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बर्नआउट के बारे में टीन्स को क्या जानना चाहिए

स्ट्रेस और बर्नआउट को अकसर जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वो अलग-अलग हैं। आप सोच रहे होंगे कि तब बर्नआउट क्या है? इसके वॉर्निंग साइन्स क्या होते हैं और ख़ुद को इससे कैसे बचाया जाए? आइए जानते हैं।

स्ट्रेस हमारे शरीर पर बहुत प्रेशर डालता है। कुछ समय के लिए तो इसे मैनेज किया जा सकता है, लेकिन अगर यह बना रहे तो हमारी फ़िज़िकल और इमोशनल हेल्थ के लिए बुरा साबित होता है। जब कोई लम्बे समय तक स्ट्रेस में रहता है तो बर्नआउट का शिकार हो जाता है। बर्नआउट का मतलब है एक ऐसी स्थिति, जिसमें हमारा शरीर, मन और इमोशंस : सभी थककर चूर हो जाएं। टीनएजर्स को बहुत सारा होमवर्क करना होता है, खेलों में एक्टिव होना पड़ता है, वो अपने दोस्तों के साथ समय बिताते हैं, उनके पास पार्ट-टाइम जॉब या दूसरे कमिटमेंट्स होते हैं। उस उम्र में हम सभी अपना रेज़्यूमे तैयार करने के लिए बिज़ी होते हैं, लेकिन आने वाली ज़िंदगी की तैयारी में हम एक ज़रूरी चीज़ भूल जाते हैं। वो है- यह जानना कि कैसे रिलैक्स किया जाए।

बर्नआउट के संकेत
-जब हमारा हर दिन बुरा साबित हो
-घर या काम के बारे में सोचने पर ऐसा लगे कि हम ज़िंदगी में केवल एनर्जी वेस्ट कर रहे हैं
-जब हम पूरे समय थके हुए हों
-जब आपके दिन का अधिकतर समय वो चीज़ें करने में निकल जाए, जिन्हें आप नीरस या बहुत कठिन समझते हैं
-जब आपको ये लगे कि आप जो चाहें कर लें, कुछ बदलने वाला नहीं है, ना ही उसे कोई सराहना मिलेगी

बर्नआउट एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। ये रातोंरात नहीं होता। इसके सिम्पटम्स शुरू में दिखलाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ बदतर होते जाते हैं। इसलिए हमें इसके शुरुआती सिम्पटम्स को ख़तरे के निशान की तरह देखना चाहिए और तुरंत इसके लिए कुछ करना चाहिए। अगर आप एक्टिवली अपने स्ट्रेस को कम कर सके तो आप एक मेजर ब्रेकडाउन से बच जाएंगे। अगर आपने इग्नोर कर दिया तो आप बर्नआउट के शिकार हो सकते हैं।

बर्नआउट के फ़िज़िकल सिम्पटम्स :

-पूरे समय थका हुआ और चुका हुआ महसूस करना
-इम्युनिटी का घटना और लगातार बीमार पड़ना
-सिर में दर्द और मांसपेशियों में दर्द बना रहना
-भूख और नींद की आदतों में बदलावा आना

बर्नआउट के इमोशनल सिम्पटम्स :

-हताशा महसूस करना, ख़ुद पर यक़ीन नहीं रख पाना
-असहायता और घुटन महसूस करना
-डिटैचमेंट का अनुभव होना, अकेलापन लगना
-मोटिवेशन का खो जाना
-नज़रिये का नकारात्मक होते जाना
-जीवन में सेटिस्फ़ेक्शन का कम होते जाना

बर्नआउट के बिहेवियरल सिम्पटम्स : 

-ज़िम्मेदारियों से कतराना
-ख़ुद को दूसरों से अलग कर देना
-चीज़ें करने में ज़्यादा समय लेना
-फ़ूड, ड्रग्स या अल्कोहल की मदद लेना
-दूसरों पर फ्रस्ट्रेशन ज़ाहिर करना
-काम से जी चुराना या देर से आना और जल्दी चले जाना

बर्नआउट के लाइफ़स्टाइल सम्बंधी कारण : 

-हमेशा बिज़ी रहना और सोशियलाइज़िंग और रिलैक्सिंग के लिए समय नहीं निकाल पाना
-क्लोज़ और सपोर्टिव रिलेशनशिप्स का अभाव होना
-ख़ुद पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ ले लेना और दूसरों से मदद ना मिलना
-नींद पूरी नहीं ले पाना

कुछ पर्सनैलिटी ट्रैट्स भी बर्नआउट की वजह बन सकते हैं :

-परफ़ेक्शनिस्ट होना और कभी किसी चीज़ से संतुष्ट नहीं हो पाना
-निराशावादी रवैया होना
-चीज़ें अपने हाथ में रखना, दूसरों को ज़िम्मेदारी नहीं सौंपना
-हाई अचीविंग क़िस्म की पर्सनैलिटी होना

बर्नआउट का सामना कैसे करें : 

मदद लेने से झिझकें नहीं : अपनी क़रीबियों से बात करें और ख़ुद को खोलें। इससे आपके दोस्तों और प्रियजनों को अच्छा ही लगेगा कि आप उन पर ट्रस्ट करके उनसे कुछ शेयर कर रहे हैं। इससे दोस्ती मज़बूत होगी। बर्नआउट के बारे में सोचें नहीं और अपने प्रियजनों के साथ अच्छा समय बिताने की कोशिश करें।

दोस्तों से अधिक मिले-जुलें : वर्चुअल के बजाय रियल लाइफ़ में दोस्तों की तलाश करें। कभी-कभी कुछ इवेंट्स अटेंड करें। लोगों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं और दोस्ती विकसित करें।

