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इमोशनल एब्यूज के बारे में सब

हर ज़ख़्म दिखलाई नहीं देता

शारीरिक उत्पीड़न के उलट भावनात्मक उत्पीड़न अपने पीछे ऐसे कोई घाव नहीं छोड़ जाता, जिन्हें देखा जा सकता हो। लेकिन हमारे आत्मसम्मान और आत्मविश्वास पर गहरा असर पड़ता है। भावनात्मक उत्पीड़न कई प्रकार का हो सकता है, जिनमें से कुछ तो शायद पहले-पहल ज़ाहिर भी न हों। जो भी किसी उत्पीड़न से भरे सम्बंध में है, वह देर-सबेर भावनात्मक उत्पीड़न का सामना करता ही है। यदि आपको लगता है कि आप भी किसी उत्पीड़न से भरे सम्बंध में हैं तो आप अपनी मदद के लिए कुछ चीज़ें कर सकते हैं।

इसमें कैसा महसूस होता है :
आपको लगता है कि आप ही इस सम्बंध के योग्य नहीं हैं
आपको डर लगता है कि आपका साथी आपको छोड़ देगा
आपको साथी आपको नीचा दिखाता है या अपशब्दों का इस्तेमाल करता है

बहुतेरे अस्वस्थ सम्बंधों में भावनात्मक उत्पीड़न के विभिन्न रूप पाए जाते हैं। जो व्यक्ति भावनात्मक रूप से आपका उत्पीड़न करता है, वह वास्तव में आपसे आपकी अस्मिता और स्वतंत्रता छीन लेना चाहता है। ऐसे रिश्ते में आपको यह लगने लगता है कि इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है और आपकी कोई हस्ती नहीं है और अपने साथी के बिना आपका कोई वजूद भी नहीं है। इन मायनों में भावनात्मक उत्पीड़न शारीरिक प्रताड़ना जितना ही विनाशकारी हो सकता है और आपके मानसिक स्वास्थ्य को गहरे तक प्रभावित कर सकता है। वैसे भी शारीरिक प्रताड़ना और भावनात्मक उत्पीड़न अकसर साथ-साथ ही किए जाते हैं, ताकि विक्टिम पर अपनी सत्ता और अंकुश क़ायम रखा जा सके।

भावनात्मक उत्पीड़न के प्रकार :

शब्दों की हिंसा : चीखना, ज़लील करना, गालियां देना
नकारना : यह दिखावा करना जैसे कि आपके सामने होकर भी आपको देखा नहीं गया है, या आपसे बात करने को टालना
अपमान : आपको मूर्ख आदि कहकर पुकारना, सार्वजनिक रूप से आपको नीचा दिखाना, हर चीज़ के लिए आपको दोष देना
डर पैदा करना : आपके भीतर भय की भावना भर देना, आपको धमकाना या डराना
अलग-थलग कर देना : आपके घूमने-फिरने की आज़ादी पर रोक लगा देना, लोगों से मिलने-जुलने पर पाबंदी लगाना
आर्थिक निर्भरता : आपके पैसों पर नियंत्रण रखना, आपको काम करने से रोकना, आपकी बचत आदि चुरा लेना
धौंस-डपट : जानबूझकर और बार-बार ऐसी चीज़ें कहना या करना, जिससे आपको चोट पहुंचे

भावनात्मक उत्पीड़न के दुष्प्रभाव :

यह सच है कि भावनात्मक उत्पीड़न के निशान दिखलाई नहीं देते, लेकिन वो वास्तविक होते हैं और लम्बे समय तक बने रह सकते हैं। वे ना केवल आपके आत्मविश्वास को मटियामेट करने में सक्षम होते हैं, बल्कि आपको नैराश्य से भी भर सकते हैं और आपको आत्महत्या तक के लिए उकसा सकते हैं।

यदि आप भी किसी प्रकार के भावनात्मक उत्पीड़न के शिकार हैं तो आपके लिए यह ज़रूरी है कि मदद की तलाश करें। हमारे एक्सपर्ट्स आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार हैं। आप उनसे चैट कर सकते हैं या उन्हें expert@teentalkindia.com पर ईमेल लिख सकते हैं।

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निष्ठा ने किस तरह दर्द को मात दी

कुछ योद्धा ऐसे भी होते हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन वे दुनिया के सामने आने वाले अन्य योद्धाओं की तुलना में किसी भी तरह से कम बहादुर नहीं होते। निष्ठा पाठक भी ऐसी ही एक योद्धा हैं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी प्रताड़ना झेली, जो एक वक्त पर बेहद निराश हो गई थीं और फिब्रोमियाल्गिया जैसी बीमारी से भी पीड़ित हो गई थीं।
Gousiya Teentalkindia Content Writer

कुछ योद्धा ऐसे भी होते हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन वे दुनिया के सामने आने वाले अन्य योद्धाओं की तुलना में किसी भी तरह से कम बहादुर नहीं होते। निष्ठा पाठक भी ऐसी ही एक योद्धा हैं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी प्रताड़ना झेली, जो एक वक्त पर बेहद निराश हो गई थीं और फिब्रोमियाल्गिया जैसी बीमारी से भी पीड़ित हो गई थीं। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उस हराते हुए खुद को साबित कर दिया।

