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5 चीजें जो आप अपने सख़्त देसी माता-पिता को कह सकते हैं

जब माता-पिता अति हो जाते हैं, तो यहां आप क्या कह सकते हैं

कभी-कभी आपका मन करता है कि घर से भाग जाए। माता-पिता भारी पड़ सकते हैं। हो सकता है कि वे आपको ज्यादातर बार न मिले। लेकिन ऐसे तरीके हैं जिनसे आप उनकी चिंताओं को कम कर सकते हैं।

यहां पांच चीजें हैं जो आप अपने माता-पिता से कह सकते हैं ताकि वे शांत हो सकें।

1. मैं अपने भविष्य के बारे में परवाह करता हूं और बेहतर अध्ययन कर सकता हूं यदि आप मुझे उन विषयों को चुनने की स्वतंत्रता देते हैं जो मैं चाहता हूं।
आपके माता-पिता आपके अध्ययन के बाद हो सकते हैं और अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें पुन: आश्वस्त करना कि आप समय पर काम पूरा कर रहे हैं, कुछ चिंता दूर करेंगे।

2. सभी काम और कोई भी खेल जैक को सुस्त लड़का नहीं बनाता है
यह कहावत सरलता से बताती है कि अगर जैक अपने दोस्तों के साथ एक बार हवा में बेतहाशा नहीं भागता है, तो वह तनावग्रस्त हो जाएगा। जीवन काम और खेल का एक संतुलन है।

3. मैं अपने फोन का इस्तेमाल करंट अफेयर्स से अपडेट रहने के लिए करता हूं
माता-पिता आपको अपने फोन का उपयोग करने के लिए ताना दे सकते हैं, लेकिन कई बार आप समाचार पढ़ रहे होंगे। आप अपनी बात उनके सामने रख सकते हैं।

4. अपने दोस्तों से बात करना मुझे कम चिंतित करता है
शिक्षाविदों के दबाव से, सही स्ट्रीम चुनने और करियर बनाने के लिए, दोस्त एक अच्छा समर्थन समूह बन सकते हैं। आप इसे अपने माता-पिता के साथ साझा कर सकते हैं।

5. मुझ पर विश्वास रखो, मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगा।
आपको अपने माता-पिता को बार-बार आश्वासन देना पड़ सकता है कि आप अपने जीवन के बारे में ठोस निर्णय लेने में सक्षम हैं। आपको मार्गदर्शन और सहायता की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन आपके पास अपना जीवन है।

यदि आपको लगता है कि आप अपने माता-पिता के साथ अपने दम पर व्यवहार नहीं कर सकते हैं, तो आप अपनी चिंताओं को हमारे टेनेटल इंडिया विशेषज्ञ से ईमेल के माध्यम से साझा कर सकते हैं।

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पांच बातें जो पितृसत्ता सिखाती है कि हमें बीते कल से इन्हें नहीं सीखना है

आइए मिलकर पितृसत्ता को कुचलते हैं और पुरानी हो चुकी पितृसत्तात्मक की परंपराओं को तोड़ते हैं।
Khubi Amin AhmedTeentalkindia Content Writer

एक दिन अचानक घर में मुझे मेरे बचपन की कुछ किताबें मिली, मैंने फोर्थ क्लास की 90के दशक की एक किताब ने मेरे सामने कई रहस्यों को खोल कर रख दिया।

मुझे मेरी नोटबुक में कर्सिव राइटिंग में मेरे हाथों से लिखा हुआ एक नोट मिला जिसका टाइटल था माय फैमिली। उसमें कुछ लाइनें लिखी हुई थीं,“मेरा भाई सीख रहा है कि कैसे टाई पहने और अच्छा बिजनेसमैन बने।” जबकि मैं केक बनाने या कुछ बेक करके खुश थी, ऐसा करके मैं फैमिली में एक अच्छी लड़की बनने के लिए इस स्किल को सीख रही थी। दूसरी बात जो मैंने नोटिस की उस किताब में मां को एप्रिन पहने और पिता को सूट और टाई पहने हुए चित्र कई जगह दिखाया गया था।

