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एंगर मैनेजमेंट के पांच तरीक़े

क्या आपको बहुत जल्दी ग़ुस्सा आ जाता है और क्यों? क्या कभी आपको ऐसा भी लगता है कि आप सुबह उठते से ही ग़ुस्से में होते हैं?

इस तरह की सिचुएशंस पर हमारा रिस्पॉन्स ही तय करता है कि हम कौन हैं और दूसरे हमें कैसे देखते हैं। हमारे ग़ुस्से की बहुत सारी वजहें हो सकती हैं। कई बार तो इसका कारण हमारे शरीर में आ रहे बदलाव भी होते हैं। हम सब जानते हैं कि हॉर्मोन्स के कारण मूड स्विंग्स और कंफ़्यूज़्ड इमोशंस हो सकते हैं। या शायद हमें स्ट्रेस के कारण ग़ुस्सा आ सकता है। जो लोग बहुत प्रेशर में आते हैं, उन्हें जल्दी ग़ुस्सा आता है। या शायद यह आपकी शख़्सियत का एक पहलू भी हो सकता है कि हो सकता है आप भावुक क़िस्म के व्यक्ति हों और अपनी भावनाओं को इम्पलसिव तरीक़े से व्यक्त करते हों, या आप आसानी से टेम्पर लूज़ कर देते हों। एक और कारण यह भी हो सकता है कि ज़िंदगी में किन लोगों को हम रोल मॉडल मानते हैं। शायद आपने अपने परिवार में दूसरे लोगों को ग़ुस्से में तमतमाते हुए देखा हो।

जो भी वजह हो, एक बात तो तय है- आपको ग़ुस्सा बहुत आता है। सभी को आता है और इसलिए इसमें बुरा महसूस करने जैसा कुछ नहीं है। लेकिन महत्व इस बात का है कि हम अपने एंगर को कैसे मैनेज करते हैं। इसके पांच तरीक़े हैं। हर स्टेप में आपको ख़ुद से कुछ सवाल करने होंगे और फिर अपने जवाबों को चुनना होगा।

इस उदाहरण को लें : आप अपने दोस्तों के साथ बाहर जा रहे हैं कि तभी आपकी मॉम ने आपको अपना रूम साफ़ करने या घर पर ही रहने को बोल दिया। और अब आपको बहुत ग़ुस्सा आ गया है।

1) प्रॉब्लम को आइडेंटिफ़ाई कीजिए : पता लगाएं कि आपको ग़ुस्सा किस बात पर आया है और क्यों। इसे शब्दों में कहें या लिखें कि आप इस बात से अपसेट हो गए हैं।

ख़ुद से पूछें : मैं ग़ुस्से में क्यों हूं? आप इसे अपने मन में भी कर सकते हैं या ज़ोर से बोलकर भी। लेकिन जवाब को स्पष्ट और साफ़ रखें।

2) जवाब देने से पहले सम्भावित समाधानों के बारे में सोचें : यही वो जगह है, जहां आप एक मिनट रुककर अपने ग़ुस्से को मैनेज करने के लिए ख़ुद को समय देते हैं। और यहीं पर आप इस बारे में सोचते हैं कि रिएक्ट कैसे किया जाए- लेकिन रिएक्ट किए बिना।

ख़ुद से पूछें : मैं क्या कर सकता हूं? कम से कम तीन बातों के बारे में सोचें। उदाहरण के लिए, इस स्थिति में आप सोच सकते हैं कि :

(ए) मैं मॉम पर चिल्ला सकता हूं और अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर कर सकता हूं।

(बी) मैं अपना रूम साफ़ करने के बाद कह सकता हूं कि क्या अब मैं बाहर जाऊं।

(सी) मैं बिना बताए चुपचाप बाहर जा सकता हूं।

3) हर सॉल्यूशन के नतीजे के बारे में सोचें : यहां आप इस बारे में सोचते हैं कि अगर आप इन सभी सिचुएशंस पर अलग-अलग रिएक्ट करते हैं तो क्या हो सकता है।

ख़ुद से पूछें : हर ऑप्शन का क्या नतीजा होगा? उदाहरण के लिए :

(ए) मां पर चिल्लाने से समस्याएं और बढ़ेंगी, यह भी हो सकता है कि आपको घर में बंद कर दिया जाए।

(बी) रूम साफ़ करने में समय लगता है और आप लेट हो सकते हैं। लेकिन रूम साफ़ करने के बाद दोस्तों के साथ बाहर जाने पर फिर आपको उसके बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं होगी।

(सी) बिना बताए चुपचाप बाहर चला जाना प्रैक्टिकल नहीं होगी। वैसे भी यह सम्भव नहीं है कि आप कई घंटों तक बाहर रहें और किसी को पता ही ना चले। फिर जब आप पकड़े जाएंगे तो क्या होगा, इस बारे में तो बात ही ना करें।

4) एक फ़ैसला लें : आपको तीनों में से किसी एक विकल्प को चुनने का फ़ैसला लेना ही होता है। अच्छे से सोचें और जो फ़ैसला आपको सबसे असरदार लगता है, उसी को चुनें।

ख़ुद से पूछें : मेरे लिए सबसे अच्छी चॉइस क्या होगी? लेकिन जब तक आप इस बारे में अच्छे से सोचेंगे, तब तक मां पर चिल्लाने का समय जा चुका होगा और बिना बताए बाहर जाना बहुत रिस्की होगा। तो ए और सी अच्छे ऑप्शंस नहीं कहे जा सके। बी ही सबसे अच्छी चॉइस मानी जा सकती है। 

