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हकलाने के बारे में वह सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं

देखें तो हकलाना बुरा नहीं, क्योंकि जो कुछ मैं कहता हूं, वह दोहराने लायक़ होता है- द स्टटरिंग फ़ाउंडेशन
Snigdha Teentalkindia Counsellor

‘मुझे बहुत अजीब महसूस होता है, जब मैं किसी ऐसे व्यक्ति के साथ पहली बार बात करता हूं, जिसे मेरी हकलाहट के बारे में पता नहीं होता है। उस समय मेरे दिमाग़ में बहुत सारी बातें आती हैं कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी, वे क्या सोचेंगे, मैं शायद उनका समय बर्बाद कर रहा हूं और शायद वे भी यही बात सोच रहे होंगे। मुझे सबसे बुरा तब लगता है, जब कोई मेरे बोलने से पहले ही मेरा वाक्य पूरा कर देता है। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस होती है। यह कुछ ऐसी चीज़ है, जिसका मैं बचपन से सामना कर रहा हूं। इसी कारण मुझे स्कूल में सहपाठियों द्वारा बहुत परेशान (bullied) भी किया गया।'

यह एक ऐसे व्यक्ति की भावनाओं और अनुभवों के बारे में है, जिसे बचपन से हकलाने की समस्या रही है। हममें से शायद कुछ लोग उन्हें जानते होंगे, जो बोलते वक़्त हकलाते या तुतलाते हैं। शायद हममें से कुछ के दिमाग़ में यह प्रश्न भी आया होगा कि उनके साथ ऐसा क्या होता है? वे हकलाते क्यों हैं? क्या यह कुछ क्षणों के लिए होता है या वे हमेशा इसी तरह बात करते हैं? क्या उन्हें किसी प्रकार की बीमारी या अक्षमता है?‌ क्या इसका कोई इलाज है? वे इस स्थिति का सामना कैसे करते हैं?

इस लेख में आपको सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे।

हकलाना/तुतलाना क्या है?

यह एक स्पीच डिसऑर्डर है, जिसमें कोई व्यक्ति किसी शब्द को बोलने में कठिनाई महसूस करता है या एक ही शब्द बार-बार दोहराता है। जब वे कुछ कहने की कोशिश करते हैं तो उनके होंठ और जबड़े थरथराने लगते हैं, उनकी आंखें तेजी से झपक सकती हैं। अमेरिकन-स्पीच-लैंग्वेज-हियरिंग एसोसिएशन के अनुसार, ऐसे कुछ लोग जिन्हें हकलाहट की दिक़्क़त है, बोलने के दौरान चिंतित हो जाते हैं या उनकी सांस फूलने लगती है। उनकी आवाज़ पूरी तरह से बंद भी हो सकती है।

जब बच्चे पहली बार बोलना शुरू करते हैं तो उनका हकलाना सामान्य होता है और बहुत-से बच्चे 5 वर्ष की उम्र तक इस समस्या से निजात भी पा लेते हैं। तक़रीबन 1 प्रतिशत जनसंख्या इसका अनुभव किशोरावस्था या यौवन तक करती है और तब उन्हें पेशेवर स्पीच थैरेपिस्ट की मदद की आवश्यकता होती है ताकि वे बोलने के दौरान होने वाली कठिनाई से पार पा सकें।

कुछ बॉलीवुड सेलेब्रिटीज़ ने भी हकलाहट का अनुभव किया है।

ऋतिक रोशन भी हकलाने की समस्या से पीड़ित थे और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना सीखने के लिए एक स्पीच थैरेपी ली थी। वे अभी भी यह स्पीच एक्सरसाइज़ रोज़ाना करते हैं।

समीरा रेड्‌डी भी हकलाहट को दूर करने के संघर्ष के बारे में खुलकर बात कर चुकी हैं।

हकलाहट के कारण 
हालांकि इसका कोई एक विशेष कारण नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर कहा जा सकता है कि तुतलाना/हकलाना जेनेटिकल होने के साथ-साथ न्यूरोलॉजिकल भी हो सकता है। लेकिन यदि इसका कम उम्र में पता चल जाए तो इसे ठीक करने में ज़्यादा समय नहीं लगता है।हालांकि मनौवैज्ञानिक कारण भी इस मुश्किल को और बदतर बना देते हैं। तनाव, सामाजिक चिंता, शर्मिंदगी, घबराहट और आत्मविश्वास की कमी- ये कुछ मनोवैज्ञानिक कारण हैं।

इलाज
हकलाने का इलाज सम्भव है। स्पीच थैरेपी विशेषज्ञ इस स्थिति में मदद कर सकते हैं। स्पीच थैरेपिस्ट के द्वारा कई तरह की थैरेपी उपयोग की जाती है जैसे फ्लूएंसी शेपिंग थैरेपी यानी धाराप्रवाह बोलने में आने वाली परेशानी को दूर करना, स्टटरिंग मोडिफ़िकेशन, इलेक्ट्रॉनिक फ्लूएंसी थैरेपी आदि जो लोगों की हकलाहट दूर करने में और धाराप्रवाह बोलने में मदद करती है।
 
कोई यदि हकलाता है तो उससे कैसे बात करें?
सबसे पहले तो श्रोता के रूप एक चीज़ दिमाग़ में रखें कि जो लोग हकलाते हैं उनके पास कहने के लिए बहुत-सी बातें होती हैं और वे भी अन्य लोगों की तरह बातचीत करना चाहते हैं। यदि कोई उनसे आंखें मिलाकर बात नहीं करेगा, बातचीत के दौरान इधर-उधर ताकेगा, तो यह उन्हें बेइज़्ज़ती की तरह भी लग सकता है और घबराहट के कारण उनकी हकलाहट और बदतर हो सकती है। श्रोता का सारा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि वे क्या कहना चाह रहे हैं न कि इस पर कि वे किस तरह कह रहे हैं। आपका धैर्यभरा, सचेत और शांत व्यवहार उन्हें बिना किसी चिंता के अपनी बात कहने में मदद करेगा। 

कभी-कभी जाने-अनजाने हम कुछ ग़लतियां कर जाते हैं, जैसे उनके लिए वाक्य को पूरा कर देना या उन्हें कहना कि उन्हें कुछ देर आराम करना चाहिए। हम शायद यह बातें उन्हें सहज महसूस करवाने के लिए कहते हैं किंतु यह उन्हें अधिक चिंता और घबराहट में डाल सकता है और उनकी आवाज़ अधिक बिगड़ सकती है।

अंत में, हम सभी को दिमाग़ में एक चीज़ रखने की ज़रूरत है। वे हमारी ही तरह हैं, हमारी ही तरह बुद्धिमान हैं। लिहाज़ा हमें उन्हें सहज महसूस करवाना होगा, बजाय इसके कि हम उन्हें ऐसी चीज़ के लिए बुरा महसूस करवाएं जिसे लेकर वे पहले से ही असहज हैं। 
 

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