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कैसे अपनी आवश्यकता के हिसाब से सही बोर्ड और सिलेबस का चुनाव करें

बच्चे की आवश्यकता और काबिलीयत के हिसाब से सही बोर्ड का सलेक्शन करना ज़रूरी है। इससे बच्चे को कॅरियर बनाने में लंबे समय तक मदद मिलेगी।
Kshitija SawantTeentalkindia Counsellor

16 साल का टीनएजर राहुल जिसने हाल ही में 10वी ग्रेड के एग्जाम दिए हैं और गर्मियों क ब्रेक में वह अपना पसंदीदा स्पोर्ट्स खेल रहा था। फुटबॉल उसका पसंदीदा खेल है, मगर वह लॉन टेनिस खेलना और स्वीमिंग करना भी पसंद करता है। 

लगभग दो महीने के बाद समय बदलता है और अगला फेज़ रिजल्ट का आता है। राहुल को अपनी मार्क शीट देखकर आश्चर्य होता है कि उसने एग्जाम में बहुत अच्छा परफॉर्म नहीं किया। स्कोर कार्ड र्दुभाग्य से यही दिखा रहा था। राहुल सिर्फ पास होने लायक नंबर ही जुटा सका। उसने ख़ुद से कहा है कि, वह कम से कम किसी विषय में फेल नहीं हुआ। हालांकि राहुल के जो मार्क्स आए हैं उसे देखकर भी उसके पेरेंट्स उसके परफॉर्मेंस को लेकर डरे हुए नहीं हैं, फिर भी राहुल के पापा ने उसके भविष्य की चिंता करना शुरु कर दिया है, क्योंकि उन्होंने अपने बेटे को अंडरग्रेजुएट डिग्री को पूरा करने के लिए विदेश भेजने का निर्णय दिया है। तब उसके परिवार ने रियलिटी चैक करने के लिए कॅरियर गाइडेंस लेने का फैसला किया।

कॅरियर गाइडेंस सेशन : राहुल के पापा ने इस बारे में बात की कि वह सक्सेसफुली गारमेंट्स बिजनेस चला रहे हैं और वे उम्मीद कर रहे थे है कि उनका बेटा एक दिन इस बिजनेस को संभाल लेगा। वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा होकर एक ऑन्त्रप्रेन्योर बने। उन्होंने राहुल के एजुकेशन पर काफी पैसा खर्च किया और सुनिश्चित किया कि उनका बेटा शहर के सबसे अच्छे इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ें। राहुल ने कैंपस में उपलब्ध सभी स्पोर्ट्स संबंधी सुविधाओं का उपयोग किया। हालांकि अकेडमिक को लेकर उसने ऐसा महसूस नहीं किया। उसी समय सिलेबस उसे बहुत अजीब लग रहा था, मगर वह अपने पापा को दुखी नहीं करना चाहता था और उसने चुपचाप सब कुछ स्वीकार कर लिया।

राहुल से वन-टू-वन डिस्क्शन में कॅरियर काउंसलर ने राहुल के सपनों और उसकी महत्वाकांक्षाओं के बारे में जाना। वास्तव में वह स्पोर्ट्स में कॅरियर बनाना चाहता था और विदेश में पढ़ने या रहने की उसकी कोई चाह नहीं थी।

सोसायटी की वास्तविकता को दिमाग में रखते हुए राहुल ने तय किया कि, वह एकाउंट्स /  कॉमर्स ( स्टेट बोर्ड लेवल ) की पढ़ाई करेगा और ज़रूरी नॉलेज तथा स्किल्स सीखेगा, इसके साथ-साथ स्पोर्ट्स भी जारी रखेगा।

ऐसा करने से कठिनाई का लेवल कम हो रहा था और राहुल के लिए इसे मैनेज करना भी आसान था। दूसरा विकल्प यह था कि वह स्पोर्ट्स को अंडरग्रेजुएट लेवल पर मैनेज करे और उसके हिसाब से चीजों को आगे ले जाए।

राहुल की अपने पापा के गारमेंट्स बिजनेस को संभालने की चाह नहीं थी, भले ही वह पापा के बिजनेस से मिली लर्निंग को मूल्यवान समझता था।

काउंसलिंग के इस सेशन का निष्कर्ष यह निकला कि राहुल 11वी और 12वी क्लास की पढ़ाई के लिए स्टेट बोर्ड में स्विच करेगा और उसके बाद कॉमर्स या स्पोर्ट्स मैनेजमेंट जो वह आगे चाहे उसमें बैचलर डिग्री की पढ़ाई करेगा।

इससे ये सीखा : किसी टीन्स के लिए सही बोर्ड और सिलेबस का चुनाव करने में इससे मदद मिलती है। यह टीन्स में क्या क्षमता है और क्या उनका वैल्यू सिस्टम है उसके साथ न्याय करता है। न कि फ्रेंड्स और फैमिली के सर्कल में फिट होने की कोशिश करना है।

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