल जाना होता है। उसी तरह हमारे दिमाग का भी जब एक्सीडेंट होता है, तो हमें डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि घाव दिखाई नहीं दे रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि इसे मेडिकल ट्रीटमेंट की आवश्यकता नहीं है। 

केशव ने कैसा महसूस किया : 

-जिन चीजों को करने में पहले केशव को मज़ा आता था, उसकी अब उन एक्टिविटीज़ में रुचि नहीं रही।
-वह बिना किसी जायज़ कारण के लगातार रोता रहता था। 
- उसे सहज ही अपने दोस्त की उपलब्धियों से जलन होने लगी। 
- वह ड्रग्स का एडिक्ट हो गया। 
-उसके दिमाग़ में आत्महत्या के विचार आने लगे।

टीनटॉक इंडिया एक्सपर्ट क्षितिजा सावंत कुछ टिप्स दे रही हैं कि कैसे डिप्रेशन के विचारों से निपटा जाए : 

1. कुछ एक्टिविटीज़ में शामिल हों। हर दिन छोटे-छोटे काम करने की कोशिश करें। और जब भी आप उन्हें पूरा करें, तो उसके बदले में खुद को पुरस्कृत करें। 
2. जब आप कोई छोटा काम करना शुरू करते हैं, तो यह आपको अगला कदम बढ़ाने के लिए मोटिवेट करता है और इस तरह आप ज़िंदगी में आगे बढ़ सकेंगे। कहना हमेशा करने से आसान होता है, मगर जब एक बार आप पहला कदम उठा लेते हैं, तो आपको यह अहसास होगा कि यह कोशिश करने लायक़ था।
3. आपका कॉम्पीटिशन हमेशा सिर्फ खुद से होना चाहिए। अपनी ताकत पर ध्यान दें और अपनी कमज़ोरियों को लेकर जागरुक रहें।
4. आप आत्महत्या के बारे में तभी सोचते हैं, जब आपको यह भरोसा हो जाता है कि अब कोई और रास्ता नहीं है। इसके बजाय, समाधान खोजने पर ध्यान केंद्रित करें, चाहे मुद्दा कितना भी गंभीर हो। काउंसलर से बात करें, सायकाइट्रिस्ट से संपर्क करें, आत्महत्या के विचारों के दिमाग से हटाने में एक लंबा सफर तय करना होगा। 

केशव के पैरेंट्स ने क्या किया : 

मानसिक बीमारी को समाज कलंक समझता है, इस पर चिंता करने के बजाय केशव के पैरेंट्स ने वह सुना, जो वह कह रहा था। 

-वे उसके मूड और आदतों को लेकर अधिक सहनशील और धैर्यवान बन गए।
-उन्होंने साइकोलॉजिस्ट से हर सप्ताह मिलकर टिप्स लिए और केशव का इलाज कराना शुरू किया। 
-उन्होंने "फै़मिली टाइम" को बढ़ाया और केशव को बिना किसी जजमेंट के अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। 
-वे केशव के लिए एक पालतू कुत्ता लेकर आए। 
-उन्होंने केशव को प्यार करना बंद नहीं किया। 

यात्रा अंत से अधिक ज़रूरी है : 
केशव को डिप्रेशन से बाहर लाने वाली इस यात्रा में उसके पैरेंट्स ने खुद को भी बहुत कुछ सिखाया। वे अब चीजों को अधिक स्वीकार करने वाले, प्यार करने वाले विनम्र व्यक्ति बन गए हैं। केशव ने फिर से ज़िंदगी का आनंद लेना शुरू कर दिया है। आजकल उसका पसंदीदा बैंड डैफ़्ट पंक है। उसका पसंदीदा विषय राजनीति विज्ञान है और उसकी एक प्यारी-सी गर्लफ्रेंड है। यह स्पष्ट है कि केशव अपने पैरेंट्स के सपोर्ट के बिना यह नहीं कर सकता था। 

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ज़िंदगी की समस्याओं का हल सुसाइड नहीं है

