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How I rose from “dark” to light

Here is a proud and talented brown girl who found her lost confidence with the help of her family. Read the story of Tanvi, who despite of facing criticism and suffering low self-esteem, broke the shackles of society and became a confident and strong girl in her skin.

As a child Tanvi had a different childhood as she had a Muslim father and Jain mother. However, she was unaffected by this, which is why, when she was five and one of her friend’s mother asked her about whom does she loves the most, Tanvi’s reply was ‘Myself’. But as she progressed towards teenage, she started to see things differently. She was, now, questioning her physical looks and self-worth more often. While she was still trying to figure this out, an incident shook her.

It happened in 9th grade, when she was getting ready for a party with her friends. Excited and happy, they were all trying different outfits and looks. Suddenly one of her friends said that ‘everything about Tanvi was perfect, except for her skin tone!’ Yes, she was a dark skinned girl, or not fair enough, as they say.

Tanvi was hurt as this mere sentence broke her heart badly. This killed her confidence and Tanvi became conscious of her skin colour. She started refraining from anything that would bring her to limelight as she thought she wasn’t good enough. Not only this, but she even avoided any social interactions and stayed away from people whom she thought would hurt her.

Her mother, who after watching Tanvi see fairness cream ads told her that she doesn’t need to be of a particular skin colour to be successful, tried to rebuild her confidence. She recommended Tanvi to join martial arts, hence diverting all her negative energy into physical energy. Tanvi practised everyday and each day gave her the opportunity to express herself as something more than just a dark skinned girl. Gradually her focus shifted toward this and she became capable of fighting back and re-established her confidence.

Her friends and family also helped her emotionally. They believed in her and showed their confidence in her. This made Tanvi grow even strong and confident. She couldn’t thank enough for having such co-operative and understanding people around her.

Finally, Tanvi made peace with herself and her skin colour. Today, she is an inspiring fashion blogger and a black belt Martial arts expert who has been winning tournaments internationally since a very young age. 

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स्किन कलर से सामना

हर्ष भागवत बता रहे हैं कि आज के समय में डार्क कॉम्पलेक्शन यानी सांवला रंग होने से लोगों को क्या-क्या परेशानी झेलनी पड़ती है।

मैं अपनी एक दोस्त के साथ शॉर्ट वेकेशन पर गोकर्ण गया था। हमने वहां बारिश की उम्मीद से प्लान बनाया था लेकिन तेज़ धूप ने सबकुछ बिगाड़ दिया। मेरी दोस्त तैयार हुई और रूम से निकलने से पहले उसने सनस्क्रीन लोशन लगाया और मुझसे भी पूछा।

मैंने ज्यादा नहीं सोचा और कह दिया,‘नहीं शुक्रिया’। जाहिर तौर पर मैं बेवक़ूफ़ी कर रहा था। तेज़ धूप का कॉन्टैक्ट स्किन कैंसर के चांस को और बढ़ा सकता है। इसलिए मैंने अपने मित्र का सुझाव माना क्योँकि मैं अच्छे से जनता था कि मुझे सन टैनिंग का खतरा था, दूसरे शब्दों में डार्क स्किन  का।

डार्क कॉम्प्लेक्शन। इससे मैं अपने बचपन से भागता आया हूं, लेकिन मैं आज यह स्वीकार करता हु कि डार्क स्किन में कोई बुराई नहीं है। मुझे भी अपने आसपास मौजूद कई लोगों की तरह यही सिखाया गया कि साफ़ रंग होना ज्यादा अच्छा है। इसलिए आज पेरेंट्स बच्चों को बाहर खेलने से रोकते हैं, देर तक नहलाते रहते है, सिर्फ इसलिए  कि हमारे मन में फेयर स्किन के प्रति लगाव बढ़ सके।

यह बहु्त चौंकाने वाला है कि सभी ने स्किन कलर पर आधारित डिस्क्रिमिनेशन के विषय में आंखों पर पट्टी बांध ली है। इससे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि हम इसे स्वीकार कर शांति से रहते हैं। बिना किसी लॉजिक के जिस तरह हम आंखें बंद कर बैठे हैं यह वाकई में डरावना है।

