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एक टॉपर स्टूडेंट होने के मायने

20 की उम्र तक के कॉलेज स्टूडेंट्स को पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करने को लेकर कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।


एक अच्छे स्टूडेंट से बहुत सारी उम्मीदें रखी जाती हैं। उसे अच्छा बोलना आना चाहिए, उसे हर चीज़ अच्छी तरह करना चाहिए और यह सब सीमित पॉकेट मनी के बावजूद कर दिखाना चाहिए। लड़कियों के लिए तो चुनौती और बड़ी होती है। उन्हें परफ़ेक्ट होना पड़ता है। हर घर-परिवार परफे़क्ट होने की अपनी परिभाषा खु़द तय करता है। मेरे लिए परफ़ेक्शन का मतलब है साफ़, इस्तरी किया हुआ कुर्ता पहनना और बालों को करीने-से तीन भागों में बांटना। जबकि मुझसे यह एक्सपेक्ट किया जाता था कि मुझे एकदम गोल चपाती बनाना आना चाहिए, चाय में सभी के लिए सही मात्रा में चीनी मिलाना आना चाहिए और इसके साथ ही दिन के बचे समय में मैं अपनी पढ़ाई के दबाव की बैलेंस शीट को भी किसी तरह टटोलती रहूं।

जिन्हें सो कॉल्ड टॉपर कहा जाता है, उनके जीवन के भी कई पहलू होते हैं। इसमें सबसे बड़ी एक्सपेक्टेशन आपकी खु़द से होती है। इसमें कोई शक नहीं है कि असफलता के डर के कारण मैं कई रातों तक जागी हूं। ट्रेड लॉ को रिवाइज़ करते हुए मुझे नींद आ जाती थी। कई बार पढ़ाई की चिंता के कारण मैं आधी रात को उठ जाती थी और किताब खोलकर नम्बरों के समुद्र में डूब जाती थी। 

उम्मीदों का अन्य हिस्सा टीचर्स से मिलता है। उन्हें पहचान तब मिलती है, जब उनके स्टूडेंट्स बेहतर प्रदर्शन करते हैं। उनकी प्रशंसा मुझे भी मोटिवेट करती है, मगर इसके साथ ही कई ज़िम्मेदारियां भी आती हैं जैसे कि हमेशा समय पर आना, नोटबुक को हमेशा साफ़ रखना (क्योंकि दोस्तों को एग्ज़ाम से पहले एक फ़ोटो कॉपी की आवश्यकता होती है) और इसके अलावा क्लास में जो भी पढ़ाया जाता है, उसको लेकर होशियार रहना।

जैसे-जैसे एग्ज़ाम की तारीख़ नज़दीक आती है, सीखने का दबाव, फिर से सीखने, सिलेबस को अधिक से अधिक याद रखने के लिए रिवाइज़ करने और री-रिवाइज करने का दबाव बढ़ता जाता है। ऐसे में खाना, नींद और आराम : ये तीनों एक साथ एक ऐसे पिटारे में होते हैं, जो हक़ीक़त की दुनिया से कोसों दूर है। मुझे परीक्षा के पहले की रात में लगातार तनाव के कारण आंख में दर्द और ग़श खा जाने की परेशानी रहती है।

जब एग्ज़ाम का दिन आता है तो तीन घंटे के लिए न आप लेफ़्ट देखते हैं, न राइट देखते हैं और न ही ऊपर देखते हैं। आप केवल यह देखते हैं कि आपने हर सवाल का सही उत्तर दिया है क्योंकि आपने साल भर हुई हर परीक्षा में अच्छे नम्बर हासिल किए हैं तो अब आपके लिए ग़लती करने की कोई गुंजाइश नहीं है। जब रिज़ल्ट का दिन आता है तो कई स्टूडेंट्स डरे हुए होते हैं लेकिन यह मेरे लिए सबसे अद्भुत दिनों में से एक होता है। मेरे पैरेंट्स ख़ुश होते हैं और मेरे आसपास सकारात्मक माहौल होता है और इसी ने मुझे हर बार ख़ुद को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया है।

एक सबसे ज़रूरी बात, जो मैंने इस अनुभव से सीखी, वो यह है कि चाहे कुछ भी हो जाए, आपके पैरेंट्स आपका हमेशा सपोर्ट करेंगे। जिन रातों में मैं सो नहीं सकी, मेरी मां भी मेरे साथ जाग रही थीं। जब मैं हताश हो जाती थी, तो मेरे पिता मुझे बाहर ले जाकर आइस्क्रीम खिलाते थे और प्रेरक शब्दों से मुझे मोटिवेट करते थे।

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स्कूल पॉलिटिक्स को समझना और आगे बढ़ना

स्कूल पॉलिटिक्स कहीं आपकी पढ़ाई पर असर तो नहीं डाल रही? इस स्टोरी में एक टीनएजर अपने स्कूल के दिनों के अनुभवों को हमसे साझा कर रहा है कि कैसे माइंड गेम और पक्षपात को उसने डील किया।
Nishtha JunejaTeentalkindia Content Writer