यह सोचकर देखें तो पता चलता है कि हमारा समाज पितृसत्तात्मक है उसके उदाहरणों की हमारे बच्चों की ज़िंदगी में कोई कमी नहीं है।  ऐसे संदर्भ हमारे दिमाग में जेंडर के रोल को स्थापित करते हैं – पापा परिवार के लिए कमाने जाते हैँ और मां होममेकर होती हैं। यह इस गंभीर समस्या की एक छोटी सी झलक है। पितृसत्ता हमारी संस्कृति में इतने अंदर तक घुली हुई है कि इसके पक्षपात और पूर्वग्रह के कारण हम ख़ुद ही न्याय करने वाले बन जाते हैँ और कई बार हमला भी कर देते हैं क्योंकि सामने वाला व्यक्ति हमारी परिभाषा के हिसाब से नॉर्मल नहीं होता है।
इसलिए युवाओं को बेहतर कल के लिए और उद्देश्यपूर्ण ज़िंदगी के लिए इस पितृसत्ता को तोड़ना होगा। हालांकि पितृसत्ता से जुड़े मिथक और पूर्वग्रह बहुत कड़े हैं, इसलिए हम एक-एक करके ही पितृसत्ता के नियमों को तोड़ पाएंगे।

आइए हमारी पहचान के बारे में जानने और स्वीकार करने के लिए समय निकालें :

बायसेक्शुयल यानी एड्रोजिनी आजकल फैशन की दुनिया में ट्रेंड में हैं मगर दुनिया के एक बड़े हिस्से में अभी भी इसे स्वीकार नहीं किया जाता है। जेंडर यानी लिंग की पहचान हमारे सामाजिक ताने-बाने का एक महत्वपूर्ण पहलू है और ट्रांसजेंडर के प्रति भेदभाव को लेकर एक लंबी दूरी तय करने के बाद भी अभी हमें इस रास्ते पर और चलना है। ट्रांस फोबिया सच में है और इसे खत्म करने के लिए हमें पितृसत्ता को तोड़ने की सच में ज़रूरत है, क्योंकि यह लोगों को वह बनने के लिए फोकस करता है, जो वह नहीं है। ज्यादातर हमारी सामाजिक धारणाएं इतनी मजबूत होती हैं, कि हम उन लोगों को स्वीकार ही नहीं करते हैं जो हमारी समझ से परे होते हैं। यदि कोई पुरुष या महिला हमारे जेंडर लॉ के हिसाब से नहीं होता है, तो हम उनका बहिष्कार करते हैं। यदि एक ही जेंडर के दो लोग प्यार में पड़ते हैं, तो वो हमारे हिसाब से सही नहीं होते हैं। अगर कोई व्यक्ति जिस जेंडर में जन्म लेता है उससे हटकर किसी और जेंडर को चुनता है तो वो हमारे लिए स्वीकार नहीं होता है। आइए हम यह सीखें कि हमें ये नहीं सीखना है। हम लोगों को यह जानने की आज़ादी हो कि हम कौन हैं हमारी सेक्शुयलिटी और सेक्शुयल ओरिएंटेंशन को लेकर सहज हों।

जेंडर रोल को पर्सनल न लें : हमारे पढ़े-लिखे और जेंडर के लिए निष्पक्ष हमारे समाज में अभी भी हमें अपने आसपास पितृसत्तात्मक नियम कानून परेशान करते हैं। हमारी संस्कृति में स्त्रीत्व के ऊपर मर्दानगी को महत्व दिया जाता है और वही हमारे मन में छायी हुई है। यहां तक कि हमारे कार्टून में भी जेंडर को सही ढंग से नहीं चित्रित किया गया है। कार्टून किरदार डेक्स्टर की मॉम को उनके एप्रिन में याद करें।

भले ही आज महिलाएं घर चलाने के साथ-साथ उतनी ही समझदारी के साथ बोर्डरूम चलाती हैं; पुरुष अभी भी शक्ति और नियंत्रण से जुड़े हैं जबकि महिलाएं भावनाओं और कमजोरी से जुड़ी हुई हैं।

भले ही अधिकांश मां जब कामकाजी हैं, फिर भी हम इस भावना के साथ बड़े होते हैं कि मां घर के लिए जिम्मेदार हैं जबकि पापा अधिक गंभीर मुद्दों की जिम्मेदारी लेते हैं, पैसे और ज़िंदगी से जुड़े निर्णय उनके होते हैं। क्या इस बात पर भरोसा नहीं होता? फिर क्यों अब भी हमारे यहां घरेलू हिंसा के केस दर्ज होते हैं? हमारी नहीं सीखने वाली चीजों की सूची में हम जेंडर रोल के बारे में सोचते हैं। पुरुष और महिलाएं समान रूप से कमजोर और मजबूत हैं।  वे अवसरों में बराबरी के हकदार हैं, और हर समस्या का हल निकालने में भी बराबर सक्षम हैं।

