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हरीश अय्यर के दर्द ने ही उन्हें जीने का मकसद दिया

बचपन में हुए यौन शोषण की परछाई हरीश अय्यर ने अपने भविष्य पर नहीं पड़ने दी। ये कहानी है एक गे लड़के की जिसने समाज से लड़कर अपनी जगह बनाई।
Richa Dubey Content Writer

इस लड़ाई की शुरुआत उस वक्त हुई जब हरीश अय्यर 7 साल के थे खत्म तब हुआ जब 18 साल के साथ। शुरुआत लड़के से हुई और खत्म आदमी पर हुई। शुरुआत दर्द से हुई और खत्म हिम्मत पर हुई।
एक परंपरागत भारतीय घर में बच्चे को किसी बड़े के जरिए नहलाना आम बात होती है। हरीश की मां को भी ये बात आम ही लगती थी लेकिन नहाने के दौरान ही पहली बार हरीश को यौन शोषण का सामना करना पड़ा। हरीश बताते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि उनके साथ क्या हो रहा है। ये समझना उनके लिए बेहद मुश्किल था कि जो हो रहा है वो सही है या नहीं। हरीश ने खुद को यह कहते हुए समझाया कि शायद ये आम है और यहीं से उनकी जिंदगी बदल गई।

यौन शोषण अब रोज की बात हो गई थी। हालात ऐसे हो गए थे कि वो जब भी वो अपने चाचा के घर जाते थे तो सीधा उनके बिस्तर पर लेट जाया करते थे और उन चीजों के खत्म होने का इंतजार किया करते थे।
जब हरीश 12 के हुए तो कई अन्य लोगों ने भी उनके साथ यही सब किया। उन्हें अब इन सबकी आदत हो गई थी। हरीश कहते हैं - मैं चुप रहा क्योंकि मेरे पास उन्हें मना करने का साहस नहीं था।
हरीश कहते हैं :-

  • वो बिना किसी आत्मविश्वास के बड़े हुए
  • वो एक डरे हुए इंसान के तौर पर बड़े हुए
  • वो हर रोज दिन में 4 बार नहाते हुए बड़े हुए

वो आज भी दिन में 4 बार नहाते हैं हालांकि अब ये उसकी मजबूरी नहीं आदत बन गई है। उनकी एक और आदत थी, एक साथ दो दुनिया का हिस्सा बने रहना, जिसमें से एक में वो शारीरिक शोषण का शिकार हुआ तो दूसरी तरफ एक आम जिंदगी जी रहा है। एक बार जब उसकी ये दोनों दुनिया आपस में टकराईं तो वो कई घंटों तक रोते रहे। इसके बाद उसने तय किया कि अब वो चुप नहीं बैठेंगे।


हरीश के मुताबिक- मेरे गुप्तांग से खून निकल रहा था, उसने ये बात अपनी मां को बताई। मां ने कहा शायद ये ज्यादा आम खाने की वजह से हुआ है। यही बात उसने अपने दोस्त को भी बताई, दोस्त ने कहा ये सब आम बात है। हरीश ने मां से कहा चाचा मुझे इधर-उधर हाथ लगाते हैं। मां ने जवाब दिया कि अब तुम उनके पास मत जाना।
कहीं से भी मदद नहीं मिली इसलिए उसने सभी से बात करना बंद कर दिया। वह केवल अपने पालतू कुत्ते से बात करते थे। बगीचे में बैठकर फूल, पत्तियों और मक्खियों से बात करते थे। हरीश याद करते हुए बताते हैं कि हिंदी सिनेमा ने भी उनकी काफी मदद की हैं। श्रीदेवी की फिल्म चालबाज और लम्हे ने उन्हें काफी हिम्मत दी।

उन्होंने अपने चाचा के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया। वो दिन बहुत जल्द आ गया जब हरीश ने साहस किया और चाचा को वो सब करने से रोका। चाचा को हैरानी हुई लेकिन वो समझ गए कि अब ये सब नहीं हो पाएगा। उन्होंने वहां से जाना ही ठीक समझा। इसके बाद हरीश ने अपने ही तरह के बच्चों की मदद करने का फैसला किया।

आज हरीश 38 साल के हो गए हैं। एक इक्वल राइट्स एक्टीविस्ट्स के रूप में काम कर रहे हैं। वो कहते हैं "हम (लड़कों) के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, लेकिन हमें इसके खिलाफ आवाज़ उठाने का अधिकार नहीं है क्योंकि हम यानी मर्दों को रक्षक समझा जाता है पीड़ित नहीं। मेरी जिंदगी की सच्चाई ये है कि मैं एक गे हूं लेकिन इसका कारण है मेरा अतीत है। मेरे साथ बचपन में जो कुछ हुआ उसकी वजह से आज मैं गे हूं।

दुर्भाग्यवश, उस वक्त अगर बाल यौन शोषण का शिकार कोई लड़का होता है तो इसके खिलाफ कोई कानून नहीं था। इसलिए, मुझे न्याय नहीं मिला। हालांकि हरीश का मानना है कि मैं उन 11 वर्षों को कभी वापस नहीं पा सकता, लेकिन मेरे पास बच्चों, महिलाओं या एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने के लिए पूरा जीवन है।

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निष्ठा ने किस तरह दर्द को मात दी

कुछ योद्धा ऐसे भी होते हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन वे दुनिया के सामने आने वाले अन्य योद्धाओं की तुलना में किसी भी तरह से कम बहादुर नहीं होते। निष्ठा पाठक भी ऐसी ही एक योद्धा हैं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी प्रताड़ना झेली, जो एक वक्त पर बेहद निराश हो गई थीं और फिब्रोमियाल्गिया जैसी बीमारी से भी पीड़ित हो गई थीं।
Richa DubeyContent Writer