एक 20 वर्षीय लड़के के रूप में, मैं यह कहता हूं कि अभी तक पारम्परिक दबाव से बचते हुए एक एक्सेप्टेबल ब्यूटी कोशेंट को बनाए रखने में कामयाब हुआ, सामान्य भाषा में गोरा रहने में। टीनेज में मेरे अंकल कई बार मेरी डार्क नेक और एलबो स्किन को देखकर कह्त थे कि मुझे नहाते वक़्त अपने शरीर को किस तरह रगड़ना चाहिए।

मैं यह इमेजिन भी नहीं कर सकता कि यंग गर्ल्स और महिलाओं पर फेयर स्किन के लिए किस तरह का प्रेशर रह्ता होगा, ताकि वे ‘शादी मार्केट’ में अपनी एक अलग ही पहचान बना पाएं।

मूवीज़ और विज्ञापनों ने इस सोच को अपने प्रोडक्ट्स बेचने के लिए बेहद भयानक ढंग से इस्तेमाल किया है। और हम इन प्रोडक्ट्स को बार-बार खरीदते हैं और चूंकि हम यह बचपन से कर रहे होते हैं, तो इनके चक्र से बाहर निकलना बहु्त मुश्किल हो जाता है।

इस स्किन कलर की धारणा के साथ एक घटना मुझे याद है। मैं एक साउथ इंडियन फॅमिली से हूं, और मेरी परवरिश उस वातावरण में हुई जहां फेयर कलर को अधिक महत्त्व दिया जाता था। मुझे याद है मैं हमेशा अपने गेहुंए रंग के कारण हमेशा चिंता में रह्ता था, सोचता था कि शायद मेरे इस रंग के कारण ही लड़किया मुझसे दूर रह्ती हैं। स्कूल में मैं उस ग्रुप का हिस्सा था जिसने एक क्लासमेट का फेयर एंड लवली क्रीम स्कूल लाने पर मज़ाक बनाया था क्यूंकि उस दिन उसे स्टेज पर डांस करना था।

मैं समस्या का एक हिस्सा भी था और विक्टिम भी।

बाद में जब ग्रेजुएशन के लिए मैं अपने होम टाउन से बाहर निकला तो मुझे अपने स्किन टोन के बारे में कोई बा्त सुनाई नहीं दी। क्यूंकि इसके अलावा भी कई अन्य चीज़ें थीं जिनके बारे में मुझे सोचना था - कॉलेज असाइनमेंट, सस्ता मूवी शो खोजना आदि। इन सबके बीच मेरा स्किन कलर कहीं पीछे छूट गया और इसका कोई फर्क भी नहीं पड़ा। जब मैं छुट्टियों में अपने घर पहुंचा, मिरर में ख़ुद को देखा और सोचने लगा कि क्या स्किन टोन के लिए वाकई में मुझे बुरा फील करना चाहिए?

मैंने नहीं किया, मेरी त्वचा का रंग और भी अधिक टैन होने पर भी मुझे कोई दुख नहीं हुआ। मेरा रंग और गहरा हो गया था लेकिन यह रंग मेरे ख़ुद के प्रति नज़रिए में कोई बदलाव नहीं ला पाया। यह रंग भेद बचपन के उन राक्षसों में से एक था जिसे मैं कई सालो से इग्नोर कर रहा था और फिर आखिरकार मैंने उसे जी्त ही लिया।

कुछ समय पहले मई में पररवार सहित छुट्टियों पर मुंबई गया था। वहां लंम्बे अरसे बाद मैंने कुछ सुना। आंटी एक कजिन को डांट रही थीं,‘दिन भर धूप में खेलने के कारण इनका रंग टार की सड़क की तरह हो गया है।’

मैं यूं तो किसी बात में इंटरफेयर नहीं करता, लेकिन पता नहीं मुझे उस दिन क्या हुआ और मैंने आंटी की बात बीच में ही काट दी। साथ ही मैंने अपनी कजिन का ध्यान भी इस ओर दिलाकर कहा, ‘डार्क स्किन होना ठीक है। इसमें कुछ गलत नहीं है। तुम खेलना मत छोड़ो, कुछ नहीं होगा।’

मेरी आंटी का इस बात पर क्या रिएक्शन था और कजिन के चेहरे पर क्या भाव थे यह तो मुझे नहीं पता, लेकिन इतना ज़रूर याद है कि मेरे अंदर ख़ुशी के बुलबुले उठ रहे थे। अपनी 13 वर्षीय कजिन को वही करने के लिए कहा जो सही था। वह अभी भी बाहर धूप में खेल रही है जब मैं यह सब लिख रहा हूं।

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