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प्री-मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम क्या होता है ?

पीएमएस को समझने के लिए एक डायरी बनाइए

पीरियड्स किसी भी लड़की की जिंदगी में बिन-बुलाए मेहमान होते हैं। इसी तरह प्री-मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (पीएमएस) भी होते हैं। ये किस तरह के होंगे कोई नहीं जानता है। इसलिए इन्हें समझने के लिए एक डायरी बनाएं, जिससे आप इनसे लड़ सकें। 

पीरियड्स एक प्राकृतिक बदलाव और प्रक्रिया है जिससे हर लड़की को गुजरना पड़ता है। इसी तरह पीएमएस भी आम प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन ये थोड़ी समस्या पैदा कर सकते हैं। ये कई तरह के बदलाव लेकर आता है, जो अलग-अलग तरह के हो सकते हैं। पीएमएस के प्रभाव पीरियड्स आने के 1 से 2 हफ्ते पहले नजर आने लगते हैं। पीरिड्स शुरू होने के साथ ही ये पीएमएस का असर खत्म हो जाता है। इसकी वजह से पीरियड्स के दौरान शरीर में कई बदलाव होते हैं।

सबसे पहले पीएमएस के लक्षण को पहचानें:

शरीरिक संकेत: स्तनों में खिचाव महसूस होना, पेट में ढीलापन, पेट और सिर में दर्द रहना, पैरों में सूजन, पिंपल्स और कॉन्सटीपेशन्स की समस्या

भावनात्मक संकेत: मूड स्विंग, गुस्सा आना, डिप्रेशन, जी मचलाना, सोने में दिक्कत होना या नींद ना आना

व्यवहारिक संकेत: एकाग्रता में कमी, थकान होना, चीजों को रख कर भूल जाना

पीएमएस को समझने के बाद इससे निपटने के बारे में सोचना चाहिए। अगर ये पूरी तरह से ठीक ना भी हुए तो भी कुछ टिप्स की मदद से समस्याओं को कम किया जा सकता है।

  • रोजाना 30 मिनट की एक्सरसाइज करें।
  • हेल्दी डाइट लें, जैसे फल, हरी सब्ज़ियां और अनाज खाएं
  • ज्यादा नमक, शराब और कैफिन के सेवन से बचें
  • स्मोकिंग ना करें 
  • अच्छी नींद लें
  • तनाव कम लें और अपने मूड का ख्याल रखें। जल्दी चिड़चिड़ाने की स्थिति में खुद को संभाले।
  • दर्द होने पर अच्छी दवा ही लें, जैसे आईब्रूफिन। लेकिन ये दवाएं डॉक्टर से सलाह के बाद ही लें। 

मानसिक दबाव और परेशानी से निपटने के लिए काउंसलर से मिलें। अच्छा काउंसलर आपको कई चुनौतियों से उबरने में मदद कर सकता है। अगर आपने अपने पीएमएस लक्षणों को लेकर नोट्स बनाएं हैं तो इन्हें डॉक्टर या काउंसलर के पास ले जाना ना भूलें। आपके नोट्स के जरिए वो बेहतर तरीके से आपकी मदद कर सकते हैं।  

पीरियड्स के दौरान साफ-सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए। यहां कुछ खास टिप्स आपको बताएं जा रहे हैं...

  • रोज नहाएं
  • साफ और धुली हुए अंडर-वेयर ही पहनें।
  • पीरिड्स के दौरान इनफेक्शन से बचने के लिए अच्छी क्वालिटी के पैड का इस्तेमाल करें। 6 घंटे में पैड बदलें, टैम्पॉन्स का इस्तेमाल करती है तो इसे हर 2 घंटे में बदलें।
  • अपनी वजाइनल पर साबुन का इस्तेमाल ना करें। इसके बजाएं गुनगुने पानी या जेंटल वॉश से सफाई करें। इससे इनफेक्शन का खतरा काफी कम हो जाता है।
  • पैड और टैम्पॉन बदलने के बाद अपने हाथ गर्म पानी से धोएं। 
  • पैड और टैम्पॉन टॉयलेट में फ्लश ना करें।
  • लूज और आरामदायक कपड़े पहनें। जीन्स जैसे तंग कपड़े ना पहनें। लूज कपड़े पहनने से हवा का बहाव पसीने और रैशिंग जैसी समस्या से बचाता है। 

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क्या सेक्शुअल थॉट्स और फ़ैंटेसी सामान्य बात है‌?

