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टीनएज एंग्ज़ाइटी से निपटने के टिप्स

टीनएज एंग्ज़ाइटी को मैनेज करना बहुत मुश्किल हो सकता है। बहुत-से बदलावों के बीच चिंता में डाल देने वाले विचार और फ़ीलिंग्स आ सकती हैं। ऐसे में ये कुछ टिप्स मददगार साबित हो सकते हैं।


जीवन में किसी न किसी समय हम सभी ने विभिन्न स्ट्रेसर्स के तनाव भरे विचारों और फ़ीलिंग्स को जाना होगा। यह किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे दु:ख और दर्द, चिंता देने वाले ख़याल, हार्टरेट का बढ़ना, पसीने-पसीने होना, डर आदि।

एंग्ज़ाइटी के यह लक्षण हो सकते हैं लेकिन इतने ही नहीं हैं :

बेचैनी महसूस करना

जल्दी थक जाना

एकाग्र नहीं हो पाना

चिड़चिड़ापन होना

मसल्स में खिंचाव या थकान

नींद न आना या नींद पूरी न होना

दूसरों से दिलासा मांगना

बहुत सारी लिस्ट्स बनाना 

ऐसी बहुत-सी चीज़ें हो सकती हैं, जो हमें रोज़ाना परेशान कर सकती हैं। मगर, यह याद रखना बहुत ज़रूरी है कि हम अपने विचारों और फ़ीलिंग्स के कंट्रोल में होते हैं। एंग्ज़ाइटी के दौरान इससे निपटने के लिए ये टिप्स फ़ॉलो करने की कोशिश कीजिए और अपनी मदद कीजिए-

सबसे पहले, गहरी सांस लीजिए, नाक से सांस लेकर मुंह से छोड़िए

चिंता देने वाले विचारों को पहचानना सीखिए और देखिए कि क्या वे सही हैं या बिल्कुल बेतुके।

यदि वे बेतुके हैं, तो उन्हें कसौटी पर कसिए। यह भी जानने की कोशिश कीजिए कि उन्हें सपोर्ट करने वाली कोई चीज़ें तो नहीं हैं। यदि नहीं हैं तो उन विचारों को रद्द कर दीजिए।

यदि आप तनाव महसूस कर रहे हैं या आपको ऐसी आशंका है तो कैफ़ीन न पीएं।

अपने आसपास ये चीज़ें खोजने की कोशिश करें- 5 चीज़ें जो आप देख सकते हैं, 4 चीज़ें जो आप छू सकते हैं, 3 चीज़ें जिन्हें आप सुन सकते हैं, 2 चीज़ें जिन्हें आप सूंघ सकते हैं और 1 चीज़ जिसका आप स्वाद ले सकते हैं। यह आपके ध्यान को फिर से वर्तमान में ले आने में मदद करेगा और आपको चिंता से दूर रखेगा।

दिन में एक ऐसा समय तय करें, जिसमें आप उस चीज़ के बारे में सोच सकें, जो आपको परेशान कर रही है। इसके अलावा बाक़ी समय चिंता और परेशान कर देने वाले विचारों को कंट्रोल करने की कोशिश करें।

अपने शेड्यूल में फ़िज़िकल एक्टिविटीज़ को भी शामिल करें (एक्सरसाइज़, योगा, दौड़ना, टहलना, जॉगिंग, स्कीपिंग, स्पोर्ट्स, साइकिलिंग, मार्शल आर्ट्स आदि)

घर का कुछ काम कीजिए या अपने क्लोसेट या स्टडी टेबल को जमा लीजिए।

लोगों के साथ एक सार्थक दोस्ती और रिलेशनशिप बढ़ाइए।

उस चीज़ को खोजिए जो आपको शांति देती है और फिर उसे बार-बार कीजिए।

एंग्ज़ाइटी बहुत भयानक और डरावनी हो सकती है, लेकिन जब आप यह पता करना सीख जाएं कि कौन-सी चीज़ आपकी चिंता का कारण है, तो फिर आप उन्हें अधिक रियलिस्टिक और तार्किक विचार से बदल सकते हैं। इन तर्कहीन और चुनौतीपूर्ण विचारों को लिखना वाक़ई में मददगार हो सकता है। अपने किसी दोस्त से बात कीजिए और उन्हें आपको चैलेंज करने के लिए कहिए, क्योंकि तब आप उनके साथ-साथ ख़ुद के लिए भी जवाबदेह रहेंगे।

आप इस एंग्ज़ाइटी से ज़्यादा मज़बूत और साहसी हैं। स्वयं को याद दिलाते रहिए कि आप इसे कंट्रोल कर सकते हैं और यदि कहीं कुछ नेगेटिव है तो वहां कुछ न कुछ पॉज़िटिव भी ज़रूर है। बस आपको नज़दीक से और धैर्य से देखना है। रुकिए, गहरी सांस लीजिए और फिर इसे रिपीट कीजिए!
 

