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एक 14 साल की लड़की को खत

शरीर में आने वाले बदलाव से लेकर भावनात्मक तकरार तक, पढ़कर समझिए कि आपके साथ क्या हो रहा है

जब आप 14 वर्ष के होते हैं, तो आपका चेहरा संभवतः लाल, खुजली और दर्दनाक मुहासों से कवर होता है। यह मत भूलो कि आपकी कमर कुछ कर्वी हो गई है और ब्रेस्ट फूल गए हैं। कुछ इंच आपकी लंबाई बढ़ गई है और अपने पेट और कूल्हों के चारों ओर कुछ वजन बढ़ गया है। आप अब अक्सर खुद को आईने में देखकर निहारती हैं। लड़कों की ओर अब आपका ध्यान आकर्षित हुआ है या फिर लड़कियों पर ? या दोनों? आप अपनी सेक्शुयल आइडेंटिटि की खोज को लेकर अभी स्पष्ट नहीं हैं। यह कन्फ्यूज़न होना भी नॉर्मल है।

हर कोई आपको नोटिस करे और आपकी तारीफ़ करे आपके अंदर यह चाह अचानक से बढ़ गई है, और आप सेक्सी लगना चाहती हैं। ड्रेसेस जो आपके फिगर को अच्छा दिखाएं मेकअप और बेस्ट लुक ही आपके दिमाग में होते हैं। अपोजिट सेक्स कैसे आपको देखते हैं, यह आपके लिए मायने रखता है। लेकिन आपको समझ नहीं आता कि आपके फैशन च्वाइस को आपके पेरेंट्स क्यों अप्रूव नहीं करते हैं और आप सोच सकती हैं, रेजर बैक ड्रेस पहनने में क्या गलत है?

जब आप किसी फैमिली फंक्शन में जाने के लिए तैयार होती हैं, तो पेरेंट्स आपको देखकर मेकअप हटाने के लिए कहते हैं और कुछ डीसेंट सा ड्रेस पहनने के लिए कहते हैं। तब आपको गुस्सा आता है, आप अपनी आंखें फेर लेती हैं, कोई कमेंट करती हैं और गुस्से में अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेते हैं। ख़ुद से सवाल पूछती हैं क्या मैंने ओवर-रिएक्ट किया? हम्म, हो सकता है, हो सकता है नहीं।

यहां एक डील है। आपका ब्रेन एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। लिम्बिक ब्रेन, ब्रेन का वह हिस्सा जो एमिग्डाला, इमोशंस ग्लैंड को नियंत्रित करता है, यह बेहद संवेदनशील है। आपके मस्तिष्क के लिए, & कृपया अपने कमरे को साफ करें; और & आपकी दादी को दिल का दौरा पड़ा है। इन दोनों ही बातों को सुनकर आपके दिमाग की प्रतिक्रिया बिल्कुल एक सी होगी। आपकी प्रतिक्रिया और कुछ नहीं बल्कि लिम्बिक ब्रेन की प्रतिक्रिया है, जो समय के साथ विकसित होगी।

ब्रेन का एक और हिस्सा जो समय के साथ मैच्योर होता है, वह है नियोकॉर्टेक्स ब्रेन। यह सूचनाओं को बनाने की प्रोसेस को टीनएज लड़कियों के लिए मैच्योरली रिस्पॉन्स को कठिन बना देता है। इसलिए इस उम्र में तुम्हें ड्रामा क्वीन कहते हैं। लिम्बिक सेंटर्ड का उल्टा पक्ष यह भी है कि, यह आपको सेक्शुयलिटी के करीब लेकर आता है। ज़िंदगी के अन्य किसी भी स्टेज की तुलना में इस स्टेज में आप अपने इमोशन और सेक्शुयलिटी के बारे में सबसे ज्यादा जानते हैं। क्या आपके अंदर उत्तेजना बढ़ रही है? क्या आप अपने बॉयफ्रेंड के सपने देख रही हैं? ये सब ठीक है, अपनी फेंटेसी को वापस न जाने दें, यंग वुमन। आप एक लेडी बनने की दिशा में एक और कदम उठा रही हैं!