निगेटिव लोगों से दूर रहें : निगेटिव-माइंडेड लोगों के साथ रहने से कोई फ़ायदा नहीं। ये केवल शिक़ायतें करते हैं और आपका मूड भी ख़राब करते हैं। अगर आप किसी निगेटिव व्यक्ति के साथ काम करने को मजबूर हैं तो कोशिश करें कि उसके साथ कम से कम समय बिताएं।

नए दोस्त बनाएं : अगर आपको लगता है कि आपके पास ज़िंदगी में ऐसे लोग नहीं हैं, जिनसे आप मदद की उम्मीद रख सकते हैं तो नए दोस्त बनाने और अपने सोशल नेटवर्क को फैलाने के लिए अभी भी देर नहीं हुई है।
 

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सोशल एंग्ज़ायटी का सामना करने के लिए धीमी सांस लें

अगर आप लोगों के बीच घबराहट और बेचैनी अनुभव करते हैं तो यह सोशल एंग्ज़ायटी का लक्षण है
Gousiya Teentalkindia Content Writer

लोगों के बीच आकर्षका केंद्र बनने और नकारात्मक प्रतिक्रिया पाने का डर सोशल फ़ोबिया कहलाता है। सामान्यतया, इसके कारण कोई व्यक्ति किन्हीं परिस्थितियों से कतराने लगता है, जैसे कि जॉब इंटरव्यू, सोशल गेदरिंग्स और दूसरों के सामने लिखने, बोलने या भोजन करने जैसी एक्टिविटीज़। जिन टीन्स को सोशल फ़ोबिया होता है, वो हमेशा कुछ एम्बैरेसिंग कर बैठने के डर में जीते हैं। 


सोशल फ़ोबिया से ग्रस्त व्यक्ति को इन हालात से डर लगता है :
-दूसरों के सामने बोलना
-फ़ैमिली फ़ंक्शंस या पार्टीज़ में जाना
-अजनबियों से बातें करना
-दूसरों के सामने खाना, पीना या मोबाइल यूज़ करना
-पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन या पब्लिक टॉयलेट्स का इस्तेमाल करना
-क़तार में इंतज़ार करना

सोशल फ़ोबिया के फ़िज़िकल लक्षण : 
-शर्माना
-कांपना या थरथराना
-दिल की धड़कनें बढ़ जाना
-पसीने छूटना
-दिमाग़ का ब्लैंक हो जाना
-आवाज़ लड़खड़ाना
-कंसंट्रेशन में दिक़्क़त आना
-टॉयलेट जाने की ज़रूरत महसूस करना
-सांसों की गति बढ़ जाना
-चक्कर आना
-मितली आना
-कहीं भाग जाने की इच्छा होना 

सोशल एंग्ज़ायटी का सामना करने के लिए स्लो ब्रीदिंग की प्रैक्टिस कैसे करें 

जैसे ही आप घबराहट या बेचैनी से भर जाते हैं, आपकी सांसों की गति अपने आप बढ़ जाती है। ऐसे में अगर आप सांसों की गति पर नियंत्रण करना सीख जाएं तो ना केवल घबराहट से बच सकेंगे, बल्कि अपने दिमाग़ को भी फ़ोकस्ड रख पाएंगे।

1. अपनी सांसों को एक मिनट तक गिनिए (एक सांस भीतर और एक बाहर को एक गिनें)

2. फिर किसी घड़ी के सामने आराम से बैठ जाइए या दूसरे हाथ में घड़ी ले लीजिए और अपने माइंड को सांसों पर फ़ोकस कीजिए

3. केवल नाक से सांस लें

4. छाती के बजाय पेट से सांस लें और अपने पेट को जितना हो सके, रिलैक्स छोड़ दीजिए

5. अब तीन सेकंड के लिए सांस अंदर और तीन सेकंड के लिए बाहर करें। हर बार सांस छोड़ें तो ख़ुद से रिलैक्स होने को कहें और अपनी मसल्स को तनावमुक्त कर दीजिए- आपके कंधों को गिर जाने दीजिए, चेहरे को ढीला छोड़ दीजिए

6. इस 6 सेकंड की साइकिल में पांच मिनट तक सांसें लेते रहें

7. अंत में फिर से एक मिनट के लिए सांसें गिनिए और इसे लिख डालिए

8. सामान्यतया एक व्यक्ति हर मिनट 10 से 12 सांसें लेता है। सोशल फ़ोबिया से ग्रस्त लोगों की सांस लेने की गति इससे निरंतर तेज़ रहती है। कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो केवल घबराहट महसूस करने पर तेज़ सांसें लेने लगते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में धीमी सांसें लेना फ़ायदेमंद हो सकता है।

9. शुरू में तो आपको रिलैक्स होने पर ही प्रैक्टिस करना होगा, बाद में आप तनाव में होने पर भी इसकी प्रैक्टिस कर सकते हैं। हर नई स्किल की तरह, स्लो ब्रीदिंग में भी समय और रेगुलर प्रैक्टिस की ज़रूरत होती है। दिन में कम से कम चार बार इसकी प्रैक्टिस करनी चाहिए।

कोशिश कीजिए और हमसे रिज़ल्ट्स शेयर कीजिए। अगर आपको कोई और फ़ोबिया हो तो हमारे एक्सपर्ट्स से शेयर कीजिए, वो ख़ुशी-ख़ुशी आपकी मदद करेंगे। आप expert@teentalkindia.com पर एक्सपर्ट से चैट कर सकते हैं या ईमेल लिख सकते हैं।

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