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निष्ठा ने किस तरह दर्द को मात दी

कुछ योद्धा ऐसे भी होते हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन वे दुनिया के सामने आने वाले अन्य योद्धाओं की तुलना में किसी भी तरह से कम बहादुर नहीं होते। निष्ठा पाठक भी ऐसी ही एक योद्धा हैं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी प्रताड़ना झेली, जो एक वक्त पर बेहद निराश हो गई थीं और फिब्रोमियाल्गिया जैसी बीमारी से भी पीड़ित हो गई थीं।
Richa Dubey Content Writer

कुछ योद्धा ऐसे भी होते हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन वे दुनिया के सामने आने वाले अन्य योद्धाओं की तुलना में किसी भी तरह से कम बहादुर नहीं होते। निष्ठा पाठक भी ऐसी ही एक योद्धा हैं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी प्रताड़ना झेली, जो एक वक्त पर बेहद निराश हो गई थीं और फिब्रोमियाल्गिया जैसी बीमारी से भी पीड़ित हो गई थीं। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उस हराते हुए खुद को साबित कर दिया।

निष्ठा उस वक्त चौथी क्लास में थी, जब पहली बार पड़ोसी के बेटे ने उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया था, जो कि उससे दोगुनी उम्र का था। उस बारे में याद करते हुए वो कहती है, 'मैं समझ नहीं सकती थी कि क्या चल रहा है, लेकिन कहीं ना कहीं दिल की गहराइयों में मुझे महसूस होता था कि कुछ ना कुछ गलत है।' आठवीं क्लास में आने तक उसके साथ दुर्व्यवहार होता रहा, इस दौरान उम्र के अलग-अलग पड़ावों में सात अलग-अलग लोगों ने उसका शोषण किया।

जब उसे इस बात का अहसास हुआ कि ये सामान्य बात ना होकर चिंता का विषय है तो उसने ऐसे लोगों से दूरी बनाना शुरू कर दी और उन्हें भी जब इस बात का अहसास हो गया कि वो समझ चुकी है कि ये सब क्या है, तो उन्होंने भी अपनी गंदी हरकतें बंद कर दीं। हालांकि अब उसके साथ यौन दुर्व्यवहार नहीं हो रहा था, लेकिन उसके सामने एक नई चुनौती आ खड़ी हुई थी।

ये वही दौर था, जब उसने अवसाद से बाहर आने के लिए दवाएं (एंटी डिप्रेसेंट्स) लेना शुरू कर दिया। क्योंकि वो इतनी भी बड़ी नहीं थी कि इस बात को समझ सके कि उसके साथ क्या हो रहा था। नौ साल पहले उसे 'फिब्रोमियाल्गिया' बीमारी होने के बारे में पता चला। ये एक ऐसी स्थिति है, जिसमें सालों पहले हुए भयानक शारीरिक और मानसिक शोषण की वजह से पूरे शरीर में दर्द होता है। इस बारे में पूछने पर निष्ठा बताती है, 'तकलीफ शब्द फिब्रोमियाल्गिया के दर्द को बयान करने के काफी छोटा है, लेकिन कोई अन्य शब्द भी इसमें होने वाले दर्द का वर्णन नहीं कर सकता है।'

'जब मैं लोगों से कहती हूं कि सबकुछ दर्द करता है, तो मेरा मतलब होता है कि मेरे शरीर का एक भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहां दर्द ना हो रहा हो। मुझे नहीं पता कि सुबह बिना दर्द के उठना कैसा रहता है। लगातार सिहरन, झुनझुनी, तेज दर्द, धकधकी, चाकू और सुई जैसी चुभन, खराश, जलन और डर लगना जैसी तकलीफें मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं। ये बिल्कुल अवर्णनीय है, जो मेरी आखिरी सांस के साथ ही खत्म होगी। ये आपके पूरे शरीर और आपके दिमाग और भावनाओं को प्रभावित करता है'।

निष्ठा तब 16 साल थी जब उसे इस बीमारी का पता चला था और डॉक्टर ने भी उसे बता दिया कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। जिसके बाद उसने एक साल के लिए स्कूल से छुट्टी लेकर इस बात को समझने की कोशिश की कि उसकी इस हालत की जिम्मेदार उसकी मेडिकल स्थिति है। धीरे-धीरे करके उसने हिम्मत जुटाते हुए खुद को इस बात का अहसास कराया कि अपनी भलाई के लिए उसे बेहद सकारात्मक तरीके से इसका मुकाबला करना ही होगा।

