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सेल्फ़-कॉन्शियसनेस से ऐसे निपटें

सेल्फ़-कॉन्शियसनेस एक बड़ा फ़ैक्टर हो सकता है और सेल्फ़-कॉन्फ़िडेंस में रुकावट का कारण भी बन सकता है।

शुरुआत के लिए, पहले यह समझते हैं कि सेल्फ़-कॉन्शियसनेस क्या है और उसके बाद यह समझने की कोशिश करेंगे कि यह किस तरह सोशल सिचुएशन में हमारी परफ़ॉर्मेंस को अफेक्ट करती है और हम इस नॉलेज और समझ के साथ अपनी मदद करने के लिए क्या कर सकते हैं। इसका परिणाम, आशाजनक रूप से बेहतर सेल्फ़-कॉन्फ़िडेंस होगा। 

सेल्फ़-कॉन्शियसनेस क्या है?

अपने आपको इस सिचुएशन में इमेज़िन कीजिए : आप कई लोगों के बीच है और किसी ने आपको टार्गेट किया है, वो आपसे कोई भद्दा और कठिन प्रश्न भी पूछ सकता है और अचानक आप अपने बारे में अवेयर फ़ील करना शुरू कर देते हैं। आप ख़ुद पर, अपने रियेक्शन पर और इस समय कितना नर्वस फ़ील कर रहे हैं, इस पर फ़ोकस करना शुरू कर देते हैं। यह है सेल्फ़-कॉन्शियसनेस- अपने आप पर फ़ोकस करना। आपको एड्रेनलिन दौड़ता-भागता महसूस हो सकता है, पसीना या हाथ-पैर में कंपन या फ़ोकस की कमी भी महसूस हो सकती है। सेल्फ़-कॉन्शियसनेस आपको किसी भी टास्क पर फ़ोकस करने और सेल्फ़-कॉन्फ़िडेंट होने से रोकता है।

सेल्फ़-कॉन्शियसनेस कैसे आपके कॉन्फ़िडेंस को अफ़ेक्ट करती है?
जब आप सेल्फ़-कॉन्शियस फ़ील करना शुरू कर देते हैं तब आपका एंग्जायटी का स्तर बढ़ने लगता है। आपकी चिंता आपकी बॉडी लैंग्वेज में स्पष्ट दिखाई देने लगती है, जो कि दूसरों को यह बताता है कि आप कॉन्फ़िडेंट नहीं हैं। जो कि बदले में आपके प्रति उनके व्यवहार को प्रभावित करेगा और यह आपको पहले से ज़्यादा अन्कम्फ़र्टेबल फ़ील करवाएगा। जब भी आप रिलैक्स होते हैं तो आप ज़्यादा कॉन्फ़िडेंट और कंट्रोल में दिखाई देते हैं और यह भी कि आपका दिमाग़ सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में सोचने के लिए फ्री हैं।

सेल्फ़-कॉन्शियसनेस को रोकने के लिए आप क्या कर सकते हैं‌?
इस पर बात करना आसान है कि अपनी मदद करने के लिए आपको क्या चाहिए लेकिन जब आप किसी स्ट्रेसफ़ुल सिचुएशन में होते हैं आपकी बॉडी सेकेंड से भी कम समय में रियेक्ट करती है और आपका दिमाग़ और डर हावी हो जाता है क्योंकि आप वह सब भूल जाते हैं जो भी प्लान किया था। आपको अपने डर का सामना करना होगा और उससे पार भी पाना होगा। सबसे मुख्य बात यह है कि आप किस तरह अपने आप को उस इवेंट के लिए तैयार करते हैं और किस तरह रिलैक्स करते हैं।
जब आप इस तरह की सिचुएशन के लिए तैयारी करते हैं, आपको हमेशा यह याद रखना चाहिए कि नर्वस होना या डरना पूरी तरह से ओके है। कई लोग इस तरह फ़ील करते हैं। सबसे ज़रूरी चीज़ यह पहचानना है कि ये डर और फ़ीलिंग्स वहीं रहेंगे, लेकिन ये आपको तब तक फ़ोर्स नहीं करेंगे तब तक आप नहीं चाहेंगे। इन्हें आप पर एक फ़ोर्स बनने और आपके एक्शंस को मैनिपुलेट करने की सहमति देने के बजाय आप ये फ़ैक्ट्स एक्सेप्ट करके और इससे निपटने की मेथड्स पर फ़ोकस करके अपने डर से निपटने के प्रति सबसे बड़ी स्टेप होगी और आप सेल्फ़-कॉन्शियसनेस को हरा पाएंगे।
यदि आप ख़ुद को शांत और रिलैक्स कर सकते हैं तो आप स्वयं पर नियंत्रण महसूस करेंगे और यह आपका कॉन्फ़िडेंस बढ़ाएगा। यदि आप यह पाते हैं कि आप ख़ुद पर फ़ोकस कर रहे हैं तो फिर जानबूझकर किसी और चीज़ पर फ़ोकस करने की कोशिश कीजिए। यह भी नोटिस कीजिए कि दूसरा व्यक्ति किस तरह बात कर रहा है या एक सेकंड के लिए अपना ख़ुद पर से ध्यान डायवर्ट करने के लिए कोई चीज़ ढूंढ लें और फिर रिलैक्स करने की कोशिश करें।
इस तरह के सोशल चैलेंजेस के लिए ख़ुद को तैयार करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है कि आप शांति से अपने मन में ही उन इवेंट्स की प्रैक्टिस करके ख़ुद को वैसी स्थिति के लिए तैयार करने की कोशिश करें ताकि जब भी आप तनाव या डर की किसी सिचुएशन में हों तो आपका माइंड और बॉडी पॉज़ीटिव तरीक़े से बिहेव करे। आप किस तरह अपने दिमाग़ को अलग तरह से एक्ट करने के लिए तैयार कर सकते हैं यह सीखने का सबसे अच्छा तरीक़ा है सेल्फ़-हिपनोसिस। यह वाकई में आपकी मदद कर सकता है!
 