कुछ योद्धा ऐसे भी होते हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन वे दुनिया के सामने आने वाले अन्य योद्धाओं की तुलना में किसी भी तरह से कम बहादुर नहीं होते। निष्ठा पाठक भी ऐसी ही एक योद्धा हैं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी प्रताड़ना झेली, जो एक वक्त पर बेहद निराश हो गई थीं और फिब्रोमियाल्गिया जैसी बीमारी से भी पीड़ित हो गई थीं। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उस हराते हुए खुद को साबित कर दिया।

निष्ठा उस वक्त चौथी क्लास में थी, जब पहली बार पड़ोसी के बेटे ने उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया था, जो कि उससे दोगुनी उम्र का था। उस बारे में याद करते हुए वो कहती है, 'मैं समझ नहीं सकती थी कि क्या चल रहा है, लेकिन कहीं ना कहीं दिल की गहराइयों में मुझे महसूस होता था कि कुछ ना कुछ गलत है।' आठवीं क्लास में आने तक उसके साथ दुर्व्यवहार होता रहा, इस दौरान उम्र के अलग-अलग पड़ावों में सात अलग-अलग लोगों ने उसका शोषण किया।

जब उसे इस बात का अहसास हुआ कि ये सामान्य बात ना होकर चिंता का विषय है तो उसने ऐसे लोगों से दूरी बनाना शुरू कर दी और उन्हें भी जब इस बात का अहसास हो गया कि वो समझ चुकी है कि ये सब क्या है, तो उन्होंने भी अपनी गंदी हरकतें बंद कर दीं। हालांकि अब उसके साथ यौन दुर्व्यवहार नहीं हो रहा था, लेकिन उसके सामने एक नई चुनौती आ खड़ी हुई थी।

ये वही दौर था, जब उसने अवसाद से बाहर आने के लिए दवाएं (एंटी डिप्रेसेंट्स) लेना शुरू कर दिया। क्योंकि वो इतनी भी बड़ी नहीं थी कि इस बात को समझ सके कि उसके साथ क्या हो रहा था। नौ साल पहले उसे 'फिब्रोमियाल्गिया' बीमारी होने के बारे में पता चला। ये एक ऐसी स्थिति है, जिसमें सालों पहले हुए भयानक शारीरिक और मानसिक शोषण की वजह से पूरे शरीर में दर्द होता है। इस बारे में पूछने पर निष्ठा बताती है, 'तकलीफ शब्द फिब्रोमियाल्गिया के दर्द को बयान करने के काफी छोटा है, लेकिन कोई अन्य शब्द भी इसमें होने वाले दर्द का वर्णन नहीं कर सकता है।'

'जब मैं लोगों से कहती हूं कि सबकुछ दर्द करता है, तो मेरा मतलब होता है कि मेरे शरीर का एक भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहां दर्द ना हो रहा हो। मुझे नहीं पता कि सुबह बिना दर्द के उठना कैसा रहता है। लगातार सिहरन, झुनझुनी, तेज दर्द, धकधकी, चाकू और सुई जैसी चुभन, खराश, जलन और डर लगना जैसी तकलीफें मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं। ये बिल्कुल अवर्णनीय है, जो मेरी आखिरी सांस के साथ ही खत्म होगी। ये आपके पूरे शरीर और आपके दिमाग और भावनाओं को प्रभावित करता है'।

निष्ठा तब 16 साल थी जब उसे इस बीमारी का पता चला था और डॉक्टर ने भी उसे बता दिया कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। जिसके बाद उसने एक साल के लिए स्कूल से छुट्टी लेकर इस बात को समझने की कोशिश की कि उसकी इस हालत की जिम्मेदार उसकी मेडिकल स्थिति है। धीरे-धीरे करके उसने हिम्मत जुटाते हुए खुद को इस बात का अहसास कराया कि अपनी भलाई के लिए उसे बेहद सकारात्मक तरीके से इसका मुकाबला करना ही होगा।

इस पूरी प्रक्रिया ने उसे कम दर्द वाले दिनों की तारीफ करना और बुरे दिनों में अपनी सीमा से आगे बढ़ना सिखाया। शुरू में वो दूसरों के साथ अपनी तुलना करती थी और फिर दुखी होती थी। लेकिन वक्त के साथ उसने समझा कि उसकी प्रतियोगिता खुद से है, और हर दिन उसे खुद को हराना है।

वर्तमान में निष्ठा की रोज की दिनचर्या में कोचिंग जाना, जिम जाना, पढ़ाई करना और मौज-मस्ती करना शामिल है और ये सब वो फिब्रोमियाल्गिया से जूझते हुए कर रही है। वो शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह से खुद का बेहद अच्छे से ध्यान रखती है। उसका कहना है कि दर्द होना नहीं रूका है और वो अब भी वैसा ही है जैसा वो नौ साल पहले था। लेकिन अब उसने उससे लड़ने की हिम्मत और इच्छाशक्ति जुटा ली है।

निष्ठा का कहना है, 'इन सब की वजह से जिंदगी के एक दौर में मैं खुद को कसूरवार और शर्मिंदा महसूस करती थी। लेकिन अब मैं जैसी भी हूं उसके लिए मैंने शर्मिंदा होना छोड़ दिया। मैं एक योद्धा हूं और ये मेरे लिए बिल्कुल भी दुखी होने वाली बात नहीं है। अपने खुद के नायक बनें और किसी अन्य की आदत बनें।'

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