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सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर

अपने अंदर महसूस हो रही नकारात्मकता को विंटर ब्लूज़ का नाम देकर अनदेखा न करें। अगर इसे सही समय पर ट्रीट न किया गया तो यह गंभीर समस्या हो सकती है….

9वी क्लास में पढ़ने वाली अनन्या पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। वह अपने असाइन्मेंट और स्टडीज़ को लेकर भी बहुत पाबंद थी। वह हमेशा अपनी क्लास के टॉप फाइव स्टूडेंट्स में होती थी। उसका एनर्जी लेवल हमेशा हाई रहता और वह स्पोर्ट्स में भी एक्टिवली पार्टिसिपेट करती थी।

अक्टूबर के महीने से अचानक उसका पढ़ाई का स्तर लगातार नीचे गिरना शुरु हो गया था। वह क्लास में कॉन्सन्ट्रेट नहीं कर पा रही थी और स्कूल से घर आने के बाद भी, वह सिर्फ सोना चाहती थी। उसके पेरेंट्स सोच रहे थे कि, यह सिर्फ दोस्तों का बुरा प्रभाव और आलस के कारण हो रहा है। वे उसे डांटते रहते थे। जनवरी में हुए टेस्ट में उसे बहुत कम नंबर मिले। इसके बाद, धीरे-धीरे वह अपने नॉर्मल स्टडी रूटिन पर वापस आ गई और फिर से सोशलाइज होने लगी। उसने फाइनल एग्जाम में भी अच्छे नंबर हासिल किए। उसके पैरेंट्स को लगा कि यह एक फेज़ था और अब यह खत्म हो गया अब उसने फिर से अच्छे से पढ़ाई करना शुरु कर दिया। सबकुछ अच्छा चल रहा था। मगर फिर से वही चीज अगले साल भी उसी समय हुई, जो पिछले साल हुई थी, पैरेंट्स ने उसे डॉक्टर को दिखाया, जहां डॉक्टर ने सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर डायग्नोस किया।

सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर क्या है?

सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर (SAD) एक तरह का डिप्रेशन है, जो कि हर साल एक ही समय पर शुरु और खत्म होता है। एक व्यक्ति में एसएडी के लक्षण तब दिखाई देंगे जब सर्दियां आएंगी और यह तब तक रहेंगे जब तक ठंड का मौसम खत्म नहीं होता है। लक्षण मौसम के हिसाब से ही कम से तीव्र हो सकते हैं, मगर जब गर्मी का मौसम आने वाला होता है और दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती है, तब एसएडी के मरीज को लक्षणों में राहत महसूस होने लगती है और थकान भी कम होने लगती है।

एसएडी के लक्षण : डिप्रेशन में लक्षण कम या ज्यादा हो सकते हैं। एसएडी से पीड़ित व्यक्ति को ये लक्षण महसूस हो सकते हैं।

जिन कामों को करना पहले अच्छा लगता था, उन एक्टिविटी को करने में भी अब रुचि न होना।

  • पूरे दिन थकान महसूस होना।
  • हमेशा एनर्जी लेवल लो रहना।
  • ठीक से न सो पाना फिर भी बिस्तर में पड़े रहने की इच्छा होना।
  • ध्यान और एकाग्रता की कमी होना।
  • खराब, निराशाजनक और गिल्टी महसूस करना।
  • ख़ुद को नुकसान पहुंचाने या फिर आत्महत्या के विचार दिमाग में आना।
  • अधिक कार्बोहाइड्रेट वाले खाने की लत लगना।
  • सोशलाइजेशन की कमी, लोगों से मिलना-जुलना कम होना।