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Nishtha JunejaTeentalkindia Content Writer

टीनएज आपकी ज़िंदगी का वो दौर है, जब न आप बड़े होते हैं और न ही बच्चे। आपके बॉडी में बदलाव हो रहे होते हैं, लेकिन दिमाग में नहीं। भावनाओं पर नियंत्रण के लिए हार्मोन की भीड़ सी है और सब कुछ गड़बड़ सा लगता है। जब मैँ एक टीनएज लड़की थी, तो मैं अपनी बॉडी में हो रहे इन बदलाव को काबू में करना चाहती थी, ख़ासकर मेंस्ट्रयुअल सर्कल को, लड़की आख़िर मैँ ही क्यों? हमें ही क्यों इन सबसे गुज़रना होता है। लड़कियों को ही ब्रा क्यों पहननी होती है और भी कई चीजें।

और जब मैं 15 साल की थी, टीनएज का सबसे पीक ईयर आया था, तब बोर्ड परीक्षाओं का भी तनाव साथ में था। तब मेरी कभी न खत्म होने वाली क्लासेस चलती थी, स्कूल, एक्स्ट्रा लेक्चर ने मेरी लाइफस्टाइल को पूरी तरह बदल दिया था। इस बदलाव के बोझ के साथ परिवार से जुड़ी ऐसी कई समस्याएं थीं, जिन्होंने मेरे तनाव के स्तर को बड़ा दिया था। मैं हर चीज का सामना नहीं कर सकती थी क्योंकि मैं न तो इतनी बड़ी थी कि मैं अपने आसपास की चीजों को बदल सकती था और न ही बहुत युवा कि मुझे कुछ भी प्रभावित न करे। और 10वी बोर्ड क्लास के आखिरी के दो महीनों पहले मुझे दो महीने तक पीरियड्स नहीं आया और मेरा वजन भी बढ़ गया था, मेरे फैमिली डॉक्टर ने कहा कि यह सामान्य है। लेकिन जब मैंने देखा कि दो महीने में लगभग 10 किलो वजन बढ़ गया है, तो मैंने एक गायनिकोलॉजिस्ट को दिखाया और उन्होंने मुझे बताया कि यह पीसीओडी एक ओवेरियन डिसॉर्डर है, उन्होंने मुझे सोनोग्राफी टेस्ट कराने के लिए कहा।

उस दिन की यादें आज भी मेरे दिमाग में ताजा हैं, जब मैं अपनी मां का हाथ थामे थी और मैँ 10 प्रेग्नेंट महिलाओं के साथ सोनोग्राफी कराने वालों की लाइन में बैठी थी। जब रिपोर्ट आई तो पता चला कि यह हाइपर पीसीओडी एक हार्मोनल डिसॉर्डर है, जिसकी वजह से ओवरी में सिस्ट बनते हैँ और मैंन्स्ट्रुयल साइकिल डिस्टर्ब हो जाता है, ऐसे में इंसुलिन का लेवल बढ़ने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और वजन तेजी से बढ़ने लगता है। 4-5 महीने में ही मेरा वजन 40 किलो तक बढ़ गया और यह तब भी बढ़ रहा था, जब मैं मेडिकेसन के अंडर में डाइट को फॉलो कर रही थी। जब मैं सीढ़ियां चढ़ती या चलती तो ऐसा लगता कि किसी ने मेरे पैरों में पत्थरों को बांध दिया है, यहां तक कि मैं ठीक से सांस भी नहीं ले पाती थी। ख़ुद से मुझे नफरत होने लगी थी। एक दिन में 15 गोलियां खाना और मेरी बोर्ड परीक्षा के साथ ही मेरा वजन भी बढ़ता जा रहा था और मेरा आत्मविश्वास कम हो रहा था। क्योंकि तब समय की कमी के कारण मैँ अपने लिए ज्यादा कुछ कर भी नहीं पा रही थी।

