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फैट से फैब तक का सफर

मिमिक्शा रॉय की कहानी पढ़िए, जिन्होंने पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओडी) पर जीत हासिल की
Nishtha JunejaTeentalkindia Content Writer

टीनएज आपकी ज़िंदगी का वो दौर है, जब न आप बड़े होते हैं और न ही बच्चे। आपके बॉडी में बदलाव हो रहे होते हैं, लेकिन दिमाग में नहीं। भावनाओं पर नियंत्रण के लिए हार्मोन की भीड़ सी है और सब कुछ गड़बड़ सा लगता है। जब मैँ एक टीनएज लड़की थी, तो मैं अपनी बॉडी में हो रहे इन बदलाव को काबू में करना चाहती थी, ख़ासकर मेंस्ट्रयुअल सर्कल को, लड़की आख़िर मैँ ही क्यों? हमें ही क्यों इन सबसे गुज़रना होता है। लड़कियों को ही ब्रा क्यों पहननी होती है और भी कई चीजें।

और जब मैं 15 साल की थी, टीनएज का सबसे पीक ईयर आया था, तब बोर्ड परीक्षाओं का भी तनाव साथ में था। तब मेरी कभी न खत्म होने वाली क्लासेस चलती थी, स्कूल, एक्स्ट्रा लेक्चर ने मेरी लाइफस्टाइल को पूरी तरह बदल दिया था। इस बदलाव के बोझ के साथ परिवार से जुड़ी ऐसी कई समस्याएं थीं, जिन्होंने मेरे तनाव के स्तर को बड़ा दिया था। मैं हर चीज का सामना नहीं कर सकती थी क्योंकि मैं न तो इतनी बड़ी थी कि मैं अपने आसपास की चीजों को बदल सकती था और न ही बहुत युवा कि मुझे कुछ भी प्रभावित न करे। और 10वी बोर्ड क्लास के आखिरी के दो महीनों पहले मुझे दो महीने तक पीरियड्स नहीं आया और मेरा वजन भी बढ़ गया था, मेरे फैमिली डॉक्टर ने कहा कि यह सामान्य है। लेकिन जब मैंने देखा कि दो महीने में लगभग 10 किलो वजन बढ़ गया है, तो मैंने एक गायनिकोलॉजिस्ट को दिखाया और उन्होंने मुझे बताया कि यह पीसीओडी एक ओवेरियन डिसॉर्डर है, उन्होंने मुझे सोनोग्राफी टेस्ट कराने के लिए कहा।

उस दिन की यादें आज भी मेरे दिमाग में ताजा हैं, जब मैं अपनी मां का हाथ थामे थी और मैँ 10 प्रेग्नेंट महिलाओं के साथ सोनोग्राफी कराने वालों की लाइन में बैठी थी। जब रिपोर्ट आई तो पता चला कि यह हाइपर पीसीओडी एक हार्मोनल डिसॉर्डर है, जिसकी वजह से ओवरी में सिस्ट बनते हैँ और मैंन्स्ट्रुयल साइकिल डिस्टर्ब हो जाता है, ऐसे में इंसुलिन का लेवल बढ़ने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और वजन तेजी से बढ़ने लगता है। 4-5 महीने में ही मेरा वजन 40 किलो तक बढ़ गया और यह तब भी बढ़ रहा था, जब मैं मेडिकेसन के अंडर में डाइट को फॉलो कर रही थी। जब मैं सीढ़ियां चढ़ती या चलती तो ऐसा लगता कि किसी ने मेरे पैरों में पत्थरों को बांध दिया है, यहां तक कि मैं ठीक से सांस भी नहीं ले पाती थी। ख़ुद से मुझे नफरत होने लगी थी। एक दिन में 15 गोलियां खाना और मेरी बोर्ड परीक्षा के साथ ही मेरा वजन भी बढ़ता जा रहा था और मेरा आत्मविश्वास कम हो रहा था। क्योंकि तब समय की कमी के कारण मैँ अपने लिए ज्यादा कुछ कर भी नहीं पा रही थी।

