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एक निराशावादी क्या आशावादी बन सकता है?

एक निराशावादी क्या आशावादी बन सकता है?


अपने शुरुआती वर्षों में, बच्चे और टीनएजर्स अपनी इमोशनल वाइब्स घर से पाते हैं। यदि घर का वातावरण सहज और प्यारभरा हो, तो बच्चों का सही विकास होता है, भले ही उनका स्वभाव चीज़ों को लेकर फ़िक्र करने वाला हो। 

लेकिन यदि वातावरण चिंता से भरा हुआ हो, तब आशावाद को सबसे पहले हानि पहुंचती है। भावनात्मक रूप से स्थिर और आशावादी होना तब और मुश्किल हो जाता है, जब आपको आपके पैरेंट्स के द्वारा ही इस तरह से न तैयार किया गया हो। 

निराशावादी कभी-कभी कठिन समय के लिए बेहतर तरीक़े से तैयार होते हैं।

यदि आप एक निराशावादी हैं, तो आप रुकावटों को पहले देख सकते हैं, चीज़ों के ग़लत होने की आशंका रख सकते हैं, और हो सकता है कि समस्याओं के लिए ज़्यादा अच्छे-से प्लान कर सकते हैं।

निराशावादी अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम पहले करते हैं, और जब चीज़ें ग़लत होने लगती हैं, तब उन पर उठाए गए प्रश्न उन्हें परेशान नहीं करते, क्योंकि वे पहले ही ऐसा होने की उम्मीद कर चुके थे।

जबकि, आशावादी स्वस्थ, ख़ुश, अधिक सफल (वित्तीय तौर पर, सामाजिक तौर पर, और अलग-अलग तरीक़ों से भी) होते हैं, इनके रिश्ते मज़बूत तथा सफल होते हैं। एक आशावादी मुश्किलों में उलझ जाने के बजाय नए जवाबों की खोज करता है; वह हर कठिन समय से गुज़रने की उम्मीद रखता है।

तो संकट की तैयारी किए बिना आप आशावादी कैसे बने रह सकते हैं?

सबसे अच्छे की उम्मीद, सबसे बुरे की तैयारी :
इससे आप आशावाद के कई लाभ ले सकते हैं, और वह भी ख़ुद को जोख़िम में छोड़े बिना। ठीक उसी तरह, जैसे निराशावादी उन चीज़ों के बारे में विचार करता है जो ग़लत हो सकती हैं, और फिर किसी अनहोनी से निपटने के लिए बैकअप प्लान बनाने और सम्भावनाओं को तलाशने लग जाते हैं।

अपनी नकारात्मकता पर ध्यान दीजिए : 
इस बात पर ध्यान दीजिए कि आप जो बातें कहते हैं, वो कितनी नकारात्मक हैं। अपने विचारों को रोज़ाना ट्रैक कीजिए और उनमें नकारात्मकता और उसके परिणाम को नोटिस कीजिए। बदलाव लाने के लिए अपनी नकारात्मकता को पहचानना बहुत ज़रूरी है।

सोचिए क्या ज़रूरी है : 
आपके पास जो है, उसका आनंद लीजिए, और साथ ही ख़ुद को यह याद दिलाते रहिए आपके पास जो है, आपका अस्तित्व उससे अधिक है। आप चाहें तो समय-समय पर अपनी ताक़त और संसाधनों के बारे फिर से सोच सकते हैं।

कृतज्ञता का भाव लाएं : 
आपके पास जो है, उसके प्रति आभारी रहिए। लेकिन उसमें इतना भी ख़ुद को ना समा लें कि आप अपनी ज़िंदगी की कल्पना उसके बिना कर ही नहीं सकते।

वक़्त बीत ही जाता है : 
लोग बड़ी नाक़ामयाबी से इतना दुखी महसूस नहीं करते, जितना कि वे उसके पूर्वानुमान से दुखी हो जाते हैं। जो लोग बड़ी विफलता से गुजरते हैं, सामान्यत: वे कुछ ही हफ्ते या महीनों बाद सुख-दु:ख के सामान्य स्तर पर लौट आते हैं। आशावादी लोग अधिक ख़ुश महसूस करते हैं और निराशावादी थोड़ा कम ख़ुश, लेकिन यदि आप एक निराशावादी हैं, तो आशावादी होना सीखा जा सकता है।

हर सिचुएशन में पॉज़िटिव एंगल :
अधिकतर सिचुएशन को सकारात्मक और नकारात्मक नज़र से देखा जा सकता है। बस आपको सकारात्मक पक्ष की ओर ध्यान देना है और अपने विश्वास को पुख़्ता रखने के लिए अपने आप को उसके बारे में याद भी दिलाते रहना है। 

सकारात्मक सोच के कई लाभ होते हैं, जैसे बढ़िया सेहत और अच्छी नींद। हां, आशावाद आपके लिए तब घातक भी साबित हो सकता है, जब आप असलियत को नकार कर फ़ैंटेसी में घिरे रहें।

आशावाद और वास्तविक सोच का मेल जीवन को नई दिशा दे सकता है। रियलिस्टिक थिकिंग का यह अर्थ नहीं कि केवल जीवन के उजले पक्ष की ओर ही देखें। यह तो आपके आशावाद को सपोर्ट करने का एक तरीक़ा, है ताकि आप एक सकारात्मक भविष्य का निर्माण कर सकें।