मैं हमेशा से ही एक्स्ट्रोवर्ट यानी लोगों से मिलना-जुलना पसंद करने वाली लड़की थी, लेकिन पीसीओडी सिर्फ एक बीमारी नहीं थी, बल्कि इसने मेरी पूरी पर्सनाल्टी को बदल दिया था। मैं अब बहुत अधिक शांत और रिजर्व रहने लगी। मेरे फ्रेंड्स मुझसे वजन बढ़ने और व्यवहार में बदलाव आने के कारण पूछ रहे थे और जिन लोगों को मेरी परवाह नहीं थी, उन लोगों ने मोटी, सांड, हिप्पोपॉटमस, हाथी का बच्चा और न जाने किन-किन नामों से मुझे बुलाना शुरु कर दिया। ये शब्द सुनने में स्टूपिड और फनी लगते हैं, लेकिन जब कोई आपसे इस तरह बात करता है तो यह आपके दिल में पिन की तरह चुभता है और असहाय होने की पीड़ा आपको तब मार देती है। जब बाहरी लोग ऐसे बोलते हैँ तब तो ठीक है, लेकिन जब आपके अपने आपके साथ ऐसा करते हैं, तो ज़्यादा तकलीफ होती है, मेरे रिश्तेदारों और यहां तक ​​कि मेरे पापा ने भी मेरे मोटापे का मजाक उड़ाया और जब मैँ ख़ुद को देखती कि मैँ कितनी मोटी हो गई हूं। तो यह देखकर मैं और ज्यादा टूट रही थी।मुझे नहीं समझ आ रहा था कि मेरी गलती क्या थी न ही मैंने बहुत ज्यादा खाया था न ही अनहेल्दी फैट फूड खा रही थी। मैं खूबसूरत महसूस नहीं करती थी। लोग आएं और आपके गाल खींचने लगे लेकिन अब ये सब क्यूट नहीं लगता था। मैँ अब किसी भी स्टैंडर्ड में फिट नहीं थी।

मेरा आत्मविश्वास लगातार कम हो रहा था और यहां तक कि 6 डॉक्टर बदलने के बाद भी किसी ने भी सुधार का प्रॉमिस नहीं किया। वे कहने लगे इसका कोई उपचार नहीं है, कुछ ने तो मुझे ओवरियन कैंसर के नाम पर भी डराया और मुझे नई-नई चीजें फॉलो करने और नई दवाएं खाने के लिए दीं। इस बुरे समय में, मेरे पास सिर्फ एक ही मजबूत पिल्लर मेरी मां मेरे साथ थीं, जो मुझे हौसला दे रही थीं, मुझे हर स्थिति में वह मोटीवेट कर रही थीं। मेरी जब बोर्ड परीक्षाएं हुई मैने वेकेशन पर न जाने का फैसला किया और वर्कआउट करना शुरु किया, धीरे-धीरे मेरा वजन कुछ कम हुआ, अब मैं चल सकती थी और सीढ़ियां चढ़ते हुए ठीक से सांस ले पाती थी और मुझे महसूस होने लगा कि मेरी भी गर्दन है।

छुटिटयों के साथ ही मेरे मन में कॉलेज का तनाव आया, कॉलेज कैसे होगा, साथ के स्टूडेंट्स मेरा मजाक उड़ाएंगे, मेरी सेल्फ इमेज लो थी और एक मोटी लड़की होना और रैगिंग के खतरे ने मुझे डरा दिया था। मीडिया में कॉलेज लाइफ को जिस ढंग से बताया जाता है ख़ासकर फिल्मों में उसके बारे में सोचकर मुझे और ज़्यादा डर लगता था। जैसा कि मुझे लोगों ने बताया था उस हिसाब से मोटी लड़की के लिए कॉलेज बहुत अच्छा अनुभव नहीं था, लेकिन जब मैँ कॉलेज पहुंची तो सब कुछ फिल्मों जैसा नहीं था, जितना बुरा मैंने सोचा था। उसके उलट मेरे आसपास के लोग गर्मजोशी से मेरा स्वागत कर रहे थे और मुझे बॉडी शेम महसूस नहीं हो रही थी, लेकिन ऐसे लोग हर जगह हैं। मैंने समय के साथ कुछ फ्रेंड्स बनाए, मुझे लगा कि अब हर दिन कॉलेज जाना मुझे अच्छा लगने लगा है। मैंने कुछ सच्चे फ्रेंड्स बनाए जिन्होंने मुझे किसी और की तरह नॉर्मल फील कराया, मुझे एक नॉर्मल लड़की की तरह महसूस हुआ और न कि मोटी लड़की कि तरह जो कहीं भी फिट नहीं होती है।

