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खुद को पाने के लिए डांस करें

नताशा अग्रवाल बचपन में यौन शोषण का शिकार हुईं। उस वक्त उन्हें इस हादसे को लेकर चुप रहने के लिए कहा गया। उन्होंने खुद को खुश रखने के लिए डांस सीखा, इसके जरिए वो ये महसूस कर पाती थीं कि उनका शरीर कोई सैक्शुअल ऑब्जेक्ट नहीं है।

नताशा अग्रवाल थ्री लेफ्ट फीट नाम का एक संस्थान चलाती हैं जिसमें डांस मूवमेंट थेरेपी (DMT, डीएमटी) प्रोग्राम चलाती हैं।  इसके जरिए वो टीनएजर्स और अन्य लोगों को किसी भी तरह के सदमे से उबरने में मदद करती हैं।
नताशा अग्रवाल बचपन में यौन शोषण का शिकार हुईं। उस वक्त उन्हें इस हादसे को लेकर चुप रहने के लिए कहा गया। उनसे कहा गया कि इसे लेकर बात ना करें। एक नॉर्मल जिंदगी बिताने की कोशिश करें। लेकिन नताशा के लिए नॉर्मल रहना आसान नहीं था। उनके लिए ये ऐसा था, जैसे वो अपने शरीर के साथ गलत कर रही हैं। उन्हें लगने लगा कि उनका शरीर उनका नहीं है। लेकिन जब डांस करती थीं तो उन्हें अपने शरीर से और खुद प्यार होने लगता था। नताशा बताती हैं, 'खुद को खुद से जोड़ने के लिए मैं ज्यादा से ज्यादा वक्त डांस को देने लगी। डांस करना मेरे लिए एक थेरेपी की तरह हो गया।' नताशा ने डांस मूवमेंट थेरेपी  (DMT) की खोज की। उन्होंने खुद को खुश रखने के लिए डांस सीखा, इसके जरिए वो ये महसूस कर पाती थीं कि उनका शरीर कोई सैक्शुअल ऑब्जेक्ट नहीं है।


