लॉग इन करें
This site is not collecting any personalized information for ad serving or for personalization. We do not share any information/cookie data about the user with any third party.OK  NO

आर्ट, सेक्शुअलिटी और फ़ैशन पर आर्टिस्ट हितेन नूनवाल

हितेश नूनवाल हमें बता रहे हैं और अपने आर्ट और एक्टिविज़्म के बारे में और यह भी कि उनकी सेक्शुअलिटी कैसे उनके काम में झलकती है...

आर्ट और फ़ैशन भले दो अलग-अलग चीज़ें लगें, लेकिन उनका लव अफ़ेयर कोई राज़ की बात नहीं है। और सेम सेक्स रिलेशनशिल्प के विपरीत उनकी रिलेशनशिप का सोशल सर्किट्स में अच्छी तरह से स्वागत किया गया है। आज आर्ट और फ़ैशन हैप्पी कपल हैं और वो अकसर फ़ैशन इवेंट्स और गेदरिंग्स में हाथों में हाथ लिए घूमते दिखाई देते हैं।

उनकी लव स्टोरी से इंस्पिरेशन लेते हुए आर्टिस्ट हितेन नूनवाल ने अपनी ख़ुद की सेक्शुअलिटी को आर्ट और फ़ैशन के ज़रिए एक्सप्रेस करने का  निर्णय लिया और नतीजा है प्योर आर्टिस्टिक ब्लिस। नूनवाल का आर्ट अपनी सेक्शुअलिटी के प्रति उनके कम्फ़र्ट लेवल को बताता है और आर्ट एक्टिविज़्म का एक स्ट्रॉन्ग टूल बनकर सामने आता है। हितेन के स्वयं के शब्दों में :

जेंडर आइडेंटिटीज़ और सेक्शुअलिटी पर-
मैं अपने को एक जेंडर-फ़्लुइड आर्टिस्ट मानता हूं। मैं अपने को किसी पर्टिकुलर जेंडर आइडेंटिटी से डिफ़ाइन नहीं करता। क्योंकि आर्ट और आर्टिस्ट का कोई जेंडर नहीं होता। इसका ये मतलब नहीं है कि आर्टिस्ट जेंडरलेस होता है, बल्कि यह कि उसके नैरेटिव्ज़ जेंडर के द्वारा डिफ़ाइंड नहीं होते। मैं जेंडर को किसी यूनिवर्स की तरह देतख हूं। ये इतना व्यापक है और इसमें इतने विकल्प हैं कि आप इसे छोटे स्केल में सीमित ही नहीं कर सकते। हर इंडिविजुअल के लिए अपने जेंडर को डिफ़ाइन करना यूनीक होता है। मेरे अनेक आर्टवर्क्स में मैं एक फ़ीमेल हूं और दूसरे मेल्स हैं। मैं मेल या फ़ीमेल दोनों प्रोनाउन्स के साथ कम्फ़र्टेबल हूं।

नई लीक पर चलने को लेकर-
मुझे हमेशा से अपनी सेक्शुअलिटी के बारे में पता था। स्कूल के दिनों में मुझको लगता था कि मैं भी अपने बाक़ी के क्लासमैट्स की तरह हूं। लेकिन सेकंड ग्रेड में भी वो मुझे लड़की कहकर मेरा मज़ाक़ उड़ाने लगे थे। तब मुझे पहली बार लगा था कि लोगों को लगता है मेरी एक डिफ्रेंट आइडेंटिटी है और मैं उन्हें अजीब लगता हूं।

अकेलेपन और डिप्रेशन पर...
स्कूल में मैंने अपने को हमेशा अकेला ही पाया। मेरे क्लासमैट्स कहते थे कि तुम ना तो लड़की हो ना लड़का, अगर हम तुम्हारे साथ रहे तो तुम जैसे बन जाएंगे। वो मुझको फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी, हिजड़ा आदि कहते थे। यह डिप्रेसिंग था। मेरी मदद करने वाला कोई ना था। टीचर्स भी नहीं। तभी मैंने अपने को पेंटिंग्स और पोयट्री में एक्सप्रेस करना शुरू किया। स्कूल के गेम्स और लंच पीरियड के दौरान में अकेला एक पेड़ के नीचे बैठा पेंटिंग बना रहा होता था। इसी तरह आर्ट के साथ मेरे रिश्ते की शुरुआत हुई। 12वीं तक आते-आते मेरे टीचर्स मेरे आर्ट को एप्रिशिएट करने लगे थे। मैं क्रिएटिव कॉम्पीटिशंस में भाग लेने लगा और मुझे ख़ुशी है कि उनमें मैं जीत हासिल करता था। फिर मैंने फ़ाइन आर्ट्स की पढ़ाई की और फ़ोटोग्राफ़ी और परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स के ज़रिये ख़ुद को एक्सप्रेस करने लगा। एनआईडी, एम-डिज़ाइन और अपारेल डिज़ाइन ज्वॉइन करने के बाद फ़ैशन मेरे आर्ट का हिस्सा बन गई।

