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किसी अपने को खोने के दर्द की भरपाई कैसे करें

जो खुशबू वो अपने पीछे छोड़ कर गए थे वो भी मुझे बेहद कीमती लगती थी।

राइटर-जर्नालिस्ट खूबी अमीन अहमद ने किसी अपने को खोने के दर्द को बयां किया...

अपने नानाजी को खोने के बाद जब भी मैं अपने जीवन में हुए नुकसान के बारे में लिखने के लिए अकेले में बैठती हूं तो मैं ये तय नहीं कर पाती हूं कि मैंने अपने नानाजी, मेरे सबसे अच्छे दोस्त, अपने विश्वास, मेरे मार्गदर्शक या मेरे फिलोस्फर, इनमें से किस शख्स को मैंने अपने जीवन में खो दिया है। उनका मेरे जीवन से जाना एक नुकसान है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

जब मेरे नानाजी की मृत्यु हुई तो मेरे परिवार में किसी में भी इतना साहस नहीं था कि उनकी मौत की खबर मुझे दे सके। उन्होंने मेरे घर आने का इंतजार किया और जब मैंने खुद अपनी आंखों से उन्हें देख लिया। उसके बाद उन्होंने एक सफेद चादर में लपेट दिया गया। उनके चेहरा बेहद शांत दिखाई दे रहा था। मैं बता नहीं सकती हूं कि उस वक्त मैं कैसा लग रहा था। मुझे कुछ भी महसूस होना बंद हो गया था। मैं बिल्कुल नील हो गई थी। मैं शायद उस वक्त रोई थी। मुझे ज्यादा कुछ याद नहीं है। मुझे दर्द नहीं महसूस हो रहा था पता नहीं क्यों। दरअसल मैं नानाजी की मौत को स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी। 

मुझे याद है मैंने उनके सिर को अपने हाथों में रखा हुआ था, मैं उनको बार-बार कह रही थी कि मुझे अकेला छोड़ कर ना जाएं। मैं बेहद खुदगर्ज हो गई थी, क्योंकि मैं हमेशा उनके साथ रहती थी और मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि वो मुझसे मिले बिना ही चले गए। मैं उस दिन के बाद आए कई दिन मुझे याद नहीं है। क्योंकि कई दिनों तक नानाजी के पलंग पर सोती रहती थी। मैं उनके कंबल को ओढ़ कर सो जाती थी और उनकी खुशबू को जितनी ज्यादा देर तक को महसूस करना चाहती थी। 

एक सुबह जब में उठी तो मुझे बताया गया कि नानाजी को गए एक हफ्ता हो चुका है। मुझे याद दिलाया गया कि आप मेरी जॉब है और मुझे वापस लौटने की तैयारी करनी चाहिए। उसी वक्त मेरी एक रिश्तेदार ने मुझे शादी के लिए लड़कों से मुलाकात करने के लिए कहा। मुझे उस वक्त ये समझ ही नहीं आया कि मैं उन्हें क्या जवाब दूं और कैसे समझाऊं कि मैं उस वक्त किस दर्द से गुजर रही थी। 

उन्होंने समझाया कि ये दुख विनाशकारी हो सकती है। लेकिन दुख मिलने बड़े होने की निशानी है। ऐसा अब शायद जीवन में कई बार होगा कि हम अपने प्रिय लोगों को खोते जाएंगे, अंतत: हमें इसे स्वीकार करना चाहिए कि किसी जिंदगी से जाना कोई नहीं रोक सकता है। इसलिए हमे इसे स्वीकार करना सीखना चाहिए। वक्त सभी घाव भर देता है। इंसान को खुद को हर तरह हालात के लिए तैयार रखना चाहिए। ये आगे बढ़ने में मदद करता है। मुझे सभी लोग समझा रहे थे। मुझ पर दया दिखा रहे थे। मैं ये समझ पा रही थी कि वो मुझे इस दर्द से बाहर निकालना चाहती हैं। इसलिए मैंने उनको यही कहा कि मैं बस उन्हें खोना नहीं चाहती थी। 

मैं अब भी उन्हें खुद से दूर नहीं करना चाहती हूं और ना कभी कर पाऊंगी। मैं आगे भी उन्हें खुद से अलग नहीं कर पाऊंगी। मैं उन्हें अपने जीवन के उसूलों में जिंदा रखूंगी। मैं कुछ ऐसा करूंगी कि उन्हें गर्व महसूस करवा सकूं। मैं उन्हें अपने पास रख कर उनसे सकारात्मकता और प्रेरणा लेती रहूंगी। वो मेरे विश्वास का एक जरिया हैं और हमेशा रहेगा। वो मुझमें और मेरे नाम में जीवित हैं।  

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