मेरी बेस्ट फ्रेंड ने मुझे इमोशनली सपोर्ट किया और मुझे वर्कआउट के दौरान भी मोटीवेट किया। एक बार गर्मियों की छुटिटयों में मैँ कोलकाता गई और वहां मैंने एक फेमस गायनिकोलॉजिस्ट से मिली। उन्होंने मुझे बताया था कि मैँ जिन दवाइयों को ले रही थी, उनसे मेरी स्थिति सिर्फ खराब हो रही थी और यदि मैं इन दवाइयों को लगातार लेती रहूंगी, तो मैं 40 साल की उम्र से ज्यादा ज़िंदा नहीं रह सकूंगी, क्योंकि उन दवाइयों में स्ट्रॉन्ग स्टेरॉयड था। मुझे बहुत बड़ा झटका लगा और उन्होंने मुझे सिर्फ एक टेबलेट प्रिस्क्राइव्ड की इंसुलिन कंट्रोल के लिए और मुझे बताया कि मुझे अपनी लाइफस्टाइल बदलनी होगी। अपनी डाइट को टाइम पर मैंन्टेन करने के साथ सुधार की उम्मीद दी।

इसलिए समय के साथ न केवल फिजिकली बल्कि मेंटली भी मेरी स्थिति में सुधार होने लगा। अपने इस सफर के दौरान मैं कुछ अमेज़िंग लोगों से मिली, इससे मुझे ख़ुद पर भरोसा हो गया। मेरे पास रेग्युलर कोर्स या बीएमएम के बीच एक विकल्प था। बीएमए मेरा मेरा जुनून था, मैंने अपना जुनून चुना। स्ट्रेसफुल वर्क शेड्यूल और कॉलेज। इन सबके बीच मैंने कुछ समय वर्कआउट के लिए निकाला। मैं जैसी हूं वैसे ही रूप में मुझे मेरे फ्रेंड्स ने स्वीकार किया है। इस दुनिया में कोई भी किसी को भी दोस्त उसके बाहरी रंग-रूप के आधार पर नहीं बनाता है, बल्कि अंदर से आप कैसे हो यह मायने रखता है।

फोटोशॉप् की इस दुनिया में अब भी ऐसे लोग हैं, जो दिल पर फिदा होते हैं, उनके लिए आपकी गर्मजोशी से भरी रुहानी मुस्कान मायने रखती है न कि परफेक्ट कमर या खूबसूरत त्वचा। ऐसे लोग आज भी मेरी ज़िंदगी में हैं, जिनकी वजह से मैं आज यहां तक पहुंची हूं। हम सभी अपनी बॉडी से कहीं ज्यादा हैं, सिर्फ एक हिस्सा किसी व्यक्ति को परिभाषित नहीं कर सकता है। ख़ूबसूरती हमारे अंदर की आग से आती है। मेरी बॉडी सिर्फ मेरी है और किसी को भी इसका अपमान करने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद यदि कोई ऐसा करता भी है, तो आपको उस पर यकीन करने की ज़रूरत नहीं है। मैं इस बात पर ध्यान नहीं देती हूं कि दूसरे लोग क्या कहते हैं, मुझे ख़ुद पर भरोसा है कि मैं अपनी कीमत जानती हूं मैं अनमोल हूं क्योंकि मुझे पता है कि कोई भी इस दुनिया में मेरी जगह नहीं ले सकता है। आज मैं एक आत्मविश्वासी लड़की हूं, जो अपनी शर्तों पर अपनी ज़िंदगी जी रही है और अपनी ज़िंदगी में आ रहे हर मोड़ और बॉडी पर आ रहे हर निशान को स्वीकार कर रही हूं, क्योंकि ये मेरे सफर के टैटू हैं, क्योंकि ताकत आपके अंदर की गहराई से आती है, बस आपको कुछ लोगों की मोटीवेटर के रूप में ज़रूरत होती है, जो आपको सितारे की तरह चमकने में मदद करते हैं।

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