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Dealing with Eco-anxiety

Rain rain go away, come again another day... Many of us would have reminded of this nursery rhyme in the recent heavy course of rains

Most of us might be anxious due to rains by now. Since this year there have drastic climatic changes around the world, a new kind of anxiety called Eco-anxiety has come into play. Although this anxiety is not new but the term is, and is used to explain the anxiety, grief, and despair that is felt about the state of the climate or environment changes.

Did you cry when you heard recently that Amazon is on fire? Does the question, “plastic or marine life?” make you worry? Or do you worry that soon there wouldn’t be enough water on Earth for every one of us? If you answered “Yes” to any of these questions then you may be one of those who has an eco-anxiety. Eco-anxiety is real, according to some psychologists, and it can really stress you out.

However, like every anxiety, even eco-anxiety can be dealt with:

Acceptance

This might be the hardest step in fighting climate change. If you’re going to keep eco-anxiety at bay you HAVE to learn to live with both the positive and negative emotions and realize that not everything is simple cut-and-dry. You can make peace with something without condoning. When you start to feel very overwhelmed by impending climate doom practice acceptance without complacency.

Get a new view

Just as you need to accept that bad things might happen, you also need to accept that good things might happen too. When you have this very clear big picture of how amazing things could be it becomes so much easier to talk to people and guide them too. It also becomes so much easier to take action because you have a clear vision of what you’re fighting for. Take a few moments to journal or just daydream about how wonderful the future could be.  Describe in detail how awesome the future could look.

Find a support system

When you’re feeling overwhelmed, it’s also easy to feel isolated, and one of the best ways to combat this loneliness is to find a group of like-minded people. Remember that you’re not alone. There are TONS of people, groups, and organizations that are all working towards change.

Get to work

After you’ve decompressed from the initial feelings of overwhelm, it’s time to get to work. The only way to truly work through these feelings is to make changes! This doesn’t mean that you need to make every change overnight and it certainly doesn’t mean that you take on the sole responsibility for the fate of the world.

Anxiety can also stem from feeling like you HAVE to be perfect and that you can NEVER make a mistake because if you do then the world will collapse and it will be all your fault. Start making changes in your own life and in your community.

You can also try these:

  • Fly less
  • Eat a plant-based diet
  • Start living a zero-waste lifestyle
  • Practice minimalism
  • Become an activist in your own town
  • Get involved with local government

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टीनएज के ट्रॉमा को समझिए

टीनएज और यंग एज हर व्यक्ति के जीवन के फिजिकल, सायकोलॉजिकल, सोशल, पर्सनल, एकेडमिक और प्रोफेशल जिंदगी में परेशानी का कारण और सुझाव

टीनएज और यंग एज हर व्यक्ति के जीवन का एक संवेदनशील पड़ाव है। यह वो समय है जब जीवन में काफी कुछ बदलाव हो रहा होता है, उस दौरान कई चीजें मैनेज हो जाती है तो कई नहीं हो पाती है। ट्रॉमा परेशानी देने के साथ आपको डरा भी सकता है। साथ यह रोजाना की एक्टिविटी और काम को प्रभावित कर सकता है। 


 

ट्रॉमा कई तरह तरह से हावी हो सकता है, जो फिजिकल, सायकोलॉजिकल, सोशल, पर्सनल, एकेडमिक और प्रोफेशल जिंदगी में परेशानी का कारण बनता है। ऐसी घटनाएं कभी हो सकती हैं। कुछ ऐसे अनुभव भी हैं जो ट्राॅमा का कारण बनते हैं जैसे प्राकृतिक आपदाएं, यौन / शारीरिक / भावनात्मक दुर्व्यवहार या हिंसा जो किसी टीनएजर ने देखी हो। हिंसा, आकस्मिक चोट / बीमारी, किसी प्रिय व्यक्ति की डेथ या अन्य कोई घटना अचानक होती है और अचानक ही ये एक टीनएजर के दिमाग और मन पर असर डालती है। 

 

कुछ घटनाएं टीनएजर्स पर गहरा असर छोड़ती हैं, जो कुछ इस तरह की भावनाओं के रूप में सामने आता है-

 

  • वे अपनी भावनाएं, दुख, गुस्सा और अपराधों का बोध व्यक्त करने में अकेला महसूस करते हैं।
  • नींद न आने की दिक्कत होना
  • ऊर्जा की कमी महसूस रहना
  • पेट में दर्द या सिरदर्द होना
  • चिड़चिड़ापन या गुस्सा करना (दोस्तों, या प्रियजनों से लड़ना)
  • खोया-खोया सा रहना
  • किसी भी काम में रुचि ना लेना या पढ़ाई में मन ना लगना
  • दुविधा में रहना 
  • असहज भावनाओं को रोकने के लिए पदार्थों (सिगरेट,शराब या अन्य नशीले पदार्थ) का उपयोग करना
  • भूख न लगना या बहुत अधिक खाना

 

जीवन में ट्रॉमा का अनुभव काफी इंसान को काफी असहज बना सकता है। ऐसे में दर्द को समझना, उसका पता लगाना और उसे कम करने की कोशिश करना जरूरी है। इसकी भी एक प्रक्रिया है और हो सकता है कि इसमें कुछ वक्त लगे। कुछ सुझाव अपना सकते हैं, जैसे-

  • दोस्तों, परिवार, प्रियजनों या पेशेवर काउंसलर्स से बात करें
  • सकारात्मक मनोरंजन वाली चीजों में हिस्सा लें,  शारीरिक गतिविधियों जैसे व्यायाम, खेल-कूद, घूमना आदि में व्यस्त रहें।
  • जब बुरे विचार मन हावी हों तो संगीत सुनें।
  • प्राकृतिक शौक अपनाएं, जैसे अच्छी किताबें पढ़े, पेंटिग करें, बागवानी में रुचि लें, आउटडोर खेल खेलें, पालतू जानवर के साथ वक्त बिताएं। 
  • खुद को रिलैक्स रखने के लिए प्राणायाम, मेडिटेशन या खुद से बात करें
  • हेल्दी डाइट लें और पर्याप्त आराम करें 
  • यदि संभव हो तो अपने आस-पास सहायता समूह से जुड़ें।
  • जितना संभव हो एक शेड्यूल बनाए और उसी को फॉलो करें
  • भविष्य के लिए योजना बनाएं। ध्यान रखें इसे किसी लक्ष्य बोर्ड पर टांगे। 
  • जरूरत पड़ने पर मदद मांगने ना कतराएं

ट्रॉमा ऐसी चीज नहीं है, जिसे रात भर में निपट सकते हैं। इसके लिए बस खुद को शांत रखने की, साहस बनाए रखने और चीजों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करने की जरूरत है। गहरी सांस लें और जरूरत पड़ने पर किसी से मदद मांगे। इस बात को हमेशा ध्यान रखें कि आप अकेले नहीं हैं। ऐसे कई लोग, स्थान और संगठन हैं जो आपकी परवाह करते हैं और आपके जरिए मांगे गए संसाधनों की पेशकश करना पसंद करेंगे। हीलिंग एक प्रक्रिया है और आप इस यात्रा को पूरा करने में पूरी तरह से सक्षम हैं।

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