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एलजीबीटीक्यू क्या है?

हाल के दिनों में टर्म एलजीबीटीक्यू हमारे देश में पॉपुलर हो गया है। इससे उन टीनएजर्स के मन में कई सवाल भी उठने लगे हैं, जो इससे परिचित नहीं हैं। अगर आपके भी यही सवाल हैं तो इसे पढ़ डालिए।

सबसे पहले तो एलजीबीटीक्यू का फ़ुल फ़ॉर्म समझते हैं :

L : लेस्बियन 
G : गे 
B : बायसेक्शुअल 
T : ट्रांसजेंडर 
Q : क्वीर 

यानी एलजीबीटीक्यू में इन कैटेगरीज़ के लोग आते हैं।

साइंस कहता है कि जेंडर केवल दो होते हैं- मेल एंड फ़ीमेल। हो सकता है यह आपको अजीब लगे, और ऐसा लगना सही भी है। 

अगर आप अपने आसपास किसी गे-कपल को देखते हैं तो आप पाएंगे कि उनमें से एक थोड़ा-सा फ़ेमिनिन होगा। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि वो दोनों अलग-अलग सेक्शुअल कंस्ट्रक्ट्स के हैं? और अगर ऐसा है, तब तो यह एक अलग ही जेंडर माना जाना चाहिए।

आपने ऐसी औरतें भी देखी होंगी, जो पुरुषों की तरह कपड़े पहनती हैं, फिर भी उनका सेक्शुअल ओरिएंटेशन पुरुषों के प्रति ही होता है। इसी प्रकार ऐसे भी पुरुष हैं, जो थोड़े फ़ेमिनिन भले हों, लेकिन लड़कियों की ओर आकर्षित होते हैं। वास्तव में जब हम सेक्शुअलिटी, ओरिएंटेशन और इंट्रेस्ट्स के दायरे में वैरिएशंस की कोई कमी नहीं है।

हाल ही में एक रिसर्च ने बताया है कि मनुष्यों में कम से 63 जेंडर्स होते हैं। लेकिन यह एक कभी ना ख़त्म होने वाला विषय है और इस पर बहस होती रहेगी। ना केवल रिसर्चर्स और साइंटिस्ट्स इस पर कंफ़्यूज़्ड हैं, बल्कि हम भी यही सोचते हैं कि जिन लोगों की सेक्शुअलिटी थोड़ी अजीब है, उनमें किसी तरह की कोई भूल है। हम चीज़ों को दो खांचों में ही बांटकर देखते हैं, इससे हमारा नज़रिया प्रभावित हो जाता है।

इसलिए अब समय आ गया है कि हम इस बात को समझें कि वो लोग ना तो समाज की भूल हैं ना प्रकृति की। हमें ह्यूमन जेंडर, सेक्स और सेक्शुअल डायवर्सिटी को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करना होगी, और डिफ्रेंट जेंडर्स के बारे में अपने नज़रिये में सुधार लाना होगा।

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आओ, सेक्स की बात करें

12 फ़रवरी को सेक्शुअल रीप्रोडक्टिव हेल्थ अवेयरनेस डे मनाया जाता है। लेकिन सवाल उठता है कि जिस देश में टीनएज प्रैग्नेंसी और सेक्शुअल एब्यूज़ के इतने मामले सामने आते हैं, क्या उसमें जेंडर इक्वैलिटी, कंसेंट के महत्व और सेक्स के दायरों पर फ़ोकस करने वाला एक करिक
Gousiya Teentalkindia Content Writer

इंडिया में सेक्स एजुकेशन एक बहुत ही कंट्रोवर्शियल विषय है। इसे भारतीय मूल्यों को ठेस पहुंचाने वाला भी माना जाता है और आम धारणा यह है कि इससे समाज में अश्लीलता फैलेगी और ख़तरनाक सेक्स बिहेवियर बढ़ेगा। इससे भी बढ़कर चिंता यह जताई जाती है कि तब तो सभी सेक्स के बारे में बातें करने लगेंगे।

लेकिन अगर प्रैक्टिकली सोचें तो हर टीनएजर के सेक्स को लेकर अपने सवाल और कंफ़्यूज़न होते हैं, लेकिन उनके पास इनके जवाब देने वाले भरोसेमंद सोर्स नहीं होते। तब वो पोर्न जैसे ग़लत सोर्स से जानने की कोशिश करते हैं। अगर आपको लगता है कि आप भी सेक्स को लेकर कंफ़्यूज़्ड हैं तो आपको यह करना चाहिए।

सबसे पहले तो किसी टीनएजर साथी से सेक्शुअल एडवाइस मत लीजिए, क्योंकि बहुत सम्भव है वो ख़ुद उन सवालों से जूझ रहा हो। इसके बजाय पैरेंट्स या उन टीचर्स से बात कीजिए, जिनके साथ आपकी अच्छी अंडरस्टैंडिंग है।

अनेक टीन्स सेक्स के बारे में बातें करने को ऑकवर्ड पाते हैं। अगर आप भी उनमें से हैं इस विषय पर अच्छी किताबें, लेख और वीडियोज़ की मदद लीजिए। यह ध्यान रखिए कि ये सोर्सेस ऑथेंटिक हों और उनका मक़सद एजुकेशन देना हो, इंटरटेनमेंट देना नहीं।

अगर आप इस बारे में अपने पैरेंट्स से बात करने का सोच रहे हैं तो अपने एप्रोच को कैज़ुअल रखिए। इसे बहुत गम्भीर मत बनाइए। कुकिंग, कार वॉशिंग, वॉकिंग द डॉग जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों को करते समय इस बारे में बात करना बेहतर होगा।

अगर आपको लगता है कि इस विषय पर बात करना आपके लिए एम्बैरेसिंग है तो अपने आसपास मौजूद क्यूज़ का इस्तेमाल कीजिए। टेलीविज़न पर दिखाए जा रहे रोमैंटिक सीन्स बात शुरू करने का एक अच्छा बहाना हो सकते हैं। आप एक सीधा-सा सवाल पूछ सकते हैं कि अगर आपने मुझे ऐसी सिचुएशन में पाया तो मुझे क्या करना चाहिए? किसी हाइपोथेटिकल सिचुएशन पर जनरल बातचीत एक बेहतर स्टार्टिंग पॉइंट है। और इससे आपको और आपके पैरेंट्स को अपनी थॉट्स और बिलीफ़्स को एक्सप्रेस करने का एक मौक़ा भी मिलेगा।

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