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पेरेंट्स के डिवोर्स का साइकोलॉजिकल ट्रॉमा

डिवोर्स जितना पेरेंट्स के लिए तनावभरा होता है उतना ही उनके बच्चों के लिए भी होता है। उस समय बच्चे भी कई ऐसे भावनात्मक बदलावों से गुजरते हैं, जिन्हें वे खुद भी नहीं समझ पाते।
Gousiya Teentalkindia Content Writer

सुहानी के लिए उसके पेरेंट्स का तलाक कई मायने में अहम था फिर चाहे वो नए स्कूल में एडमिशन लेना हो या या नए घर में रहना या फिर सिंगल पेरेंट के साथ रहना ही क्यों न हो। पर क्या आप जानते हैं कि, शुरूआती दौर में पेरेंट्स बच्चों को कम उम्र में ऐसे तनावभरे माहौल से बचाने के लिए तलाक टाल दिया करते थे या सुलह कर लेते थे, और ज्यादातर केसों में तलाक पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस से ही जुड़ा हुआ होता है।

 

सुहानी की तरह, आप भी एक बच्चे के रूप में पीड़ा, गुस्सा, चिंता और अविश्वास का अनुभव कर सकते हैं। लेकिन कुछ बच्चे बहुत जल्द इस स्थिति से वापस अपने ट्रैक पर आ जाते हैं। उन्हें अपनी दिनचर्या में बदलाव करने की आदत होती है और वे अपने रहने की व्यवस्था के साथ सहज होते हैं। आपके दिमाग में कई तरह के सवाल हो सकते हैं जैसे, 

मैं कहां जाऊंगा? मैं किस स्कूल में जाऊंगा? मुझे किसके साथ रहना पड़ेगा?

 

चलिए तलाक से जुड़ी कुछ तनावपूर्ण घटनाओं पर विचार करते हैं-

 

मेन्टल हेल्थ की समस्याएं : आपको कई परेशानियां जैसे एंग्जाइटी, डिप्रेशन।

एलियनएशन (अलग पड़ने की भावना) और एडजस्टमेंट डिसऑर्डर भी हो सकते हैं। ऐसे केसों में बच्चे अक्सर खुद को तलाक का कारण मानकर खुद को दोष देते हैं।

 

व्यवहार संबंधी परेशानी : कुछ बच्चे आवेगपूर्ण व्यवहार( इम्पलसिव डिसऑर्डर), कंडक्ट डिसऑर्डर, कमज़ोरी, नशे की लत और यहां तक कि कम उम्र में सेक्शुअल एक्टिविटी में शामिल हो सकते हैं। 

 

खराब एकेडमिक्स : ऐसे बच्चों का पढ़ाई का स्तर लगातार गिरता जाता है और उनके स्कूल छोड़ने की दर भी काफी ज्यादा होती है।

 

क्योंकि तलाक एक बहुत बड़ा बदलाव होता है, इसीलिए हमें हमारे रहन-सहन में बहुत आराम से और सोच समझकर बदलाव करना चाहिए, और इस तनाव से बाहर आने के लिए यहां कुछ टिप्स दे रहे हैं। 

 

 

साइकोलॉजिकल मदद लें : ऐसे में आप किसी साइकोलॉजिस्ट से किसी थैरेपी जैसे रिलैक्सेशन तकनीक, बेनिफिट ऑफ राइटिंग तकनीक आदि ले सकते हैं, जो इस कठिन समय में आपके इमोशन्स को काबू में रखने में मदद करेंगे।

 

अधिक सोशलाइज हों : यह ज़रूर मदद करता है जब आप किसी के साथ अपने अनुभव साझा करते हैं और उनके अनुभव सुनते हैं तो आप ना सिर्फ नई चीजें सीखते हैं बल्कि इससे आपका माइंड डाइवर्ट भी होता है, जिससे आपका टेंशन कम हो जाता है।

 

 

संयम रखें : इस कठिन समय में सबसे ज़रूरी है पेशेंस रखना, और खुद को बताते रहना कि ये कठिन समय जल्दी बीत जाएगा।

 

तुलना करने से बचें :  हम सभी अलग-अलग ताकत और कमज़ोरियां होने के साथ-साथ हम अलग-अलग परिस्थितियों में भी होते हैं इसीलिए किसी से ख़ुद की तुलना करना कहीं से भी सही नहीं होगा। आपको बस खुद पर भरोसा रखना होगा और खुद की कंडीशन को अच्छा करने पर ज़ोर देना चाहिए, क्योंकि आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी ,' द ग्रास इज ऑलवेज ग्रीनअर ऑन अदर साइड' यानी दूसरी ओर की घास हमेशा अधिक हरी लगती है। इसलिए अपनी सूझ-बूझ से काम लीजिए और भावनाओं में बहने से बचिए।

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