34 साल की नताशा के मुताबिक, 'इस थेरेपी के जरिए मेरे सामने दुनिया के दरवाजे खुल गए। मैं भावनात्मक रूप से काफी हल्का महसूस करने लगी। डांस की भाषा ने मुझे दोबारा सांस लेना सिखाया।' हमारा शरीर और दिमाग एक दूसरे से जुड़ा होता है और एक दूसरे के मुताबिक ही काम करते हैं। DMT इसी बेसिक प्रिंसिपल का इस्तेमाल करता है। इसके जरिए हमारा दिमाग और भी बेहतर तरीके से काम करने लगता है और एक खुशनुमा माहौल बना देता है।
आगे नताशा बताती हैं- DMT का मतलब म्यूजिक में अपने शरीर को उसके हिसाब से डांस करने देना। इसी में किसी भी तरह का परफेक्शन या किसी खास तरह के डांस फॉर्म में माहिर होने की आवश्यक्ता नहीं है और ना ही किसी भी तरह की डांस क्लास ज्वाइन करने की जरूरत है। बस म्यूजिक लगाइए और डांस करिए।
नताशा ने इसी के साथ थ्री फूट डांस क्लास नाम से अपने सेंटर की शुरुआत की। ये एक ऐसी जगह है जहां डांस को एक थेरेपी की तरह किया जाता है। इसके जरिए लोग खुद को रिलेक्स करते हैं और सुकून पाते हैं। क्लास की शुरुआत वॉर्म-अप सेशन से होती है, जिसमें उन्हें ये एहसास दिलाया जाता है कि वो ये बेहद आराम से कर सकते हैं। वहीं डांस करने का स्टाइल इस पर निर्भर करता है कि पार्टीसिपेंट्स डांस आखिर कर क्यों रहे हैं। जैसे वो 2 ग्रुप बनाती हैं जिसमें से एक ग्रुप में वो लोग होते हैं जो खुद से खुद को जोड़ना चाहते हैं। इस ग्रुप के लिए वो एक दुपट्टे का इस्तेमाल एक नदी की तरह करती हैं। जिसे पकड़ कर पूरे ग्रुप को इस तरह से डांस करना होता है जैसे वो इसके जरिए एक दूसरे से जुड़ रहे हैं। वहीं दूसरे ग्रुप में वो उन बच्चों को रखती हैं, जो यौन शोषण का शिकार हुए हैं। उन्हें इस दर्द से बाहर निकालने के लिए नताशा 'से नो' थेरेपी का इस्तेमाल करती हैं।
यहां जानिए कि ये कैसे काम करता है:
• कल्पना करें कि आपकी उंगलियां सभी दिशाओं में रंग उगल सकती हैं। अपनी उंगलियों की शक्ति का उपयोग करके, अपने चारों ओर एक रंगीन बुलबुला बनाएं।
• यह आपकी ढाल है, आपकी आभा (Aura) है।
• जब आप चारों ओर घूमते हैं और विभिन्न लोगों से मिलते हैं, तो आप पर निर्भर करता है कि आप उन्हें अपने संसार में आने की अनुमति दें या नहीं।  
• अगर आपको लगता है कि आप किसी से बात नहीं करना चाहते हैं, तो अपना हाथ बाहर निकालें, इसका मतलब है कि आपने उस शख्स को अपने संसार में आने की अनुमति नहीं दी है।
• यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि बुलबुला आपका सुरक्षित स्थान है और इस पर आपका नियंत्रण है।
नताशा कहती हैं- 'मैंने ना कहने की शक्ति का एहसास किया है और ये लाजवाब है। मैंने इसे कई बार आजमाया है और ये मुझे काफी पसंद है।' अब नताशा इसी तरह के सेशन का आयोजन सीनियर सिटीजन्स, दिव्यांग लोगों के लिए, सेक्स वर्कर्स के बच्चों के लिए और टीनएज बच्चों के लिए भी करने लगीं हैं। DMT के इस सफर के दौरान उन्होंने कई लोगों की मदद की है। इनमें से एक हैं किएशा, जो ऑल इंडिया रेडियो में काम करती हैं। किएशा बताती हैं- 'पहली बार मैं नताशा से उनके घर पर मिली। ये मुलाकात DMT सेशन को लेकर थी। मुझे उनके जोशीले स्वभाव ने काफी अच्छा महसूस कराया।'  

 

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हरीश अय्यर के दर्द ने ही उन्हें जीने का मकसद दिया

बचपन में हुए यौन शोषण की परछाई हरीश अय्यर ने अपने भविष्य पर नहीं पड़ने दी। ये कहानी है एक गे लड़के की जिसने समाज से लड़कर अपनी जगह बनाई।

इस लड़ाई की शुरुआत उस वक्त हुई जब हरीश अय्यर 7 साल के थे खत्म तब हुआ जब 18 साल के साथ। शुरुआत लड़के से हुई और खत्म आदमी पर हुई। शुरुआत दर्द से हुई और खत्म हिम्मत पर हुई।
एक परंपरागत भारतीय घर में बच्चे को किसी बड़े के जरिए नहलाना आम बात होती है। हरीश की मां को भी ये बात आम ही लगती थी लेकिन नहाने के दौरान ही पहली बार हरीश को यौन शोषण का सामना करना पड़ा। हरीश बताते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि उनके साथ क्या हो रहा है। ये समझना उनके लिए बेहद मुश्किल था कि जो हो रहा है वो सही है या नहीं। हरीश ने खुद को यह कहते हुए समझाया कि शायद ये आम है और यहीं से उनकी जिंदगी बदल गई।