मैं अपने आर्टवर्क में अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को एक्सप्रेस करता हूं। मैं चाहता हूं कि दुनिया में सभी को उनकी सेक्शुअलिटी के बावजूद बराबरी से ट्रीट किया जाए और ओरिएंटेशन या जेंडर के आधार पर किसी से भेदभाव ना किया जाए। अपनी बॉडी को मीडियम की तरह यूज़ करके और फ़ोटोग्राफ़ी, मेकअप आर्ट, कॉस्च्यूम डिज़ाइन, फ़ैशन स्टाइलिंग, परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स की अलग-अलग टेक्नीक्स के ज़रिये मैं एब्यूज़ और ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता हूं।
 
आर्ट एक्टिविज़्म पर-
हम फ़िज़िकल आइडेंटिटीज़ की दुनिया में रहते हैं। मैं इसे बदलने की कोशिश कर रहा हूं। मेरा काम जेंडर इक्वैलिटी, फ़्लुडिटी, सेक्शुअलिटी, एब्यूज़, डिप्रेशन आदि पर बात करता है। शायद इसके मूल में यही है कि मेरी अपनी आइडेंटिटी को एक्सेप्ट नहीं किया गया था। मैं रोज़ जिस अपमान का सामना करता हूं, मेरा आर्ट उसमें मेरी मदद करता है।

अपनी सेक्शुअलिटी और जेंडर आइडेंटिटी से जूझ रहे लोगों के लिए एडवाइस-
कुछ लोग अपनी सेक्शुअलिटी और ओरिएंटेशन को लेकर श्योर होते हैं, जबकि कुछ नहीं होते हैं। गे टीनएजर्स के लिए सेल्फ़-डिस्कवरी, अपनी सेक्शुअलिटी को एक्सेप्ट करना, और इससे उबरकर आना बहुत मुश्किल है, क्योंकि समाज उन्हें स्वीकारने को ही तैयार नहीं है। लेकिन सेल्फ़-एक्सेप्टेंस सबसे ज़रूरी है। जैसे ही हम अपने को और अपनी ख़ुशी को स्वीकार लेते हैं, हम शांत हो जाते हैं। हमें अपने पर गर्व होता है, हमारी सेल्फ़-एस्टीम बढ़ जाती है और हम अकेला नहीं महसूस करते। ये दुनिया जितनी औरों की है, उतनी ही हमारी भी है। डिफ्रेंट होने में कुछ बुरा नहीं है। ईश्वर ने हम सभी को परफ़ेक्ट बनाया है। अगर समाज हमें रिस्पेक्ट नहीं देता तो आवाज़ बुलंद करके उसको उनसे हासिल कीजिए।

यदि आपके पास भी हमसे शेयर करने के लिए कोई कहानी है तो हमें यहां , ईमेल करें

यदि आपके पास कोई सवाल हैं, तो हमें यहां , ईमेल करें

आप क्लिक करके काउंसलर से भी बात कर सकते हैं टीनटॉक एक्सपर्ट चैट.

Comments

अगली कहानी


Ritika SrivastavaTeentalkindia Counsellor

यदि आपके पास भी हमसे शेयर करने के लिए कोई कहानी है तो हमें यहां , ईमेल करें

यदि आपके पास कोई सवाल हैं, तो हमें यहां , ईमेल करें.

आप क्लिक करके काउंसलर से भी बात कर सकते हैं टीनटॉक एक्सपर्ट चैट.

टिप्पणियाँ

कॉपीराइट टीनटॉक 2018-2019
डिस्क्लेमर : टीनटॉकइंडिया आपातकालीन सेवाएं नहीं प्रदान करता है और न ही यह किसी तरह की आपदा में हस्तक्षेप करने वाला कोई केंद्र है। अगर आप या आपका कोई मित्र या परिचित गहरे अवसाद के दौर से गुज़र रहा है, या उसके मन में आत्महत्या या स्वयं को नुक़सान पहुंचाने वाले विचार आ रहे हैं तो कृपया निकटस्थ अस्पताल या आपातकालीन/आपदा प्रबंधन सेवा केंद्र या हेल्पलाइन से सम्पर्क करें।