एसएडी का कारण : कई रिसर्च के बाद एक्सपर्ट्स ने पाया कि, एसएडी का मुख्य कारण ब्रेन में केमिकल का असंतुलन होना है। दो केमिकल सेरोटोनिन और मेलाटोनिन हमारे मूड, नींद, भूख और एनर्जी लेवल को रेग्युलेट करते हैं। सर्दियों में, जब दिन छोटे और रातें लंबी होती हैं, इसके कारण हमारे ब्रेन में मेलाटोनिन का लेवल बढ़ने लगता है और सेरोटोनिन का लेवल कम होने लगता है, जो डिप्रेशन का कारण बनता है। मेलाटोनिन नींद के लिए जिम्मेदार है, जब रातें लंबी होती हैं, तो मेलाटोनिन का निर्माण ब्रेन में अधिक होने लगता है,
इसके कारण व्यक्ति को थकान महसूस होती है और दिनभर नकारात्मक विचार दिमाग में आते हैं। इस समय उसका किसी भी काम को करने में मन नहीं लगता है। वैसे ही, सेरोटोनिन तब बढ़ने लगता है, जब व्यक्ति धूप के संपर्क में आता है। इसलिए सर्दियों में सेरोटोनिन का लेवल कम होने और मेलाटोनिन का लेवल हाई होता है, जो एसएडी को जन्म देता है।

एसएडी का उपचार : थकान महसूस होना, आलस आना, स्लीप पैटर्न में बदलाव या भूख में बदलाव ये सभी मेंटल हेल्थ डिसॉर्डर के लक्षण हो सकते हैं। सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर को एक योग्य साइकेट्रिस्ट से डायग्नोस करवाना बहुत ज़रूरी है। अगर लक्षण सामान्य हैं, तो डॉक्टर एंटी-डिप्रेसेंट्स दवाइयां प्रिस्क्राइब नहीं करते हैँ और सिर्फ थैरेपी सेशन की सलाह देते हैँ और धूप में ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताने के लिए कहते हैं। मगर लक्षण गंभीर हों तो दवाइयों के साथ- साथ लाइट थैरेपी की भी आवश्यकता होती है।

एसएडी के लक्षण में आलस आना, कॉन्सन्ट्रेशन की कमी, कमजोरी आदि के लक्षण होते हैं। लोग कन्फ्यूज भी होती हैं। यहां तक कि पैरेंट्स सोचते हैं कि बच्चा अपना बेस्ट देने की कोशिश नहीं कर रहा है और वे लगातार बच्चे को डांटते रहते हैं। अगर आपको लगता है कि, आपके अंदर ये लक्षण महसूस हो रहे हैं या फिर आपके किसी फ्रेंड या फैमिली मेंबर में ये लक्षण नज़र आ रहे हैँ, तो उन्हें किसी प्रोफेशनल साइकेट्रिस्ट की मदद लेने के लिए कहें।

यह डिप्रेशन हो या फिर सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर या कोई अन्य मेंटल हेल्थ डिसॉर्डर हो इन सभी का इलाज किया जा सकता हैँ। बस आपको इतना करना है कि आपको इसके बारे में उस व्यक्ति से ख़ुलकर बात करनी होगी, जो आपको लगता है कि आपकी मदद करेगा।

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Diva Teentalkindia Content Writer

लव, रोमांस, फ्रेंडशिप और लाइफस्टाइल के आइडिया के लिए प्रसिद्ध, बॉलीवुड की ज्यादातर भारतीयों की ज़िंदगी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लगभग हर भारतीय को अपनी पसंदीदा बॉलीवुड फिल्म के मुख्य किरदार में एक सा हीरोइज्म महसूस होने के साथ, हम अक्सर यह भूल जाते है कि जैसी भावनाएं हम अपनी निजी ज़िंदगी में महसूस करते हैँ, उन भावनाओं को ये किरदार भी पर्दे पर महसूस करते नज़र आते हैं। हम डर का सामना करते हैं, हम गुस्से का सामना करते हैँ, हम ख़ुद को असहाय महसूस करते हैं, हम तनाव का सामना करते हैँ और हम दुख का सामना करते हैँ। हम अपनी इन भावनाओं को काबू में करके अपनी ज़िंदगी के हीरो ख़ुद बन सकते हैँ और यह कैसे कर सकते हैँ यह हमारी पसंदीदा बॉलीवुड फिल्मों से सीख सकते हैँ। बॉलीवुड फिल्मों के प्रसिद्ध ऑनस्क्रीन कैरेक्टर के इन 6 मैकेनिज्म की मदद से अपने अंदर की नकारात्मकता और भावनाओं को काबू में करने में मदद मिलेगी।

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