यौन शोषण अब रोज की बात हो गई थी। हालात ऐसे हो गए थे कि वो जब भी वो अपने चाचा के घर जाते थे तो सीधा उनके बिस्तर पर लेट जाया करते थे और उन चीजों के खत्म होने का इंतजार किया करते थे।
जब हरीश 12 के हुए तो कई अन्य लोगों ने भी उनके साथ यही सब किया। उन्हें अब इन सबकी आदत हो गई थी। हरीश कहते हैं - मैं चुप रहा क्योंकि मेरे पास उन्हें मना करने का साहस नहीं था।
हरीश कहते हैं :-

  • वो बिना किसी आत्मविश्वास के बड़े हुए
  • वो एक डरे हुए इंसान के तौर पर बड़े हुए
  • वो हर रोज दिन में 4 बार नहाते हुए बड़े हुए

वो आज भी दिन में 4 बार नहाते हैं हालांकि अब ये उसकी मजबूरी नहीं आदत बन गई है। उनकी एक और आदत थी, एक साथ दो दुनिया का हिस्सा बने रहना, जिसमें से एक में वो शारीरिक शोषण का शिकार हुआ तो दूसरी तरफ एक आम जिंदगी जी रहा है। एक बार जब उसकी ये दोनों दुनिया आपस में टकराईं तो वो कई घंटों तक रोते रहे। इसके बाद उसने तय किया कि अब वो चुप नहीं बैठेंगे।


हरीश के मुताबिक- मेरे गुप्तांग से खून निकल रहा था, उसने ये बात अपनी मां को बताई। मां ने कहा शायद ये ज्यादा आम खाने की वजह से हुआ है। यही बात उसने अपने दोस्त को भी बताई, दोस्त ने कहा ये सब आम बात है। हरीश ने मां से कहा चाचा मुझे इधर-उधर हाथ लगाते हैं। मां ने जवाब दिया कि अब तुम उनके पास मत जाना।
कहीं से भी मदद नहीं मिली इसलिए उसने सभी से बात करना बंद कर दिया। वह केवल अपने पालतू कुत्ते से बात करते थे। बगीचे में बैठकर फूल, पत्तियों और मक्खियों से बात करते थे। हरीश याद करते हुए बताते हैं कि हिंदी सिनेमा ने भी उनकी काफी मदद की हैं। श्रीदेवी की फिल्म चालबाज और लम्हे ने उन्हें काफी हिम्मत दी।

उन्होंने अपने चाचा के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया। वो दिन बहुत जल्द आ गया जब हरीश ने साहस किया और चाचा को वो सब करने से रोका। चाचा को हैरानी हुई लेकिन वो समझ गए कि अब ये सब नहीं हो पाएगा। उन्होंने वहां से जाना ही ठीक समझा। इसके बाद हरीश ने अपने ही तरह के बच्चों की मदद करने का फैसला किया।

आज हरीश 38 साल के हो गए हैं। एक इक्वल राइट्स एक्टीविस्ट्स के रूप में काम कर रहे हैं। वो कहते हैं "हम (लड़कों) के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, लेकिन हमें इसके खिलाफ आवाज़ उठाने का अधिकार नहीं है क्योंकि हम यानी मर्दों को रक्षक समझा जाता है पीड़ित नहीं। मेरी जिंदगी की सच्चाई ये है कि मैं एक गे हूं लेकिन इसका कारण है मेरा अतीत है। मेरे साथ बचपन में जो कुछ हुआ उसकी वजह से आज मैं गे हूं।

दुर्भाग्यवश, उस वक्त अगर बाल यौन शोषण का शिकार कोई लड़का होता है तो इसके खिलाफ कोई कानून नहीं था। इसलिए, मुझे न्याय नहीं मिला। हालांकि हरीश का मानना है कि मैं उन 11 वर्षों को कभी वापस नहीं पा सकता, लेकिन मेरे पास बच्चों, महिलाओं या एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने के लिए पूरा जीवन है।

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