अपने बड़े भाई से कम्पेरिज़न के कारण होने वाली मुश्किलों पर एक टीनएजर की कहानी
Nishtha JunejaTeentalkindia Content Writer

एक ऐसे बड़े भाई के साथ बड़ा होना, जो कि स्कूल में रैंक-होल्डर है, आसान बात नहीं है। ऋषभ की तुलना हमेशा अपने भाई से की जाती। वो जब भी अच्छे मार्क्स लाता, टीचर उलटे उसके बड़े भाई को क्रेडिट देते कि उसकी वजह से ऋषभ इंस्पायर्ड हुआ है। वहीं घर पर इस बात को लेकर उसकी आलोचना की जाती कि वो अपने भाई जितना अच्छा नहीं हो पाया है।

जब बोर्ड एग्ज़ाम्स आए तो यह प्रेशर और बढ़ गया। ऋषभ जब भी पढ़ाई करने बैठता, उसका ध्यान अपने भाई के गोल्ड मेडल की ओर चला जाता, जो उसने 12वीं में टॉप करने पर जीता था। पलभर में उसका आत्मविश्वास ख़त्म हो जाता। सेल्फ़-एस्टीम कम हो जाती।

बाहर से तो ऋषभ ऐसा जतलाता, जैसे सब सही है। लेकिन भीतर ही भीतर वो डूब रहा था। जब नाते-रिश्तेदार आते और उसके बड़े भाई की अचीवमेंट्स की बात करके ऋषभ को पूरी तरह से दरकिनार करने लगे तो उसका दिल बैठ जाता।

जल्द ही, इस तमाम प्रेशर के बीच वो 12वीं बोर्ड परीक्षा में बैठा। हर पेपर के बाद वो ख़ुशी का दिखावा करता, लेकिन भीतर ही भीतर वो जानता था कि वो अपने भाई जितने मार्क्स नहीं ला सकेगा।

तब वह ख़ुद को दोष देने लगा। वो ये सोचने लगा कि शायद वो इसके लायक़ नहीं है। महीनों तक यही उधेड़बुन उसमें चलती रही। फिर जब रिज़ल्ट्स आए औश्र उसने दखा कि वो अपने भाई जितने मार्क्स नहीं ला सका है तो उसका आत्मसम्मान ग़र्त में चला गया।

इसके बाद वो तमाम उम्मीदें गंवा बैठा और सुसाइड के बारे में सोचते लगा। उसे लगता था कि अपना जीवन समाप्त करने से सभी समस्याएं हल हो जाएंगी। वो हर सुबह सुसाइडल थॉट्स के साथ ही उठता। समय-समय पर उसका भाई उससे मिलने आता। उसने पाया कि ऋषभ के साथ कुछ ठीक नहीं है। वो उससे बातें करने लगा और उसके डिप्रेशन के बारे में समझने लगा। सबसे बढ़कर वो ये बात जान गया कि ऋषभ को एक अच्छी काउंसलिंग की ज़रूरत है।

टीपटॉक इंडिया की एक्सपर्ट क्षितिजा सावंत ने सुसाइड थॉट्स से बचने के लिए ये टिप्स दी हैं :

1. जिन चीज़ों में आप अच्छे हैं, उन पर फ़ोकस कीजिए और उनकी दिशा में काम शुरू कर दीजिए।
2. सबसे बढ़कर, काम करते समय इस बात का ख़याल रखें कि आप ख़ुश और सकारात्मक रहें।
3. यह बोलने में सरल है, फिर भी अगर आप अपने में भरोसा रखते हैं, तो एक दिन दुनिया भी आपकी पोटेंशियल को पहचानेगी।
4. सुसाइडल थॉट्स का सामना करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है पॉज़िटिव थिंकिंग।

अगर आपके भी कोई सवाल हैं तो आप हमें expert@teentalkindia.com पर ईमेल कर सकते हैं और सोमवार से शुक्रवार, सुबह 11 से शाम 8 बजे गूगल हैंगआउट पर टीनटॉक इंडिया एक्सपर्ट से बात कर सकते हैं।

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