जब आप अपने कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर क़दम रखते हैं तभी आप बदलते हैं और आगे बढ़ना शुरू कर पाते हैं। -बेनेट

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टीनएज एंग्ज़ाइटी से निपटने के टिप्स

टीनएज एंग्ज़ाइटी को मैनेज करना बहुत मुश्किल हो सकता है। बहुत-से बदलावों के बीच चिंता में डाल देने वाले विचार और फ़ीलिंग्स आ सकती हैं। ऐसे में ये कुछ टिप्स मददगार साबित हो सकते हैं।
ArchitaTeentalk Expert


जीवन में किसी न किसी समय हम सभी ने विभिन्न स्ट्रेसर्स के तनाव भरे विचारों और फ़ीलिंग्स को जाना होगा। यह किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे दु:ख और दर्द, चिंता देने वाले ख़याल, हार्टरेट का बढ़ना, पसीने-पसीने होना, डर आदि।

एंग्ज़ाइटी के यह लक्षण हो सकते हैं लेकिन इतने ही नहीं हैं :

बेचैनी महसूस करना

जल्दी थक जाना

एकाग्र नहीं हो पाना

चिड़चिड़ापन होना

मसल्स में खिंचाव या थकान

नींद न आना या नींद पूरी न होना

दूसरों से दिलासा मांगना

बहुत सारी लिस्ट्स बनाना 

ऐसी बहुत-सी चीज़ें हो सकती हैं, जो हमें रोज़ाना परेशान कर सकती हैं। मगर, यह याद रखना बहुत ज़रूरी है कि हम अपने विचारों और फ़ीलिंग्स के कंट्रोल में होते हैं। एंग्ज़ाइटी के दौरान इससे निपटने के लिए ये टिप्स फ़ॉलो करने की कोशिश कीजिए और अपनी मदद कीजिए-

सबसे पहले, गहरी सांस लीजिए, नाक से सांस लेकर मुंह से छोड़िए

चिंता देने वाले विचारों को पहचानना सीखिए और देखिए कि क्या वे सही हैं या बिल्कुल बेतुके।

यदि वे बेतुके हैं, तो उन्हें कसौटी पर कसिए। यह भी जानने की कोशिश कीजिए कि उन्हें सपोर्ट करने वाली कोई चीज़ें तो नहीं हैं। यदि नहीं हैं तो उन विचारों को रद्द कर दीजिए।

यदि आप तनाव महसूस कर रहे हैं या आपको ऐसी आशंका है तो कैफ़ीन न पीएं।

अपने आसपास ये चीज़ें खोजने की कोशिश करें- 5 चीज़ें जो आप देख सकते हैं, 4 चीज़ें जो आप छू सकते हैं, 3 चीज़ें जिन्हें आप सुन सकते हैं, 2 चीज़ें जिन्हें आप सूंघ सकते हैं और 1 चीज़ जिसका आप स्वाद ले सकते हैं। यह आपके ध्यान को फिर से वर्तमान में ले आने में मदद करेगा और आपको चिंता से दूर रखेगा।

दिन में एक ऐसा समय तय करें, जिसमें आप उस चीज़ के बारे में सोच सकें, जो आपको परेशान कर रही है। इसके अलावा बाक़ी समय चिंता और परेशान कर देने वाले विचारों को कंट्रोल करने की कोशिश करें।

अपने शेड्यूल में फ़िज़िकल एक्टिविटीज़ को भी शामिल करें (एक्सरसाइज़, योगा, दौड़ना, टहलना, जॉगिंग, स्कीपिंग, स्पोर्ट्स, साइकिलिंग, मार्शल आर्ट्स आदि)

घर का कुछ काम कीजिए या अपने क्लोसेट या स्टडी टेबल को जमा लीजिए।

लोगों के साथ एक सार्थक दोस्ती और रिलेशनशिप बढ़ाइए।

उस चीज़ को खोजिए जो आपको शांति देती है और फिर उसे बार-बार कीजिए।

एंग्ज़ाइटी बहुत भयानक और डरावनी हो सकती है, लेकिन जब आप यह पता करना सीख जाएं कि कौन-सी चीज़ आपकी चिंता का कारण है, तो फिर आप उन्हें अधिक रियलिस्टिक और तार्किक विचार से बदल सकते हैं। इन तर्कहीन और चुनौतीपूर्ण विचारों को लिखना वाक़ई में मददगार हो सकता है। अपने किसी दोस्त से बात कीजिए और उन्हें आपको चैलेंज करने के लिए कहिए, क्योंकि तब आप उनके साथ-साथ ख़ुद के लिए भी जवाबदेह रहेंगे।

आप इस एंग्ज़ाइटी से ज़्यादा मज़बूत और साहसी हैं। स्वयं को याद दिलाते रहिए कि आप इसे कंट्रोल कर सकते हैं और यदि कहीं कुछ नेगेटिव है तो वहां कुछ न कुछ पॉज़िटिव भी ज़रूर है। बस आपको नज़दीक से और धैर्य से देखना है। रुकिए, गहरी सांस लीजिए और फिर इसे रिपीट कीजिए!
 

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