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5 संकेत जो यह बताते हैं कि आपको सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स हो सकता है

शायद आपको यह पता न हो, लेकिन आप जिस तरह से ख़ुद को देखते हैं वह दूसरों के प्रति आपके व्यवहार को प्रभावित करता है।
Gousiya Teentalkindia Content Writer

जब कोई व्यक्ति दूसरे से सुपीरियर बिहेव करता है, उस व्यक्ति की यह सुपीरियर बिहेव करने की फ़ीलिंग का अर्थ यह होता है कि दूसरे उसे इस प्रकार से ट्रीट करें। किसी तरह, वे जानते हैं कि दूसरे लोग जान जाएंगे कि वे वास्तव में ‘इनएडीक्वेट' हैं और इसलिए वे ऐसा बिहेव करते हैं जिससे उन्हें यह अहसास होता रहे कि वे बाक़ी लोगों से श्रेष्ठ हैं। यह आदत 5 से 12 की उम्र में विकसित हो सकती है। डेवलपमेंट की इस स्टेज पर, बच्चा एक्सेप्टेंस और वेलिडेशन प्राप्त करने की कोशिश करता है।


हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां लगातार कॉम्पीटिशन चलता रहता है। अक्सर इसके कारण फ्रस्ट्रेशन, डिप्रेशन और ग़ुस्सा आ जाता है। यह हमें एक ऐसी स्थिति में छोड़ देता है कि हम फिर सोसायटी द्वारा निर्धारित की गई छवि के आधार पर ख़ुद को रिप्रज़ेंट करने लगते हैं। सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स वाले व्यक्ति की विशेषताएं:
वे अक्सर वेलिडेशन चाहते हैं : ऐसे लोगों के लिए, उनकी सेल्फ़-वर्थ बाहर के लोग तय करते हैं। वे लोग अच्छा और वर्थी तभी फ़ील करेंगे जब दूसरे उन्हें उस तरह से देखेंगे। 

दूसरों से तुलना करते रहते हैं: चूंकि उनकी सेल्फ़-वर्थ दूसरे लोगों पर आधारित होती है, इसलिए जिस भी व्यक्ति को सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स होता है उसे आसपास के लोगों से ख़ुद को कम्पेयर करने की आदत होती है।

वे आत्म-केंद्रित होते हैं : वे दूसरों की उपलब्धियों को अपने प्रयासों के द्वारा नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।

उनमें हमदर्दी की कमी होती है : दूसरों का दर्द और परेशानियों को समझने के लिए एक निश्चित स्तर की शांति और कम्पोजिशन जीवन में चाहिए होता है। ये लोग कोल्ड हार्ट रह जाते हैं।  

वे एंग्ज़ायटी फ़ेस करते हैं : इस तरह के लोग अक्सर कई चीज़ों से एंग्ज़ायटी डेवलप कर लेते हैं। उनके वास्तविक चरित्र और उनके द्वारा बनाई गई इमेज के बीच हमेशा खींचतान चलती रहती है। और हमेशा उनके लिए दो पर्सनैलिटी से जूझना मुश्किल होता है।

ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति को सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स है तो वह बुरा व्यक्ति है और इन फ़ीलिंग्स से पार पाना असम्भव है। बस ज़रूरत है कि वे ख़ुद को देखें और अपने आप में पॉज़ीटिव बदलाव लेकर आएं। तो, आप इससे कैसे बाहर आ सकते हैं?
जिस भी व्यक्ति से आप मिलें, उसमें कम से कम एक अच्छाई ढूंढने और उसकी सराहना करने की कोशिश कीजिए।
हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए दूसरों को उनके अनुसार चीज़ें फ़िगर आउट करने देने से ही वे सीखते और ग्रो करते हैं।  
किसी भी चीज़ को क्रिटिसाइज़ करने से पहले, उनसे कुछ प्रश्न पूछें जो व्यक्ति को अपनी ग़लती स्वयं पहचानने में मदद कर पाएं।
याद रखिए कि आप अपने आसपास के लोगों को कैसा फ़ील करवाते हैं। यदि आप सिर्फ़ उन्हें क्रिटिसाइज़ करते हैं, तो आपके ऊपर मीन होने का ठप्पा लग जाएगा और आपके फीडबैक को नेगेटिव कहकर डिसमिस कर दिया जाएगा।
सामान्यत:, सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स से गुज़र रहे व्यक्ति को सायकियाट्रिक मदद की आवश्यकता तब तक नहीं होती जब तक वह कॉम्प्लेक्स उनकी पर्सनैलिटी पर हावी नहीं हो जाता है। यह कॉम्प्लेक्स व्यक्ति को अपने परिवार से भी मिल सकता है या यह स्कूल और सोशल फंक्शन में इंटरेक्शन का परिणाम भी हो सकता है। उपरोक्त चीज़ों को फॉलो करके, आप अपने आसपास के लोगों के सामने इमोशनल इंटेलीजेंस का डिस्प्ले भी कर सकते हैं। जब एक बार आप समझ जाएं कि सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स क्या चीज़ है तब आप उससे जीतने के लिए बेहतर तैयारी कर सकते हैं।
 

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