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दु:ख के साथ आगे बढ़ना - पैरेंट्स को खोने के दु:ख का मुक़ाबला करना

पैरेंट्स को खोना सिर्फ दु:ख की बात नहीं है। यह वह गहराई है, जो इंसान के लिए शब्दों से परे है। दर्द, क्रोध, निराशा, असहाय महसूस करना, त्याग, सदमा आदि कई तरह की भावनाएं और विचार इससे दिमाग़ में भर सकते हैं। दुःख का मुकाबला करना घाव को भरने का सफ़र है और इसे पूरा होने में समय लगता है।

"दु:ख वह क़ीमत है, जो हम प्यार के बदले चुकाते हैं।" -क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय

पैरेंट्स और बच्चे के बीच का रिश्ता आज के दौर में पहचाने जाने वाले सबसे पवित्र और मौलिक रिश्तों में से एक है। यह रिश्ता कैसा भी दिखाई दे, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। पैरेंट्स और बच्चे एक-दूसरे से गहरा प्यार और स्नेह करते हैं। जब हम किसी से बहुत प्यार करते हैं, तो उसे खोने का विचार भी डरावना हो सकता है। 

पैरेंट्स को खोने के दुख से इंसान सिर्फ हारा हुआ और अकेला महसूस नहीं करता, बल्कि वह आपके आसपास भौतिक रूप से भी एक खालीपन को जन्म दे देता है (यदि अब तक आप उनके साथ रहते रहे हों तो)। पैरेंट्स के साथ हम जिस रिश्ते को साझा करते हैं, वह अतुलनीय है और सबसे पवित्र संबंधों में से एक है। पैरेंट्स केवल हमें जन्म ही नहीं देते हैं बल्कि हमारा पालन-पोषण करके हमें बड़ा भी करते हैं और हर तरह की नकारात्मकता और बुराई से हमारी रक्षा भी करते हैं। प्रकृति और पोषण दोनों में ही मुख्य रूप से पैरेंट्स और अन्य लोग शामिल होते हैं।

दु:ख के अनुभव के पांच स्टेज : 

पैरेंट्स को खोने की तकलीफ का सामना चाहे किसी भी उम्र में करना पड़े, यह सबसे कठोर अनुभवों में से एक हो सकता है। दु:ख हमारे जीवन के साथ चलने वाला हिस्सा बन जाता है और इसके उपचार के सफर में कई मोड़ आते हैं। तभी हम इसमें आगे बढ़ते हैं। दुःख को हम पांच स्टेज में समझ सकते हैं। खोने का दु:ख या सदमा महसूस करने की वजह से वैराग्य या त्याग मन में उत्पन्न हो सकता है, ऐसा इसलिए क्योंकि इससे व्यक्ति को झटका लगता है, सुन्नता महसूस होती है और चारों तरफ ऐसा लगता कि सब कुछ व्यर्थ है। इसके अलावा व्यक्ति  गुस्सा आने लगता है, जिससे वह अन्य भावनाओं को व्यक्त करता है।
 
जब इंसान को लगता है कि उसने जो खोया है, वो उसके साथ गलत हुआ है, तो वह गुस्से से भर जाता है और वह ब्रह्मांड, ईश्वर, चिकित्सा या हर उस चीज़ के अस्तित्व पर सवाल उठाता है, जो मनुष्यों को सुरक्षित और जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 

अगली स्टेज पर कोई व्यक्ति इस तरह सोचना शुरू कर देता है कि "मैं ऐसा करूं तो क्या हो सकता है...", या "केवल अगर ऐसा हो तो..."। इस स्थिति में वो यह उम्मीद करने की कोशिश करता है कि यदि वह किसी के लिए कुछ करता है तो क्या उनका प्रियजन वापस लौट सकता है और ज़िंदगी सामान्य रूप से चल सकती है। 

इसके बाद हम डिप्रेशन की ओर बढ़ सकते हैं, जिसमें हम महसूस करते हैं कि यह दर्द और निराशा कभी खत्म नहीं हो सकती है। यह एक मानसिक बीमारी है, जिसे लेकर कन्फ्यूज नहीं होना चाहिए, और यह दुख और हानि की प्रतिक्रिया है। इसकी वजह से व्यक्ति अपने आसपास मौजूद लोगों से कटने लगता है और अपना ख्याल रखना छोड़ देता है। इस समय व्यक्ति सबसे बुरा महसूस कर सकता है। 