इस पूरी प्रक्रिया ने उसे कम दर्द वाले दिनों की तारीफ करना और बुरे दिनों में अपनी सीमा से आगे बढ़ना सिखाया। शुरू में वो दूसरों के साथ अपनी तुलना करती थी और फिर दुखी होती थी। लेकिन वक्त के साथ उसने समझा कि उसकी प्रतियोगिता खुद से है, और हर दिन उसे खुद को हराना है।

वर्तमान में निष्ठा की रोज की दिनचर्या में कोचिंग जाना, जिम जाना, पढ़ाई करना और मौज-मस्ती करना शामिल है और ये सब वो फिब्रोमियाल्गिया से जूझते हुए कर रही है। वो शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह से खुद का बेहद अच्छे से ध्यान रखती है। उसका कहना है कि दर्द होना नहीं रूका है और वो अब भी वैसा ही है जैसा वो नौ साल पहले था। लेकिन अब उसने उससे लड़ने की हिम्मत और इच्छाशक्ति जुटा ली है।

निष्ठा का कहना है, 'इन सब की वजह से जिंदगी के एक दौर में मैं खुद को कसूरवार और शर्मिंदा महसूस करती थी। लेकिन अब मैं जैसी भी हूं उसके लिए मैंने शर्मिंदा होना छोड़ दिया। मैं एक योद्धा हूं और ये मेरे लिए बिल्कुल भी दुखी होने वाली बात नहीं है। अपने खुद के नायक बनें और किसी अन्य की आदत बनें।'

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अपनी स्ट्रेंथ, अपनी वीकनेस पहचानिए। सबसे पहले यह जानिए कि आपको क्या पसंद है और क्या नापसंद।

अपनी स्ट्रेंथ, अपनी वीकनेस पहचानिए। सबसे पहले यह जानिए कि आपको क्या पसंद है और क्या नापसंद। आपकी लाइफ में कौन-सी चीज की कितनी इंपोर्टेंस है, यह भी ऑब्जर्व करना बहुत जरूरी है। अपने आप को दूसरे से बेहतर आप खुद ही समझ सकते हैं।
Gousiya Content Writer

जब हम दुखी हों, परेशान हों या किसी ने हमारा मजाक बनाया हो तो इस सिचुएशन से कैसे बचना है, यह भी हमें पता होना चाहिए। नहीं तो हम डिप्रेशन में आ सकते हैं। इस बार निष्ठा जुनेजा से जानिए कि कैसे इस तरह की परेशानी में हमें कंट्रोल करना है-

अपनी स्ट्रेंथ, अपनी वीकनेस पहचानिए। सबसे पहले यह जानिए कि आपको क्या पसंद है और क्या नापसंद। आपकी लाइफ में कौन-सी चीज की कितनी इंपोर्टेंस है, यह भी ऑब्जर्व करना बहुत जरूरी है। अपने आप को दूसरे से बेहतर आप खुद ही समझ सकते हैं।

आपको जो करना है उसे करने की ठान लीजिए। भले ही ऐसा करने पर आपके दोस्त आपका मजाक उड़ाएं, उनकी बातों पर ध्यान न दें। शुरू में मुश्किल हो सकती है, लेकिन यदि आप लंबे समय तक फॉलो करते हैं तो इसके रिजल्ट से आप खुद भी सरप्राइज हो जाएंगे।

दूसरों के एप्रूवल से पहले खुद से प्यार करना सीखना महत्वपूर्ण है। अपने अाप पर भरोसा करना होगा। कुछ समय के बाद आपके साथी और दूसरे लोग भी आप पर विश्वास करने लगेंगे।

जो आपको नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं, ऐसे लोगों से एप्रूवल लेने की बजाय, जैसी आइडियल लाइफस्टाइल की आप कल्पना करते हैं, उसे पूरा करने की कोशिश करें। अपने लिए ईमानदार रहें, पॉजीटिव लोगों से मिलें, नए ईवेंट्स और एक्टिविटीज में भाग लें। इस तरह निगेटिविटी काे खत्म कर पॉजीटिव सोच को अपनाएं।

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