हम जब भी राजनीति शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में क्या ख़याल आता है? भारतीय राजनीति? चुनाव? ट्रिक्स? क्रूरता? जी हां, हममें से ज़्यादातर के लिए राजनीति यही है। मेरे लिए भी पहले यही सब था, जब तक कि मैं स्कूल में जाना-पहचाना एक टीन नहीं बन गया। मैं आप टीनएजर्स को आज एक शब्द से परिचित कराता हूं, जिसे आप जानते भले न हों, लेकिन ख़ुद को उससे जुड़ा हुआ ज़रूर समझेंगे – स्कूल पॉलिटिक्स (TAADDAA)।

मैं कुछ ऐसी चीज़ों के साथ शुरू करना चाहता हूं, जो हम सभी ने देखी या नोटिस की हैं। आपके स्कूल में भी हर शिक्षक के पास एक स्टूडेंट या कुछ स्टूडेंट्स का एक ग्रुप होता है, जिसे वे पसंद करते हैं। और वे स्टूडेंट हर विषय में अच्छे ग्रेड्स भी हासिल करते हैं। लेकिन मेरे दोस्तों, यह स्कूल पॉलिटिक्स की पहली झलक है।  

योग्य थे पर चुने नहीं गए
अब मैं अपने अगले पॉइंट पर आता हूं, और वह है बायस्ड सिस्टम। कई बार आप स्कूल में ऐसा महसूस करते हैं कि आपको विश्वास होता है कि यह अवसर आपके लिए है, मगर आप उसे हासिल नहीं कर पाते हैं। यह सच भी है और सामान्य है और यह कभी न कभी सभी के साथ होता है। मैंने भी इसका सामना किया है। मेरा स्कूल दिल्ली में होने वाली नेशनल एमयूएन कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने वाला था। सिलेक्शन के लिए एक मॉक एमयूएन ऑर्गेनाइज़ किया गया था। मैं उसमें सिलेक्ट हुए 6 बेस्ट डेलिगेट्स में से एक था। लेकिन क्या मैं दिल्ली में उसमें शामिल हुआ? दु:ख की बात है नहीं।

मुझे गहरी निराशा हुई। मैंने इसके लिए कड़ी मेहनत की थी, और स्कूल का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुझे चुना जाना चाहिए था। अफसोस की बात है कि शिक्षक के क़रीबी छात्रों को कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का अवसर मिला। इस अनुभव के बाद, मैंने ख़ुद को कमतर महसूस नहीं होने दिया और यह कहकर अपने को समझाया कि यह बात घटना है। लेकिन स्कूल में होने वाली इस तरह की एक्टिविटी स्टूडेंट्स पर असर डालती हैं और इसमें टीचर्स तक शामिल होते हैं।

क्या यह परफ़ेक्ट है?
एक और पहलू जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, वह है स्कूल प्रीफे़क्ट की नियुक्ति- हेड बॉय और हेड गर्ल। मैं नहीं समझ सकता कि कुछ को बहुत-से बच्चों से कैसे अलग किया जाता है। इन ख़ास बच्चों की मुख्य ज़िम्मेदारी अन्य स्टूडेंट्स की निगरानी करना होता है। अक्सर प्रीफे़क्ट बॉडी के पास कुछ ख़ास अधिकार होते हैं, जो दूसरे स्टूडेंट्स के पास नहीं होते। वे स्टूडेंट्स से अलग कलर की यूनिफ़ॉर्म पहनते हैं और स्टूडेंट्स को उनके बुरे बर्ताव के लिए या स्कूल के नियम तोड़ने के लिए सज़ा भी दे सकते हैं। ऐसे में ये बच्चे अपने दोस्तों का पक्ष लेते हुए अपनी ताक़त का दुरुपयोग करते हैं। इसकी वजह से छात्रों के बीच झगड़े, प्रतिद्वंद्विता और सस्पेंशन तक की स्थिति बन जाती है।

यह अच्छा है या बुरा?
स्कूल ने मुझमें कई अच्छे गुण पैदा किए और मुझे एक मज़बूत व्यक्ति बनाया। पर इसने मुझे पॉलिटिक्स को समझने का भी नज़रिया दिया। मैंने ऑब्ज़र्व किया है कि स्कूल पॉलिटिक्स और पक्षपत के कारण कुछ बच्चे मायूसी महसूस करते हैं और कुछ स्टूडेंट्स, जिनमें बेहतर करने की क्षमता होती है, वह भी पीछे रह जाते हैं।  

लेकिन दूसरी ओर इसका एक पहलू यह भी है कि यह अनुभव हमें वास्तविक दुनिया की राजनीति के लिए तैयार कर रहा है। इसलिए क्या हमें इस सिस्टम का हिस्सा बनना चाहिए या इससे दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए और या हमें इस सिस्टम को बदलने की कोशिश करनी चाहिए?

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