आखिरी स्टेज उस दुख की स्वीकृति है, जिसका मतलब यह नहीं है कि जो खो दिया, वह ठीक है या हम अब बिल्कुल ठीक हैं। इस प्वाइंट पर इसका मतलब ये है कि हम इस नुकसान का सामना करने के लिए तैयार हैं और अपनी ज़िंदगी को अब सामान्य रूप से जी सकते हैं। इसमें अभी भी उदासी और दर्द की भावनाएं शामिल हो सकती हैं, लेकिन यह आपको वास्तविक स्थिति को हकीकत में दिखाता भी है। 

स्थिति का सामना करना एक प्रक्रिया है, मंज़िल नहीं :

पैरेंट्स को खोने के दु:ख में हमें किन-किन चीजों का सामना करना होता है, इसकी कोई तय सूची नहीं है। यह नुकसान इतना बड़ा हो सकता है कि कभी-कभी कोई भी उपाय प्रभावी नहीं हो सकता है और ऐसा होता भी है तो यह ठीक है। दुख एक प्रक्रिया है और उसे ठीक करने के लिए समय चाहिए।

यहां नीचे कुछ चीजें दी गई हैं, जो हम खुद का ख्याल रखने के लिए कर सकते हैं :

1. दूसरों से सहयोग लें और एक सपोर्ट सिस्टम बनाएं, जो आपको अपने दु: ख से दूर रखने में मदद करेगा। एक या दो भरोसेमंद दोस्तों या परिवार के सदस्यों के साथ समय बिताने से आपको अपने दर्द को ठीक करने और उसे बांटने की प्रकिया में मदद मिलेगी। 
2. अपने शरीर और दिमाग की बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता दें जैसे कि खाना, सोना। दुख की स्थिति में भी हमें अपनी दिनचर्या को बनाए रखना ज़रूरी है। यदि हम अपने स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं, तो यह चिंताजनक हो सकता है। 
3. अपने पैरेंट्स से जुड़े विशेष दिन जैसे उनके जन्मदिन, शादी की सालगिरह, पुण्यतिथि आदि के अवसर पर उनकी याद में कुछ करने की कोशिश करें और दुख और खालीपन की भावनाओं को पकड़कर न रखें। 
4. उन चीजों की सूची बनाने की कोशिश करें, जिन्हें आप अपने पैरेंट्स के जाने के पहले करते थे। आप वापस उन एक्टिविटीज को शुरू कर सकते हैं। 
5. आप किसी प्रोफेशनल काउंसलर या थैरेपिस्ट की मदद ले सकते हैं। ऐसा करना काफी फायदेमंद हो सकता है। उन्हें इस तरह की स्थिति में आप की मदद करने और दु:ख से बाहर आने की स्ट्रेटजी और उन टूल्स पर काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
6. आपके पैरेंट्स जो पसंद करते हों, जैसे अच्छा खाना, घूमना, कोई अन्य एक्टिविटी या उनकी पसंद की कोई अन्य चीज, जिसे वो एन्जॉय करते हों, उसे किसी एक दिन या फिर हर दिन सेलिब्रेट कर सकते हैं। यह आपको उनसे और उनकी यादों से जोड़े रखने में मदद करेगा।
7. अपने प्रति उदार रहें और जब आपको ज़रूरत हो, तब अपनी सच्ची भावनाओं को व्यक्त करने की ख़ुद को आज़ादी दें। 
8. अपने पैरेंट्स को एक पत्र लिखें, जिसमें आप उनके लिए क्या महसूस करते हैं, उनका न होना क्या मायने रखता है और आप ज़िंदगी में आगे बढ़ने का क्या हौसला रखते हैं, इस सबका ज़िक्र हो। 
9.  रोज वॉक करने जाएं और धूप, पानी, प्रकृति से जुड़े रहें। 

दु:ख सिर्फ उदासी नहीं है। यह कई भावनाओं और विचारों का एक मिश्रण है। यह मुश्किल हो सकता है, फिर भी अलग-अलग काम करके अपनी देखभाल करने की कोशिश करें। इससे आपको ताजगी और राहत महसूस होगी। याद रखिए कि दर्द और मुश्किल के इस सफर में आप अकेले नहीं हैं। बस आपको अपना ख़याल रखने की ज़रूरत है।

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Nishtha JunejaTeentalkindia Content Writer

पीड़ा ही वो चीज़ है जो साधारण व्यक्ति को असाधारण नियति के लिए तैयार करती हैं- सी. एस. लुईस
 
ब्रिटिश कवि और लेखक का यह विचार बताता है कि कठिनाइयां थोड़े समय के लिए भले तक़लीफ़देह हों, लेकिन लंबे समय में वो अच्छे परिणाम देती हैं। कोई व्यक्ति किसी कठिन परिस्थिति से कितने समय में बाहर आता है, यह उसकी इस क्षमता पर निर्भर करता है कि उसे इसमें कितना समय लगेगा। एक व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति के बाद सामान्य जीवन में कितनी जल्दी वापस लौटता है, यह उसके लचीलेपर पर निर्भर करता है। 
 