एक बार फ़ैसला कर लेने के बाद उस पर काम करना शुरू करना होगा।

5) अपनी प्रोग्रेस जांचें : सिचुएशन ओवर होने के बाद भी कुछ समय बैठकर सोचें कि जो हुआ वो कैसा रहा।

ख़ुद से पूछें : आपने यह कैसे किया? क्या वही हुआ, जो सोचा था? अगर नहीं तो क्यों नहीं? क्या मैं अपने फ़ैसले से संतुष्ट हूं? सिचुएशन पूरी होने के बाद चीज़ों पर एक बार सोचना ज़रूरी होता है। इससे आप अपने बारे में जानेंगे और यह भी समझेंगे अलग-अलग सिचुएशंस में कौन-सी प्रॉब्लम-सॉल्विंग एप्रोच आपके लिए सबसे अच्छी है।

अगर आपके द्वारा लिया गया फ़ैसला आपके लिए अच्छा साबित होता है तो स्वयं की पीठ थपथपाइए। और अगर नहीं होता है तो ऊपर की पांचों स्टेप्स को पढ़िए और पता लगाने की कोशिश कीजिए कि यह क्यों नहीं हुआ।

जब आप शांत हों तब इस बारे में कुछ कहना बहुत सरल होता है, लेकिन जब आप ग़ुस्से में हों तब यह मुश्किल है। इसलिए इसकी प्रैक्टिस लगातार करते रहें। 
 

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भरपूर नींद लेना

रिसर्चर बताते हैं कि एक टीनएजर को हर दिन आठ से दस घंटे की नींद लेना चाहिए, यानी बच्चों और एडल्ट्स से भी ज़्यादा। लेकिन आयरनी की बात है कि टीन्स अपनी इसको लेकर लापरवाही बरतते हैं और भरपूर नींद नहीं लेते
Gousiya Teentalkindia Content Writer

बहतेरे टीनएजर्स जितना ज़रूरी है, उतनी देर सोते नहीं हैं। इसके सामान्यतया दो कारण होते हैं, या तो उनके शेड्यूल ओवरलोडेड होते हैं, या वे इंटरनेट पर ज़रूरत से ज़्यादा समय बिताते हैं, कभी-कभी तो पूरी रात। जो भी वजह हो, अगर आप नींद पूरी नहीं लेते हैं तो इससे आप स्लीप डेफ़िसिट के शिकार हो सकते हैं और आपको कंसंट्रेशन, पढ़ाई या दूसरी फ़िज़िकल एक्टिविटीज़ में दिक़्क़तें आ सकती हैं। स्लीप डेफ़िसिट से डिप्रेशन भी हो सकता है।

तो रातों को भरपूर नींद लेने के लिए क्या करें? हमारे टीनटॉक एक्सपर्ट की तरफ़ से इस बारे में आपके लिए ये कुछ टिप्स :

अपना शेड्यूल तय करें : हर रात एक तय समय पर सोने जाएं और हर सुबह तय समय पर उठें। इस शेड्यूल के साथ छेड़खानी करने पर आप इनसोमनिया के शिकार हो सकते हैं। अगर मुमकिन हो सके तो रात में काम करना अवॉइड करें। साथ ही आल्टरनेट शेड्यूल्स या इस जैसी चीज़ों से भी बचें, जो आपकी नींद पर असर डाल सकती हैं।

कैफ़ीन, निकोटिन और अल्कोहल से बचें : सोने के कम से कम आठ घंटे पहले तक स्मोकिंग करने या कैफ़ीन लेने से बचें। कॉफ़ी, चॉकलेट, सॉफ़्ट ड्रिंक्स आदि में कैफ़ीन पाया जाता है। साथ ही सोने से पहले हलका भोजन ही करें।

सोने से पहले रिलैक्स हो जाएं : गर्म पानी से नहाना, कुछ पढ़ना या ऐसा ही कोई दूसरा रिलैक्सिंग रूटीन आपको नींद में आग़ोश में ले जाने में मददगार होगा।

बेड में लेटे ना रहें : अगर आप सो नहीं पा रहे हैं तो बेड में लेटे ना रहें। इसके बजाय कुछ करें, जैसे पढ़ना या टीवी देखना, या म्यूज़िक सुनना, जब तक कि आप थककर सो ना जाएं।

अपने बेडरूम के एटमॉस्फ़ीयर को कंट्रोल करें : जैसे कि कम्फ़र्टेबल बेडिंग का इस्तेमाल करें, शोर कम से कम रखें, टेम्प्रेचर को कम्फ़र्टेबल रखें, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रहें।

इनके अलावा रोज़ 15 से 20 मिनट का समय किसी फ़िज़िकल एक्सरसाइज़ के लिए निकालें, ऐसा खाना खाएं जो नींद की क्वालिटी को बढ़ाए, जैसे पाइनएप्पल, डार्क चॉकलेट्स आदि। यह वैसे इतना आसान नहीं है, क्योंकि इनसोमनिया का ट्रीटमेंट करने का मतलब है अपनी स्लीप हाइजीन को इम्प्रूव करना और ऐसे आदतें विकसित करना, जो अच्छी नींद के अनुकूल हैं। लेकिन यह नामुमकिन नहीं है, क्योंकि बहुतरे स्लीप डिसऑर्डर्स को प्रभावी रूप से ट्रीट किया जा सकता है। 
 

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