मैं हमेशा से ही एक्स्ट्रोवर्ट यानी लोगों से मिलना-जुलना पसंद करने वाली लड़की थी, लेकिन पीसीओडी सिर्फ एक बीमारी नहीं थी, बल्कि इसने मेरी पूरी पर्सनाल्टी को बदल दिया था। मैं अब बहुत अधिक शांत और रिजर्व रहने लगी। मेरे फ्रेंड्स मुझसे वजन बढ़ने और व्यवहार में बदलाव आने के कारण पूछ रहे थे और जिन लोगों को मेरी परवाह नहीं थी, उन लोगों ने मोटी, सांड, हिप्पोपॉटमस, हाथी का बच्चा और न जाने किन-किन नामों से मुझे बुलाना शुरु कर दिया। ये शब्द सुनने में स्टूपिड और फनी लगते हैं, लेकिन जब कोई आपसे इस तरह बात करता है तो यह आपके दिल में पिन की तरह चुभता है और असहाय होने की पीड़ा आपको तब मार देती है। जब बाहरी लोग ऐसे बोलते हैँ तब तो ठीक है, लेकिन जब आपके अपने आपके साथ ऐसा करते हैं, तो ज़्यादा तकलीफ होती है, मेरे रिश्तेदारों और यहां तक ​​कि मेरे पापा ने भी मेरे मोटापे का मजाक उड़ाया और जब मैँ ख़ुद को देखती कि मैँ कितनी मोटी हो गई हूं। तो यह देखकर मैं और ज्यादा टूट रही थी।मुझे नहीं समझ आ रहा था कि मेरी गलती क्या थी न ही मैंने बहुत ज्यादा खाया था न ही अनहेल्दी फैट फूड खा रही थी। मैं खूबसूरत महसूस नहीं करती थी। लोग आएं और आपके गाल खींचने लगे लेकिन अब ये सब क्यूट नहीं लगता था। मैँ अब किसी भी स्टैंडर्ड में फिट नहीं थी।

मेरा आत्मविश्वास लगातार कम हो रहा था और यहां तक कि 6 डॉक्टर बदलने के बाद भी किसी ने भी सुधार का प्रॉमिस नहीं किया। वे कहने लगे इसका कोई उपचार नहीं है, कुछ ने तो मुझे ओवरियन कैंसर के नाम पर भी डराया और मुझे नई-नई चीजें फॉलो करने और नई दवाएं खाने के लिए दीं। इस बुरे समय में, मेरे पास सिर्फ एक ही मजबूत पिल्लर मेरी मां मेरे साथ थीं, जो मुझे हौसला दे रही थीं, मुझे हर स्थिति में वह मोटीवेट कर रही थीं। मेरी जब बोर्ड परीक्षाएं हुई मैने वेकेशन पर न जाने का फैसला किया और वर्कआउट करना शुरु किया, धीरे-धीरे मेरा वजन कुछ कम हुआ, अब मैं चल सकती थी और सीढ़ियां चढ़ते हुए ठीक से सांस ले पाती थी और मुझे महसूस होने लगा कि मेरी भी गर्दन है।

छुटिटयों के साथ ही मेरे मन में कॉलेज का तनाव आया, कॉलेज कैसे होगा, साथ के स्टूडेंट्स मेरा मजाक उड़ाएंगे, मेरी सेल्फ इमेज लो थी और एक मोटी लड़की होना और रैगिंग के खतरे ने मुझे डरा दिया था। मीडिया में कॉलेज लाइफ को जिस ढंग से बताया जाता है ख़ासकर फिल्मों में उसके बारे में सोचकर मुझे और ज़्यादा डर लगता था। जैसा कि मुझे लोगों ने बताया था उस हिसाब से मोटी लड़की के लिए कॉलेज बहुत अच्छा अनुभव नहीं था, लेकिन जब मैँ कॉलेज पहुंची तो सब कुछ फिल्मों जैसा नहीं था, जितना बुरा मैंने सोचा था। उसके उलट मेरे आसपास के लोग गर्मजोशी से मेरा स्वागत कर रहे थे और मुझे बॉडी शेम महसूस नहीं हो रही थी, लेकिन ऐसे लोग हर जगह हैं। मैंने समय के साथ कुछ फ्रेंड्स बनाए, मुझे लगा कि अब हर दिन कॉलेज जाना मुझे अच्छा लगने लगा है। मैंने कुछ सच्चे फ्रेंड्स बनाए जिन्होंने मुझे किसी और की तरह नॉर्मल फील कराया, मुझे एक नॉर्मल लड़की की तरह महसूस हुआ और न कि मोटी लड़की कि तरह जो कहीं भी फिट नहीं होती है।