हर मुद्दे पर सवाल पूछें और अपनी राय रखें : हमारा पितृसत्तात्मक समाज वंचित और हाशिए के समूह के लोगों पर नियंत्रण रखता है। पितृसत्ता सभी जेंडर को अपने सेक्सिज्म, क्लासिज्म, इन्टॉलरेंस आदि के माध्यम से प्रभावित करती है। हमारी संस्कृति में जो लोग शक्तिहीन हैं जैसे महिलाएं, अल्पसंख्यक और वंचित उन सभी पर अत्याचार करने का पूरा इतिहास है।

"हमारी इन-हाउस थेरेपिस्ट अवंती मल्होत्रा कहती हैं कि, “टीनएजर होने के नाते आप रूढ़ियों को चुनौती देने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं!  लड़कियों को कैसे कपड़े पहनने चाहिए, लड़कों को कैसे रोना चाहिए, कैसे महिलाओं को ट्रॉफी के रूप में और पुरुषों को खिलाड़ी के रूप में पेश किया जाता है, इसके बारे में क्या कहा जा रहा है, इस मानसिकता को लेकर नोट्स बनाएं। यह वह उम्र है जब आप अपनी आंखें खोल सकते हैं और अपनी नज़र से यथास्थिति पर सवाल उठा सकते हैं।

हममें से वो लोग जिनके पास एजुकेशन, इंटरनेट और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यदि आवाज़ है, तो हमें सिस्टम की हर बात को आंख बंद करके स्वीकार करने से पहले सवाल पूछना सीख लेना चाहिए। यदि हमें हमारे सवाल का ज़वाब मिल जाता है, तो हमें सही-गलत को अपने हिसाब से तय करना चाहिए और न कि सिर्फ इसलिए सहमत हो जाना चाहिए कि पितृसत्ता ऐसा चाहती है। यह एक तरीका है, जिससे हम तर्क से चलने वाली दुनिया के निर्माण में अपनी भागीदारी कर सकते हैं।

पाखंड को पहचानें और इसे सहन न करें : सबसे पहले हमें सही सेक्स एजुकेशन से दूर किया जाता है क्योंकि यह संस्कारी चीज नहीं है, जिसके बारे में बात की जाए। इसलिए हमसे एक्सपेक्ट किया जाता है कि हम अपने आप ही सेक्स का पता लगा लें, मगर सिर्फ शादी के बाद। स्कूलों में सेक्स एजुकेशन पर या तो पूरी तरह से प्रतिबंध है या फिर सतही तौर पर है। और कोई भी हमारे सेक्स से जुड़े सवालों का जवाब नहीं देता है। पॉर्न भी नैतिकता और मूल्यों के कारण ऑफिसियली बैन है।

कहा जाता है कि, हम टीनएजर्स हर समय सेक्शुयलाइज्ड होते हैँ। दोनों ही जेंडर हमारी सोसायटी में सेक्शुयल वॉयलेंस का शिकार होते हैं, सड़क पर हरासमेंट इतना आम है कि यदि कोई सड़क पर मास्टबेट करता है, तो इसकी रिपोर्ट तक नहीं की जाती है। हर उम्र की महिलाएं सेक्स एब्यूज़ का शिकार होती हैं और किसी को यह पितृसत्तात्मक मुद्दे के रूप में नहीं लगता है। यह विरोधाभासी रवैया हमारे लिए इतना नुकसानदायक है कि इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऐसे में अब वक्त आ गया है जब हमें हिपोक्रेसी के खिलाफ खड़ा हो गए हैं और सेक्स के बारे में बातचीत को लेकर सामान्य होना सीख गए हैं। हम सेक्स के बारे में बातचीत को लेकर जितने नॉर्मल होंगे, उतनी ही कम उत्तेजना होगी।

आइए हमारे पास जो अच्छा है उसे गिनें, मगर अपनी समस्याओं की अनदेखी न करें :

टीनएजर्स होने के कारण हमारी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है। हमारी समस्याएं भी एडल्ट की समस्याओं की तरह ही वास्तविक हैं। इसे जानना और इसे कहने में सक्षम होना महत्वपूर्ण है। हमारी ओपीनियन और इंट्रेस्ट को खारिज नहीं किया जा सकता है, हमारी ओपीनियन भी गिननी चाहिए क्योंकि वह कल दुनिया को आकार देगी।  

वह कहती हैं कि, हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हम उन विशेषाधिकारों का शोषण नहीं करते हैं जो पितृसत्ता ने हमें दिए हैं। हमें जो भी विशेषाधिकार और फायदे मिले हैं उनका उपयोग करना चाहिए, न कि हमें उनका शोषण करना चाहिए। यह ज़रूरी है कि हम अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए पितृसत्ता का उपयोग न करें।

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