अच्छी बात यह है कि यदि हम चाहें तो लचीलेपन को अपने अंदर समाहित कर सकते हैं। इसमें समय और मेहनत लग सकती है, लेकिन इसका फ़ायदा आपको ज़िंदगी भर मिल सकता है। 

कठिनाई किसी भी वजह से कुछ भी हो सकती है, जैसे कि किसी परीक्षा में नाक़ामयाब होना, किसी क़रीबी को खो देना, स्कूल या शहर बदलना, बीमारी से उबरना। रिसर्च के अनुसार, अगर जीवन में लचीलापन हो तो हमें अधिक खुशी, सफलता और बेहतर स्वास्थ्य मिलता है। 

अपने अंदर लचीलापन लाने के तरीके : 
 
1. फे़लियर से कुछ सीखिए : हर नाक़ामयाबी जीवन में नींव के पत्थर की तरह होती है। थॉमस एडिसन सही बल्ब के सिद्धांत पर पहुंचने से पहले 10 हजार बार नाकामयाब हुए थे। एडिसन ने एक बार कहा था, "मैंने नाकाम हो-होकर क़ामयाबी हासिल की है।" टीनटॉक एक्सपर्ट क्षितिजा सावंत के अनुसार, "बड़ी तस्वीर को देखने की क्षमता, ध्यान केंद्रित करना और हार न मानना, किसी को पिछली नाकामयाबी को देखने और आगे बढ़ने में सक्षम बनाता है।"
 
2. अपनी ताकत पर ध्यान केंद्र्रित करें :  राइटर टल-बेन शाहर, जिन्होंने हमें पॉज़िटिव साइकोलॉजी सिखाई है, ने अपनी किताब चूज़ द लाइफ में लिखा है कि यदि आप अपनी ताकत में निवेश करना चाहते हैं और ख़ुश और अधिक सफल होना चाहते हैं, तो कुछ सवालों के जवाब ख़ुद से पूछकर देखिए जैसे कि :  
 
मेरी ताकत क्या है?
मैं नेचरली किस चीज़ में अच्छा हूं? 
मेरी प्रतिभा किसमें है?
मेरी दूसरों से अलग खासियत क्या है?

3. ख़ुद को सपोर्ट करें : यदि आपका दोस्त किसी परीक्षा में नाकामयाब होता है, तो क्या आप उसकी नाकामयाबी के लिए कॉल करते हैं या उसे सपोर्ट करने के लिए कॉल करते हैं? अधिकांश केसों में, आप उसे सपोर्ट करने के लिए कॉल करते हैं। यही एटीट्यूड हमें खुद के प्रति भी दिखाना चाहिए। यदि हम कोई गलती करते हैं या अपनी ख़ुद से उम्मीद के हिसाब से कोई काम नहीं कर पाते हैं, तो आलोचना करने के बजाय क्या हम ख़ुद के प्रति कम्पेशन दिखाना सीख सकते हैं?

4. ह्यूमर : ख़ुद को बहुत ज्यादा गंभीरता से न लें। संदेह और दुख के पलों में ह्यूमर को लाने का प्रयास करें। ख़ुद की गलतियों पर हंस सकते हैं। हंसना या मुस्कराना कभी बुरा नहीं होता। जैसा कि कहा भी गया है कि हंसी सबसे अच्छी दवाई है। अपना पसंदीदा टीवी शो देखें या फिर जो आपको पसंद हो, उस स्टैंड-अप कॉमेडियन का शो देखें। 
 
5. कामयाबी पर फ़ोकस करें : कभी-कभी हम अपनी पिछली कामयाबी की तुलना में पिछली नाकामयाबियों पर अधिक फोकस करते हैं। यह असलियत को देखने का एक खराब नज़रिया बनाता है। जब भी आप कोई छोटी-सी चीज़ भी अच्छी करें, तो ख़ुद ही अपनी पीठ थपथपाएं। अपनी कामयाबी और उससे जुड़े पलों को याद करें। 

और अंत में यही कहूंगा कि शेरिल सैंडबर्ग ने अपनी किताब ऑप्शन बी में लिखा है- यदि लोगों में लचीलापन हो तो उन्हें अहसास होता है कि उनके पास अपने जीवन को आकार देने की शक्ति है।
    
अगर आपके पास कोई और सवाल हो तो आप टीनटॉक इंडिया एक्सपर्ट को expert@teentalkindia.com पर लिख सकते हैं।

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