मेरी बेस्ट फ्रेंड ने मुझे इमोशनली सपोर्ट किया और मुझे वर्कआउट के दौरान भी मोटीवेट किया। एक बार गर्मियों की छुटिटयों में मैँ कोलकाता गई और वहां मैंने एक फेमस गायनिकोलॉजिस्ट से मिली। उन्होंने मुझे बताया था कि मैँ जिन दवाइयों को ले रही थी, उनसे मेरी स्थिति सिर्फ खराब हो रही थी और यदि मैं इन दवाइयों को लगातार लेती रहूंगी, तो मैं 40 साल की उम्र से ज्यादा ज़िंदा नहीं रह सकूंगी, क्योंकि उन दवाइयों में स्ट्रॉन्ग स्टेरॉयड था। मुझे बहुत बड़ा झटका लगा और उन्होंने मुझे सिर्फ एक टेबलेट प्रिस्क्राइव्ड की इंसुलिन कंट्रोल के लिए और मुझे बताया कि मुझे अपनी लाइफस्टाइल बदलनी होगी। अपनी डाइट को टाइम पर मैंन्टेन करने के साथ सुधार की उम्मीद दी।

इसलिए समय के साथ न केवल फिजिकली बल्कि मेंटली भी मेरी स्थिति में सुधार होने लगा। अपने इस सफर के दौरान मैं कुछ अमेज़िंग लोगों से मिली, इससे मुझे ख़ुद पर भरोसा हो गया। मेरे पास रेग्युलर कोर्स या बीएमएम के बीच एक विकल्प था। बीएमए मेरा मेरा जुनून था, मैंने अपना जुनून चुना। स्ट्रेसफुल वर्क शेड्यूल और कॉलेज। इन सबके बीच मैंने कुछ समय वर्कआउट के लिए निकाला। मैं जैसी हूं वैसे ही रूप में मुझे मेरे फ्रेंड्स ने स्वीकार किया है। इस दुनिया में कोई भी किसी को भी दोस्त उसके बाहरी रंग-रूप के आधार पर नहीं बनाता है, बल्कि अंदर से आप कैसे हो यह मायने रखता है।

फोटोशॉप् की इस दुनिया में अब भी ऐसे लोग हैं, जो दिल पर फिदा होते हैं, उनके लिए आपकी गर्मजोशी से भरी रुहानी मुस्कान मायने रखती है न कि परफेक्ट कमर या खूबसूरत त्वचा। ऐसे लोग आज भी मेरी ज़िंदगी में हैं, जिनकी वजह से मैं आज यहां तक पहुंची हूं। हम सभी अपनी बॉडी से कहीं ज्यादा हैं, सिर्फ एक हिस्सा किसी व्यक्ति को परिभाषित नहीं कर सकता है। ख़ूबसूरती हमारे अंदर की आग से आती है। मेरी बॉडी सिर्फ मेरी है और किसी को भी इसका अपमान करने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद यदि कोई ऐसा करता भी है, तो आपको उस पर यकीन करने की ज़रूरत नहीं है। मैं इस बात पर ध्यान नहीं देती हूं कि दूसरे लोग क्या कहते हैं, मुझे ख़ुद पर भरोसा है कि मैं अपनी कीमत जानती हूं मैं अनमोल हूं क्योंकि मुझे पता है कि कोई भी इस दुनिया में मेरी जगह नहीं ले सकता है। आज मैं एक आत्मविश्वासी लड़की हूं, जो अपनी शर्तों पर अपनी ज़िंदगी जी रही है और अपनी ज़िंदगी में आ रहे हर मोड़ और बॉडी पर आ रहे हर निशान को स्वीकार कर रही हूं, क्योंकि ये मेरे सफर के टैटू हैं, क्योंकि ताकत आपके अंदर की गहराई से आती है, बस आपको कुछ लोगों की मोटीवेटर के रूप में ज़रूरत होती है, जो आपको सितारे की तरह चमकने में मदद करते हैं।

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