निष्ठा उस वक्त चौथी क्लास में थी, जब पहली बार पड़ोसी के बेटे ने उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया था, जो कि उससे दोगुनी उम्र का था। उस बारे में याद करते हुए वो कहती है, 'मैं समझ नहीं सकती थी कि क्या चल रहा है, लेकिन कहीं ना कहीं दिल की गहराइयों में मुझे महसूस होता था कि कुछ ना कुछ गलत है।' आठवीं क्लास में आने तक उसके साथ दुर्व्यवहार होता रहा, इस दौरान उम्र के अलग-अलग पड़ावों में सात अलग-अलग लोगों ने उसका शोषण किया।

जब उसे इस बात का अहसास हुआ कि ये सामान्य बात ना होकर चिंता का विषय है तो उसने ऐसे लोगों से दूरी बनाना शुरू कर दी और उन्हें भी जब इस बात का अहसास हो गया कि वो समझ चुकी है कि ये सब क्या है, तो उन्होंने भी अपनी गंदी हरकतें बंद कर दीं। हालांकि अब उसके साथ यौन दुर्व्यवहार नहीं हो रहा था, लेकिन उसके सामने एक नई चुनौती आ खड़ी हुई थी।

ये वही दौर था, जब उसने अवसाद से बाहर आने के लिए दवाएं (एंटी डिप्रेसेंट्स) लेना शुरू कर दिया। क्योंकि वो इतनी भी बड़ी नहीं थी कि इस बात को समझ सके कि उसके साथ क्या हो रहा था। नौ साल पहले उसे 'फिब्रोमियाल्गिया' बीमारी होने के बारे में पता चला। ये एक ऐसी स्थिति है, जिसमें सालों पहले हुए भयानक शारीरिक और मानसिक शोषण की वजह से पूरे शरीर में दर्द होता है। इस बारे में पूछने पर निष्ठा बताती है, 'तकलीफ शब्द फिब्रोमियाल्गिया के दर्द को बयान करने के काफी छोटा है, लेकिन कोई अन्य शब्द भी इसमें होने वाले दर्द का वर्णन नहीं कर सकता है।'

'जब मैं लोगों से कहती हूं कि सबकुछ दर्द करता है, तो मेरा मतलब होता है कि मेरे शरीर का एक भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहां दर्द ना हो रहा हो। मुझे नहीं पता कि सुबह बिना दर्द के उठना कैसा रहता है। लगातार सिहरन, झुनझुनी, तेज दर्द, धकधकी, चाकू और सुई जैसी चुभन, खराश, जलन और डर लगना जैसी तकलीफें मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं। ये बिल्कुल अवर्णनीय है, जो मेरी आखिरी सांस के साथ ही खत्म होगी। ये आपके पूरे शरीर और आपके दिमाग और भावनाओं को प्रभावित करता है'।

निष्ठा तब 16 साल थी जब उसे इस बीमारी का पता चला था और डॉक्टर ने भी उसे बता दिया कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। जिसके बाद उसने एक साल के लिए स्कूल से छुट्टी लेकर इस बात को समझने की कोशिश की कि उसकी इस हालत की जिम्मेदार उसकी मेडिकल स्थिति है। धीरे-धीरे करके उसने हिम्मत जुटाते हुए खुद को इस बात का अहसास कराया कि अपनी भलाई के लिए उसे बेहद सकारात्मक तरीके से इसका मुकाबला करना ही होगा।

इस पूरी प्रक्रिया ने उसे कम दर्द वाले दिनों की तारीफ करना और बुरे दिनों में अपनी सीमा से आगे बढ़ना सिखाया। शुरू में वो दूसरों के साथ अपनी तुलना करती थी और फिर दुखी होती थी। लेकिन वक्त के साथ उसने समझा कि उसकी प्रतियोगिता खुद से है, और हर दिन उसे खुद को हराना है।

वर्तमान में निष्ठा की रोज की दिनचर्या में कोचिंग जाना, जिम जाना, पढ़ाई करना और मौज-मस्ती करना शामिल है और ये सब वो फिब्रोमियाल्गिया से जूझते हुए कर रही है। वो शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह से खुद का बेहद अच्छे से ध्यान रखती है। उसका कहना है कि दर्द होना नहीं रूका है और वो अब भी वैसा ही है जैसा वो नौ साल पहले था। लेकिन अब उसने उससे लड़ने की हिम्मत और इच्छाशक्ति जुटा ली है।

निष्ठा का कहना है, 'इन सब की वजह से जिंदगी के एक दौर में मैं खुद को कसूरवार और शर्मिंदा महसूस करती थी। लेकिन अब मैं जैसी भी हूं उसके लिए मैंने शर्मिंदा होना छोड़ दिया। मैं एक योद्धा हूं और ये मेरे लिए बिल्कुल भी दुखी होने वाली बात नहीं है। अपने खुद के नायक बनें और किसी अन्य की आदत बनें।'

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