सेक्शुअल थॉट्स क्यों और कैसे आते हैं, इस बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है डॉ. राजन भोसले ने। जानने के लिए पढ़िए...
Nishtha JunejaTeentalkindia Content Writer

महेश एक धार्मिक परिवार से था। टीनएज में प्रवेश करते ही उससे एक अच्छा लड़का साबित होने की उम्मीद थी। वह लड़कियों से नज़रें नहीं मिलाता था। उसकी बढ़ती सेक्शुएलिटी उसके पालन-पोषण के रास्ते में आ रही थी। इसके पीछे कारण यह था कि उसकी सेक्शुअल फ़ैंटेसी क्रेज़ी थलु। वह अपने विचारों में पूरी तरह निडर था। वह कल्पना करता था कि वह ऑर्गीज़ में है। वह बहुत असामान्य सेक्शुअल सीन्स इमेजिन करता था। वह कई सालों तक रोज़ाना मास्टरबेशन करता रहा। उसके पैरेंट्स ने एक लड़की ढूंढकर उसकी अरैंज मैरिज करवा दी। दुर्भाग्यवश शादी के पहले दिन से ही परेशानी शुरू हो गई। उसकी शर्मीली पत्नी उसकी सेक्शुअल फ़ैंटेसी का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी। वह अपनी पत्नी से कहता था कि वह उसकी बहन को ग्रुप सेक्स के लिए बुलाए। उसे अपनी पत्नी के फ़िज़िकल एक्सपीरियंस में भी कमियां दिखाई देती थी। उनकी शादी 3 महीने में ही टूट गई क्योंकि उसकी पत्नी महेश की सेक्शुअल इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकी।

क्या महेश के साथ कुछ गड़बड़ थी?

सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजन भोसले के अनुसार, यह व्यवहार महेश के कठोर पालन-पोषण का नतीजा था। उन्होंने आगे बताया कि महेश ने अपने टीनएज के समय में अपनी सेक्शुअल इच्छाओं को दबाया था। इसका नतीजा वाइल्ड फ़ैंटेसी के रूप में सामने आया। शादी के बाद उसके पास अपनी सेक्शुअल फ़ैंटेसी को एक्सप्लोर करने का मौक़ा था, लेकिन वे बहुत वाइल्ड क़िस्म की थी, इसलिए उसकी पत्नी यह जान नहीं पाई कि वह उसे यह सब करने के लिए क्यों कहता है। एक काउंसलिंग सेशन के बाद महेश की पत्नी ने उसकी थॉट-प्रोसेस समझी। धीरे-धीरे महेश भी अपने अतीत को भुलाता रहा और पत्नी के साथ एक हेल्दी सेक्शुअल रिलेशनशिप बनाए रखने की कोशिश करने लगा। इसके बाद उसकी पत्नी ने उनकी शादी को एक और मौक़ा देने के लिए हामी भरी।

यंग टीनएजर्स, ख़ासकर लड़कों को सेक्शुअल फ़ैंटेसी क्यों होती हैं‌?

सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजन भोसले ने बताया, ‘टीनएज से ही अधिकतर लोगों की सेक्शुअल फ़ैंटेसी होती है जो कई प्रकार के कार्यों को अंजाम देती हैं और इसके फलस्वरूप व्यक्ति के भीतर रिस्पॉन्स की एक बड़ी रेंज मौजूद होती है। इनमें से कुछ सुखद या उत्तेजक होती हैं, अन्य कन्फ्यूज़िंग, शर्मनाक और यहां तक कि शॉकिंग भी हो सकती हैं।'

-टीनएज के दौरान 10 से 19 वर्ष की उम्र में लड़के-लड़कियां सेक्शुअली मैच्योर होना शुरू कर देते हैं।
-फ़िज़िकल बदलावों के अलावा बहुत सारे इमोशनल और सायकोलॉजिकल बदलाव भी होते हैं।
-इसी कारण स्ट्रॉन्ग सेक्शुअल फ़ीलिंग्स और थॉट्स मन को पार करने लगते हैं।  
-दूसरी चीज़ों के अलावा असामान्य और अनपेक्षित सेक्शुअल ड्रीम्स, विपरीत लिंग के प्रति स्ट्रॉन्स फ़िज़िकल अट्रैक्शन और उन्हें इम्प्रेस करने की इच्छा पैदा होती है। 
-ये सायकोलॉजिकल और इमोशनल बदलाव लड़कों के लिए बॉडी और सेक्स ओरिएंटेड होते हैं और लड़कियों के लिए रोमांस और उनके दिल से जुड़े होते हैं।
-तक़रीबन 12 से 16 की उम्र तक लड़के हर दूसरी महिला से सेक्शुअली अट्रैक्ट हो जाते हैं। वे अपनी ट्वेंटीज़ और थर्टीज़ में भी महिलाओं के प्रति आकर्षित होते रहते हैं।

सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजन भोसले स्पष्ट करते हैं कि ‘स्ट्रॉन्ग सेक्शुअल इच्छा के कारण वे ख़ुद को असहाय महसूस करते हैं, क्योंकि ये महिलाएं उनमें बहुत कम या बिल्कुल भी सेक्शुअल इंट्रेस्ट नहीं दिखाती हैं। यह टीनएज लड़कों को फ्रस्ट्रेट करता है। इससे फ़ैंटेसी उपजती है।' 

यह उदाहरण डॉ. राजन भोसले की किताब ‘द कम्प्लीट बुक ऑफ़ सेक्स एजुकेशन' से लिया गया है।

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