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एक असर्टिव पर्सनैलिटी बनाना

अधिक असर्टिव होना सीखिए, जानिए असर्टिव होने के फ़ायदे
Ritika SrivastavaTeentalkindia Counsellor

असर्टिवनेस एक ऐसा स्किल है, जिसके बारे में सोशल और कम्युनिकेशन स्किल्स ट्रेनिंग में ज़रूर बताया जाता है। असर्टिव होने का अर्थ है शांत और पॉज़िटिव तरीक़े से अपने और दूसरों के अधिकारों के लिए खड़े होना और अग्रेसिव या पैसिव रूप से ग़लत चीज़ को स्वीकार नहीं करना। असर्टिव पर्सनैलिटी डेवलप करना टीनएज के शुरुआती वर्षों में शुरू किया जा सकता है।

हमारे टीनटॉकइंडिया एक्सपर्ट द्वारा यहां कुछ टिप्स दिए गए हैं, जो अधिक असर्टिव होने में आपकी मदद करेंगे।

-ख़ुद को पॉज़िटिव तरीक़े से असर्ट करने का निश्चय करें  : पैसिव या अग्रेसिव  होने के बजाय असर्टिव होने के लिए कमिटेड हों और इसकी प्रैक्टिस आज ही से एक टीन के रूप में शुरू कर दें। 

-ओपन और ईमानदार कम्युनिकेशन : अपनी फ़ीलिंग्स, चाहत, ज़रूरत, फ़ेथ और ओपिनियन को शेयर करते वक़्त दूसरों को सम्मान देना न भूलें।

-अच्छे से सुनें : दूसरों के पॉइंट ऑफ़ व्यू को समझने की कोशिश करें और जब वे कुछ समझा रहे हों तो उन्हें बीच में न टोकें।

-डिसअग्री होने को तैयार रहना : यह जानना बहुत ज़रूरी है कि एक अलग पॉइंट ऑफ़ व्यू होने का अर्थ यह नहीं है कि आप सही हैं और दूसरा व्यक्ति ग़लत।

गिल्ट करना छोड़ें : ईमानदार रहिए और दूसरों को बताइए कि आप क्या फ़ील करते हैं। या बिना कोई आरोप लगाए या उन्हें शर्मिंदगी महसूस करवाए बिना उन्हें बताएं कि आप क्या चाहते हैं। 

शांत रहिए : नॉर्मली सांस लीजिए, आई कॉन्टैक्ट बनाइए, अपने चेहरे को रिलेक्स रखिए और नॉर्मल आवाज़ में बोलिए।

प्रॉब्लम सॉल्विंग अप्रोच रखें : लोगों को अपने दोस्त की तरह देखें न कि दुश्मन की तरह।

असर्टिवनेस रखें : मिरर के सामने या किसी दोस्त के साथ असर्टिव तरीक़े में बात करें। अपनी बॉडी लैंग्वेज और भाषा को लेकर भी सतर्क रहें। 

मैं का उपयोग करें : उन स्टेटमेंट को शामिल करें, जिनमें ‘मैं' हो जैसे ‘मैं सोचता हूं' या ‘मैं फ़ील करता हूं'। इस तरह की होस्टाइल भाषा का उपयोग न करें जैसे ‘तुम हमेशा' या ‘तुम कभी नहीं'।

धैर्य रखिए : असर्टिव होना एक स्किल है, जिसके लिए प्रैक्टिस की ज़रूरत होती है। याद रखिए कभी-कभी किसी और समय के बजाय आप इसे अच्छे से करेंगे, लेकिन आप हमेशा अपनी ग़लतियों से सीख सकते हैं।

असर्टिव पर्सन होने के फ़ायदे :

सोशल एंग्ज़ाइटी नहीं रहती और दूसरों से अप्रूवल की ज़रूरत नहीं बचती : जैसे कि हम अपने विश्वास, ज़रूरतें एक्सप्रेस करने में सक्षम हो जाते हैं, तब हमें किसी भी प्रकार डिअप्रूवल के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं होती। 

बेहतर सेल्फ कॉन्फ़िडेंस और सेल्फ़-रिस्पेक्ट : जब हम ईमानदारी से एक्सप्रेस करते हैं कि हम क्या फ़ील कर रहे हैं और हमें क्या चाहिए, तब हम अपने दिमाग़ को मज़बूत बनाते हैं कि हम भी महत्त्वपूर्ण और वैल्यूएबल हैं। और, आख़िरकार यह हमारे सेल्फ़-कॉन्फ़िडेंस और सेल्फ़-रिस्पेक्ट का अच्छा स्रोत है।

रिलेशनशिप्स और पार्टनरशिप्स में सुधार : कम्युनिकेशन के सारे इशू असर्टिवनेस की समस्या है। जब हम जानते हैं कि अपने दोस्तों और परिवार के साथ अर्सिटिव होकर कैसे बात करना है, तब रिलेशनशिप्स का हर पहलू इम्प्रूव होता है।
हम सभी को कॉन्फ़िडेंट होना चाहिए, लेकिन हर कोई नहीं जानता कि असर्टिव कैसे रहा जाता है। पैसिव और अग्रेसिव के बीच में असर्टिवनेस होती है। 
 

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